भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता (२) प्रलय (३) देवार्चा (४) साधन (५) पुरश्चरण (६) षट्कर्म साधना तथा (७) ध्यानयोग इष्ट देवों की उपासना के आधार आदि अनेक स्वेष्ट देवताराधन एवं विषयादि को अपना आधार बनाकर आगमों का सम्बन्ध धर्म तथा दार्शनिक चिन्तन आदि से सम्बद्ध होता है जिनकी संख्या अट्ठाईस मानी गयी थी। इस संख्या में (जो शैवागम में दिखलाई गयी थी) आनेवाले आगमों की नामावली इस प्रकार है-कामिक, योगज, चिन्त्य, कारण, अजित, दीप्त, सूक्ष्म, सहस्र, अंशुमद्‌भेद, सुप्रभेद, विजय, निश्वास, स्वायम्भुव, अनिल, वीर, रौरव, मुकुटक, विमल, चन्द्रज्ञान, बिम्ब, प्रोद्गीत, ललित, सिद्ध, सन्तान, सर्वोक्त, परमेश्वर, किरण तथा वातूल आगम। इन आगमों के ग्रन्थों में अपने अपने विषय से सम्बद्ध तन्त्र के अनुगत धार्मिक विधानों तथा विधियों का विवरण रहता है (आगमों को भी तन्त्र के क्षेत्र के अन्तर्गत समाविष्ट माना जाता है)। संहिताएं- तन्त्रशास्त्र के आगमवर्ग में संहिताओं का महत्वपूर्ण स्थान माना गया है क्योंकि इन संहिताओं का क्षेत्र विस्तीर्ण होता है तथा इनके मूल ग्रन्थ में बारह हजार श्लोक (तक का ?) आयाम रहता है। इन संहिताओं में वैष्णव-तन्त्र या आगम के वर्ग में आनेवाली संहिताओं की संख्या अधिक है। इसके विषय में 'पौष्करसंहिता' का यह वचन द्रष्टव्य है:- “द्विषट्सहस्रपर्यन्तं संहितारव्यं सदागमम् । ये चान्ये चान्तराला वै शास्त्राद्येनाधिका शतैः । सर्वेषां संहिता संज्ञा बोद्धव्या कमलोद्भव ॥” आगम साहित्य के इस वर्ग में संहिताएं कितनी थीं तथा उनमें से कितनी संहिताएं उपलब्ध हैं, इसका निश्चित विवरण नहीं दिया जा सकता है। फिर भी अभी तक इस विषय पर जो तथ्य मिल चुके हैं उनके आधार पर प्राप्त संहिताओं के नामादि इस प्रकार हैं- अहिर्बुध्न्य, ईश्वर, कपिञ्जल, जया, पाराशर्य, पाद्म, बृहद्ब्राह्म, भारद्वाज, सात्वत, श्रीपाश्न, विष्णु, विष्णुतिलक, लक्ष्मी, मारीच, अत्रि, परम तथा पौष्कर संहिता। पाश्चात्य विद्वान् 'श्रोडर' ने इस वर्ग में अगस्त्य, अनिरुद्ध, उपेन्द्र, काश्यप संहिताओं के विद्यमान रहने की सूचना देकर उनकी भी इसी वर्ग में योजना रखने की बात कही है। रहस्य-ग्रन्थ तन्त्रशास्त्र के अन्तर्गत इन आगम तथा संहिता ग्रन्थों के अतिरिक्त इनसे अधिक सम्बद्ध विषयों के विवेचक ग्रन्थों में रहस्य ग्रन्थों का भी महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। इनमें शिवरहस्य, ब्रह्मरहस्य तथा विष्णु रहस्य जैसे ग्रन्थ आते हैं। इन रहस्य ग्रन्थों का वर्गीकृत विभाजन यामलों तथा डामर-तन्त्र जैसे ग्रन्थों में मिलता है। 'यामल' की परिभाषा इस प्रकार (मिलती) है- “सृष्टिश्च ज्योतिषारूयानं नित्यकृत्यप्रदीपनम् । क्रमसूत्रं वर्णभेदो जातिभेदस्तथैव च । युगधर्मस्तथारूयातं यामलस्याष्ट-लक्षणम् ॥ इति । इस यामल वर्ग में परिगणित कुछ ग्रन्थों के नाम इस प्रकार हैं-आदि, ब्रह्म, विष्णु, रुद्र, गणेश, आदित्य जयद्रथ तथा शक्ति यामल जो संख्या में आठ हैं। इन रहस्य ग्रन्थों में इन यामलों के साथ डामर ग्रन्थों का भी तन्त्रपरम्परा में समावेश माना गया है। इनमें योग, शिव, दुर्गा, सरस्वती, ब्रह्मा, तथा गान्धर्व डामर ऐसे ग्रन्थ हैं जिन्हें तन्त्रग्रन्थों में डामर मानते हैं। ये तन्त्र दो प्रमुख धाराओं में विभक्त हैं जिन्हें वैदिक तथा अवैदिक कहते हैं। इनमें वैदिक मन्त्रादि से अनुगत धारा मुख्यरूप से दक्षिणमार्गी धारा कहलाती है तथा अवैदिक को वाममार्गी