भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित ११ पर जब वे वहां स्वयं पहुंचे तो उन्हें नारायण के दर्शन हुए। नारायण ने उन्हें उपदेश दिया कि वासुदेव परम एवं अपरिणामी हैं जिनसे संकर्षण की उत्पत्ति हुई जो समस्त जीवों (प्राणियों) के अधिपति हैं, उनसे प्रद्युम्न हुए जो मनस् भूत हैं, इनसे अनिरुद्ध उत्पन्न हुए जो अहंकार रूप हैं। अनिरुद्ध से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई और जिसने इस समग्र सृष्टि की उत्पत्ति की। अतः महाप्रलय के पश्चात् प्रथम वासुदेव से ही कर्मपूरक संकर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध की उत्पत्ति होकर सृष्टि प्रक्रिया प्रवृत्त होती है। पाञ्चरात्र आगम होने से इसकी पुष्टि सभी वैष्णवाचार्यों ने की सात्वत्संहिता, आदि के आधार पर इस शास्त्र के वक्ता स्वयं श्रीनारायण हैं यह भी उपर्युक्त विवरण से प्रकट है। जैसा कि कहा भी गया है:- “पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम् ।” अर्थात् समग्र पञ्चरात्र आगम के वक्ता या प्रथमोपदेष्टा स्वयं श्री नारायण हैं। इस पंचरात्र-आगम के अनुगत अनेक उपनिषद् हैं। यथा-अव्यक्तोपनिषद् या अव्यक्तनृसिंहोपनिषद्, कृष्णोपनिषद्, गोपालतापनी उपनिषद्, महानारायणोपनिषद्, नृसिंहतापनी उपनिषद्, नृसिंहो- त्तरतापनी उपनिषद्, रामतापनी उपनिषद्, रामरहस्योपनिषद् तथा वासुदेवोपनिषद् आदि। ये सभी उपनिषद् वैष्णव मन्त्रों तथा क्रिया एवं कर्म विधानों से युक्त विवरण परक हैं। इनमें से कुछ उपनिषद् विभिन्न वैष्णवाचार्यों द्वारा अपने यहां आगृहीत भी हैं तथा इनमें नृसिंहतापनी तथा गोपालतापनी अति प्रसिद्ध भी हैं। यामुनाचार्य ने अपने 'आगमप्रामाण्य' (नामक) ग्रन्थ में पांचरात्र पद की आध्यात्मिक रहस्यपूर्ण विशिष्टता की विवेचना की है। वे कहते हैं कि पञ्चरात्र से सम्बद्ध प्रक्रियाएं प्रत्यक्ष तथा अनुमान से ज्ञेय नहीं है। केवल ईश्वर ही पञ्चरात्र का आप्तभूत विशिष्ट उपदेश दे सकते हैं क्योंकि उनका ज्ञान अपरिमित होकर जगत् की समस्त वस्तुओं तक पहुंचता है। पञ्चरात्र ग्रन्थ ईश्वर द्वारा ऐसे भक्तों के हितार्थ उपदिष्ट हुए हैं जो वेदोक्त बहुश्रमसाध्य अनुष्ठानादि क्रियाओं से त्रस्त हो चुके थे। अतएव वेद में पाञ्चरात्र समर्थक पाठ न पाये जाने का कारण समझा जा सकता है। क्योंकि शाण्डिल्य ने वेदों में अपने अभीष्ट हेतु को प्राप्त करने का जब साधन नहीं देखा तो वे भक्ति की ओर झुके जिसका तात्पर्य वेद-निन्दा नहीं है। इससे यह भी समझा जा सकता है कि पाञ्चरात्र आगम के आधार तथा साधन वेद से भिन्नता रखते हैं। इसमें वेदोक्त कर्मकाण्ड के अतिरिक्त अपनी कर्मविधि होने से इसकी अवैदिकता भी सिद्ध नहीं हो सकती है। इसी तरह पञ्चरात्र में चार व्यूहों को स्वीकार करने पर इसकी अनेकेश्वरवादिता मानना भी अनुचित है क्योंकि दैवी पुरुष एक वासुदेव के ही ये अभिहित चारव्यूह अभिव्यक्ति है। इस प्रकार यही तथ्य सामने आता है कि वेद की तरह ही पञ्चरात्र मत की भी समानरूप में प्रामाणिकता है जिसका मूल उद्गम स्थान एक ही दैवी पुरुष नारायण हैं। पाञ्चरात्र-साहित्य पाञ्चरात्र मत के प्रतिपादक अनेक ग्रन्थ हैं क्योंकि दसवीं शती से लेकर १७ वीं शती तक इस मत का सुदूर दक्षिण में अधिक प्रसार रहा। यहां वैष्णवों को शैवमत के साथ रहना भी पड़ा तथा इसकी सिद्धान्त विषयक विचार मीमांसा भी खण्डन-मण्डन में प्रवृत्त हुई जो समय को देखते हुए स्वाभाविक थी। ऐसे ग्रन्थों के विवरण क्रम में सर्वप्रथम “सिद्धान्तरत्नावली” ग्रन्थ को लेते हैं जिसके रचयिता वेङ्कटसुधी हैं। यह ग्रन्थ चार अध्याय का है जिसका तीन लाख अक्षर का आयाम है। यह ग्रन्थ बड़ा होने से अभी तक अप्रकाशित है। परन्तु महत्वपूर्ण भी हैं। वेंकटसुधी का स्थितिकाल १४ तथा १५ वीं शती है। ये प्रसिद्ध विद्वान् वेङ्कटनाथ के शिष्य तथा श्रीशैल ताताचार्य के पुत्र थे। इन्होंने सिद्धान्तरत्नावली के अतिरिक्त रहस्यत्रयसार तथा सिद्धान्तवैजयन्ती नामक अन्य दो ग्रन्थों की भी रचना की थी।