भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 176 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

हिन्दीटीकासहित ७ परम्परा में 'तन्त्र की उत्पत्ति श्रुति से मानी गई है। व्याकरण निर्वचन के अनुसार “तन्यते तन्यते विस्तार्यते वा ज्ञानमनेनेति तन्त्रम्" अर्थात् जिससे ज्ञान का विस्तार हो वह 'तन्त्र' है। यह ज्ञान का विस्तार सभी के रक्षण या भयमुक्ति के लिये भी होने से लोककल्याण का आधायक है। तन्त्र के प्रयोजन के साथ उपर्युक्त निरुक्ति का निदर्शन "विष्णुसंहिता" की निम्नलिखित कारिका से स्पष्ट हो जाता है। "सर्वेषां येन तन्यन्ते त्रायन्ते च भयाज्जनाः । इति तन्त्रस्य तन्त्रत्वं तन्त्रज्ञाः परिचक्षते ॥" तथा शैव-मत के अनुसार- "तनोति विपुलान् अर्थान् तत्त्वमन्त्रसमन्वितान् । त्राणञ्च कुरुते यस्मात् तन्त्रमित्यभिधीयते ॥" तत्व मन्त्र के अर्थज्ञान का प्रचुर विस्तार तथा रक्षण (करने) के कारण "तन्त्र" माना गया था। तन्त्रशास्त्र की धारणा सामान्यतः शक्ति तथा भैरव की उपासना के पारम्परिक अर्चादि को लेकर जनसाधारण में प्रचलित है। किन्तु इसकी व्यापकता इसके द्वारा होनेवाले कल्याण विधान, भयमुक्ति एवं रक्षण को लेकर होनेवाली उपायभूत अर्चा के कारण है जो पुराणों में भी दूसरी तरह कही गयी है। 'श्रीमद्भागवत' में श्री विष्णु की अर्चा को वेद, तन्त्र तथा मिश्ररूप में दिखलाया गया है- "यजन्ति वेदतन्त्राभ्यां परं जिज्ञासवो नृप । तथा-नाना तन्त्रविधानेन कलावपि यथा श्रृणु ।" (भा० ११/५-२८ तथा ३१) इसी प्रकार महाभारत में शिवजी को पञ्चरात्र (तन्त्र) का विज्ञाता तथा बालखिल्य आदि ऋषियों को तन्त्रशास्त्र की दीक्षा तथा उपदेश कृतयुग में शिव के द्वारा प्रदान करने का उल्लेख मिलता है। ब्रह्मपुराण-श्री शिव की पूजा वैदिक तथा तान्त्रिक विधि से करने की विधि का संकेत करता है। कालिकापुराण-देवी का ध्यान तथा अर्चा दुर्गातन्त्र के अनुसार करने के अतिरिक्त तन्त्रशास्त्र का वार-बार अनुवर्तन करता है तथा मार्कण्डेयपुराण में शक्ति उपासना का तान्त्रिक विधान विस्तार से निर्देशित किया गया है जो सर्वविदित है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि तन्त्रविद्या का महत्व तथा उसका प्रचलन सुदूर प्राचीन काल से ही यहाँ चला आ रहा है। आगम तन्त्र शब्द के अतिरिक्त 'आगम' शब्द भी इस शास्त्र का पर्याय माना जाता है। आगम भी श्रुति के समान महत्वशाली अनुष्ठान प्रकार की गरिमा रखता है। ऐसी मान्यता है कि जो महादेव (या सदाशिव) के द्वारा माता पार्वती के लोककल्याण की जिज्ञासा में करुणा से प्रेरित आग्रह से पूछे गये प्रश्नों के आधार पर कहे गये धर्मादि के गुप्त या रहस्यमय विवरणादि हैं वे "आगम" कहलाते हैं। पद्मंसंहिता में आगम की जो परिभाषा दी गई है वह भी इसी बात को दर्शाती है। यथा- "आगतं पञ्चवक्त्रात्तु गतं च गिरिजानने । मतञ्च वासुदेवस्य तस्मादागम उच्यते ॥ सृष्टिश्च प्रलयश्चैव देवतानां तथार्चनम् । साधनञ्चैव सर्वेषां पुरश्चरणमेव च ॥ षट्कर्मसाधनञ्चैव ध्यानयोगश्चतुर्विधः । सप्तभिर्लक्षणैर्युक्तं तस्मादागममुच्यते ॥" आगम के लक्षणभूत अंगों से सात लक्षण उपर्युक्त विवरण से निदर्शित हैं। ये हैं-(१) सृष्टि