नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता इस प्रकार यदि देखें तो तन्त्र या आगम शास्त्र को ऐसे रचनाग्रन्थों में रखना पड़ता है जिनमें प्रतिपादित सिद्धान्तों का क्रमानुगत ऐसा विवरण हो जिनसे ज्ञानादि की प्राप्ति उपयुक्त साधनादि के द्वारा सम्भव होती है। इस शास्त्र के ग्रन्थ, तन्त्र, आगम या संहिता के रूप में निरूढ माने गये हैं जिनमें आगम का रूप परम्परा से अधिक आबद्ध रहता है। संहिता ग्रन्थों में पारम्परिक मान्य सिद्धांतों का संकलन रखा जाता है। जिसमें प्राचीन एवं पवित्र परम्परा से प्रचलित ग्रन्थों के आधार पर या गुरुपदेशोंके आधार पर विवरण रहता है तथा विवेचन भी। इनके स्वरूप तथा उनमें स्थित विभेदक तत्वों के अनेक पहलू हैं तथा इनमें अनेक तथ्य तथा तत्व की आगमशास्त्रीय ग्रन्थों में मीमांसा मिलती है परन्तु ये ऐसी रचनाओं पर टिके हैं जहां इष्ट या उपास्य की उपासना की चर्चा हो, जो प्रतिपाद्य विषय के रूप में रखे जाएं। स्थूलरूप में ऐसे ग्रन्थ जिनमें आराध्य श्री सदाशिव तथा भगवती उमा (शिव तथा शक्ति) अथवा श्रीमन्महाविष्णु तथा श्रीमहालक्ष्मी विषयक उपासना तथा चर्चा रहती है। ऐसे ग्रन्थों को संहिता के अन्तर्गत रखा गया है। अतएव पूर्वोक्त ऐसे वर्गों के साहित्य या प्रतिपाद्य को आधार बनाकर निर्मित ग्रन्थ "तन्त्रग्रन्थ" या आगमग्रन्थ के नाम से जाने जाते हैं। परन्तु व्यवहार में वैष्णवतत्व को आधार बनाकर रचे गये इस शास्त्र के ग्रन्थ संहिता तथा इनसे भिन्न तत्व को बिन्दु मान कर रचे गये दूसरे सभी ग्रन्थ आगम ग्रन्थ या तन्त्रागमग्रन्थ के रूप में जाने जाते रहे हैं। इनको सरलता से शैवागम, बौद्धागम आदि के रूप में समझने के लिये लिखा है। सभी साधक या भक्तजन अपनी परम्परा के अनुरूप इन तन्त्रग्रन्थों को अपने अर्घानुरूप तथा परम्परा प्राप्त रूपों को मान्यता देकर तथा अपने अपने आग्रहों को निष्ठापूर्वक तथा बड़ी कठोरता से पालन कर अपनी साधना सम्पन्न करते हैं। तन्त्र तन्त्रशास्त्र या तन्त्रविद्या के प्रतिपादक के रूप में अवस्थित "तन्त्र" शब्द की व्याख्या तथा उसके परिसर को एवं इसकी व्यापकता को देखते हुए उसे एक स्वतन्त्र दर्शन की गरिमा भी दी गई। इसके क्षेत्रादि की व्यापकता को देखते हुए इस शब्द की "शब्दार्थ-चिन्तामणि" कोष में विवृत्ति इस प्रकार है:- "सर्गश्च प्रतिसर्गश्च मन्त्रलक्षणमेव च । देवतानाञ्च संस्थानं तीर्थानाञ्चैव वर्णनम् ॥ तथैवाश्रमधर्माश्च मन्त्रसंस्थानमेव च । संस्थानञ्चैव भूतानां यन्त्राणाञ्चैव निर्णयः ॥ उत्पत्तिर्विबुधानाञ्च तरूणां कल्पसंज्ञितम् । संस्थानं ज्योतिषाञ्चैव पुराणाख्यानमेव च ॥ कोशस्य कथनञ्चैव व्रतानां परिभाषणम् । शौचाशौचस्य चाख्यानं नरकाणाञ्च वर्णनम् ॥ हरचक्रस्य चाख्यानं स्त्रीपुंसोश्चैव लक्षणम् । राजधर्मो दानधर्मो युगधर्मस्तथैव च ॥ व्यवहारः कथ्यते च तथा चाध्यात्मवर्णनम् । इत्यादिलक्षणैर्युक्तं "तन्त्र" मित्यभिधीयते ॥" कोशकार के द्वारा इस प्रकार की गयी तन्त्र पद की यह विवृत्ति एक ओर जहां व्यापक है वहीं बड़ी सरल भी है तथा तन्त्रविद्या की सभी प्रकार की रचनाओं पर पूर्ण तथा विशेषरूप में लागू होती है फिर वह चाहे जैसी तन्त्रपद्धति हो। इसका कारण यह विवृत्ति है जो अपने सर्वसंग्राहक भाव के साथ व्यापक क्षेत्र की कल्पना को लेकर ही प्रवर्तित हुई।