नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता प्रकार अनेक तरह से पाञ्चरात्र शब्द का अर्थ वर्णित रहने पर भी इस शब्द के शास्त्रादि ग्रन्थों में मिलने वाले प्रयोगों से भी इस पर अतिरिक्त प्रकाश पड़ता है जहां (पुरुष) नारायण को पांच अहोरात्र में सम्पन्न होने वाले यज्ञ का सम्पादक कहा गया है। आचार्य उत्पल ने पाञ्चरात्र श्रुति, पाञ्चरात्रोपनिषद् तथा पाञ्चरात्र संहिता इन तीन नामों से पाञ्चरात्र साहित्य का निर्देश किया है। इस प्रकार श्रुति तथा उपनिषद् के अतिरिक्त इस शास्त्र के ग्रन्थों के साथ संहिता शब्द का प्रयोग एक परम्परा के रूप में सर्वज्ञात रहने से इसकी निरन्तर धारारूप में गति बनी रही यह माना जाता है। (१) प्रथमं सात्विकं ज्ञानं द्वितीयन्तु तदेव तु। नैर्गुण्यन्तु तृतीयञ्च ज्ञानञ्च सर्वतः परम् । चतुर्थञ्च राजसिकं भक्तस्तन्नाभिवाञ्छति । पञ्चमं तामसं ज्ञानं विद्वांस्तन्नाभिवाञ्छति । इति पञ्चविधं ज्ञानं पञ्चरात्रं विदुर्बुधा । (२) ब्रह्मवैवर्तेऽपि-वासिष्ठं नारदीयञ्च कापिलं गौतमीयकम् । परं सनत्कुमारीयं पाञ्चरात्रन्तु पञ्चकम् ॥” इति। पाञ्चरात्र शब्द के अर्थ निर्वचन के क्रम में पाञ्चरात्रागमगत विभिन्न संहितादि का मत देखते हुए जब हम भारतीय दर्शनशास्त्र के सांख्य, योग तथा वेदान्तादि (अद्वैतवेदान्तादि) दार्शनिक परम्परा को देखे तो ये सभी निश्चितरूप से पुरुषार्थ साधक होकर अमूर्ताराधनपरक शास्त्र भी हैं जिनमें प्रवृत्ति यदि असंभव नहीं तो कठिन तो अवश्य ही है। इनकी तुलना में पाञ्चरात्र समूर्ताराधक होकर सर्वसामान्यजन के लिये भी पुरुषार्थ साधक बन पड़ने से लाघव आपादक शास्त्र है तथा सरल भी रहने से इसमें लोक प्रवृत्ति का लगाव या झुकना भी संभव हुआ था यही समझना चाहिये। यही इस शास्त्र की दर्शनादि अन्य शास्त्रों में भिन्नता भी है। अतएव पाञ्चरात्र शब्द में अवस्थित रात्र-पद को सामान्य काल वाचक मान लेना इस आगम के अनुकूल है, अर्थात् पाञ्चरात्र-पद पञ्चकाल शब्द का समानार्थक है यही प्रतीत होता है। पाञ्चरात्र संहिता आदि अनेक ग्रन्थों में पञ्चकालपरायण शब्द का प्रयोग पाञ्चरात्र-विशेषज्ञ के अर्थ में प्रयुक्त किया गया मिलता है। अतः पाञ्चरात्र शब्द से ऐसा संप्रदाय एवं उसका आचार अभिहित है जिसमें वैष्णवों के आचार निर्वाह हेतु चौबीस घण्टे या एक अहोरात्र को पांच भागों में विभक्त किया गया हो तथा प्रत्येक काल के कर्तव्यों का निरूपण रहे। इस पञ्चकाल के अन्तर्गत प्रातःकाल से आरम्भ होकर रात्रि के उत्तर भाग पर्यन्त रहने वाले आचार जैसे- (१) अभिगमन, (२) उपादान, (३) इज्या, (४) स्वाध्याय तथा (५) योगकाल का कर्म इष्ट है जिसका निर्देश पाञ्चरात्र ग्रन्थों में दिया गया है। यही अर्थ यहां व्यावहारिक भी है तथा युक्तियुक्त भी है कि पांच कालों के लिये निर्धारित पृथक् एवं विशिष्ट आचार-परक विधेय क्रियाओं का इन विभक्त हुए पांच कालों में ही सम्पादन हो। यही विधि यहां इष्ट भी है। पाञ्चरात्र मत की प्राचीनता- पाञ्चरात्र-आगम की मूल परम्परा अतिशय प्राचीन है जिसका सम्बन्ध ऋग्वेद के पुरुषसूक्त से है तथा जो आगे चलकर सभी वैष्णव सम्प्रदायों का आधार बनी। शतपथब्राह्मण में कहा गया है कि परमपुरुष नारायण ने जब एक होने की इच्छा की तो उन्हें पञ्चरात्र यज्ञ का साक्षात्कार हुआ। श्री वेंकटसुधी ने अपने विशाल ग्रन्थ ‘सिद्धान्तरत्नावली’ में दिखलाया कि नारायण पद ब्रह्म का वाचक है। महाभारत के शान्तिपर्व में एक उल्लेख है कि-नारायण तथा नर उस एक अपरिणामी ब्रह्म की उपासना करते हैं। अन्य एक अध्याय में एक ऐसी कथा है कि नारायण का अनन्य भक्त एक राजा सात्वत धर्मविधि के अनुसार उनकी उपासना करता था। वह अपने यहां पञ्चरात्र वेत्ता सन्तों का सम्मान कर उन्हें आश्रय देता था। पर ये सन्त अपनी उपासना साधना के बाद भी नारायण के दर्शन नहीं पा सके। उन्हें बाद में सन्देश मिला कि नारायण का श्वेतद्वीप वासियों को ही दर्शन संभव है क्योंकि वे इन्द्रियहीन हैं। नारद भी श्वेतद्वीप वासियों को दूर से ही देख पाए थे