भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित ९ या अवैदिक धारा या शाख भी कह सकते हैं जिसका विस्तार से विवरण यहां अनभिप्रेत तथा प्रासंगिक नहीं है। इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से तन्त्रसाहित्य के व्यापक क्षेत्र का परिज्ञान होता है जिसमें अपरिमित या विशाल ग्रन्थसम्पत्ति विद्यमान है। जिनके अनेक ग्रन्थों के परिशीलन से इसी वर्ग के अनेक लुप्त या अप्राप्य ग्रन्थों का पता लग रहा है तथा जिनके उद्धरण इन (प्राप्य) ग्रन्थों में मिलते हैं। तन्त्रशास्त्र के परिशीलन से अनेक अज्ञात तत्वों का परिज्ञान होने से यह शास्त्र महत्वपूर्ण स्थिति से सदैव मण्डित रहेगा यह भी स्पष्ट ही है तथा इस पर अनुसन्धान भी नितान्त आवश्यक है। वैष्णव-आगम तथा संहिताएं वैष्णवआगम अपने में सर्वथा पूर्ण आगम माना गया है। इसके सामान्यतः दो भेद प्रमुख हैं-वैखानस तथा पाञ्चरात्र। इनमें से वैखानस नाम श्रीमद्भागवत् में गोपीगीत में मिलता है, जो इस धारा की प्राचीन स्थिति दर्शाता है। यथा- न खलु गोपिकानन्दनो भवान् अखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् । विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले ॥ विखानस् शब्द का अर्थ ब्रह्मा है तथा इस नाम के एक मुनि भी विखानस् कहलाते थे। विखानस से प्रवर्तित सम्प्रदाय वैखानस हुआ। छान्दोग्योपनिषद् में वैखानस् का अर्थ वानप्रस्थ किया गया है। वैखानस गृह्यसूत्र में कहा गया है कि वैखानसों को भगवान् नारायण स्वयं गर्भ में ही मुद्रा धारण करवा देते हैं। यथा- नारायणः स्वयं गर्भे मुद्रां धारयते निजाम् । विप्रा वैखानसा ये ते स्मृताः श्रीभगवत्-प्रियाः ॥” अतः इन वैखानसों के सम्प्रदाय को वैखानस आगम कहा गया। पाञ्चरात्र-आगम वैष्णव-आगम में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमें चर्चित विवरणों में पञ्चरात्र की व्याख्याएं भिन्न भिन्न रूप में मिलती हैं। इस शाखा के ग्रन्थ भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं जिनकी आगे चर्चा की जा रही है। पञ्चरात्र शब्द की व्याख्या में पाद्मसंहिता के अनुसार पांच विरोधी दर्शन अर्थात् बौद्ध, जैन, सांख्य, न्याय तथा वेदान्तशास्त्रों को जो अन्धकारमय या रात्रितुल्य अपने प्रकाश से कर देता है वह “पञ्चरात्र” शास्त्र या मत है। 'अहिर्बुध्न्यसंहिता' तथा 'नारदपञ्चरात्र' के अनुसार रात्रपद ज्ञान का वाचक है। ये पंचविध ज्ञान हैं-(१) परमतत्व, (२) मुक्ति, (३) भुक्ति, (४) योग, तथा (५) विषय (संसार) जिनके ज्ञान का आपादक यह शास्त्र है। 'ईश्वरसंहिता'-के अनुसार पांच मुनियों को सर्वप्रथम इस शास्त्र का ज्ञान प्राप्त होने के कारण यह पाञ्चरात्र शास्त्र कहलाया। ये पांच मुनि हैं-शाण्डिल्य, औपगायन, मौञ्जायन, कौशिक तथा भारद्वाज तथा यह भी है कि परमेश्वर ने पांच दिवारात्र की कालावधि में इस विद्या का उपदेश दिया था इसलिये इसका नाम पंचरात्र हुआ। इस प्रकार विविध वैष्णव आगमों में इसकी भिन्न भिन्न विवृतियाँ मिलती है। शतपथब्राह्मण में पाञ्चरात्र पद का अर्थ पांचसत्र किया गया है। आचार्य वेदान्तदेशिका ने “न्यायपरिशुद्धि” मैं विभिन्न आगमादि के आधार पर सारभूतरूप में पाञ्चरात्र पद का यह स्वरूप दिखलाया है:- “प्रतिबुद्धविषयभगवदन्यभजनोपदेशप्रवृत्तं तु । शास्त्रं पाञ्चरात्रम् । (श० अ० २ आ०) तदनुसार श्री विष्णु की अनन्यभाव से भक्ति का उपदेशक शास्त्र पाञ्चरात्र माना गया है। इस