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नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

हिन्दीटीकासहित १७ समाधान दिया था- युधिष्ठिर उवाच-कथं त्वमर्चनीयोऽसि मूर्तयः कीदृशाश्च ते । वैखानसाः कथं ब्रूयुः कथं वा पाञ्चरात्रिकाः ॥ श्रीभगवानुवाच-शृणु पाण्डव तत्सर्वमर्चनाक्रममात्मनः । स्थितं मां मन्वतस्तस्मिन्नर्चयेत् सुसमाहितः । विष्णुञ्च पुरुषं सत्यमच्युतञ्च युधिष्ठिर । अनिरुद्धञ्च मां प्राहुर्वैखानसविदो जनाः । अन्ये त्वेवं विजानन्ति मां राजन् पाञ्चरात्रिकाः । वासुदेवञ्च राजेन्द्र सङ्कर्षणमथापि वा । प्रद्युम्नञ्चानिरुद्धञ्च चतुर्मूर्ति प्रचक्षते ॥ इति ॥ इन दोनों सम्प्रदायों में श्रीविष्णु की अर्चा का अतिशय महत्वपूर्ण स्थान है। वेदों में यज्ञ को विष्णुरूप कहा गया है-यज्ञोह वै विष्णुः- अतः श्रीविष्णु पूजन भी यज्ञ ही है। दोनों सम्प्रदाय यज्ञ तथा देवालय की समता बतलाते हैं कि यज्ञशाला में अग्निस्थापन है तो देवालय में विष्णुस्थापन है। यज्ञशाला में हिरण्यकलश स्थापन है तो बिम्बपीठ पर रत्नकलश स्थापित रहता है। अग्नि पांच है-गार्हपत्य, आहवनीय, अन्वाहार्य, सभ्य तथा आवसथ्य। विग्रह भी पांच हैं-ध्रुव, कौतुक, उत्सव, स्नपन तथा बलि। जैसे श्रौतकर्म में गार्हपत्य अग्नि से आहवनीय अग्नि को लेते हैं वैसे ही ध्रुव विग्रहसे परमात्मा को कौतुक विग्रह में ले जाया जाता है। जैसा सभ्याग्नि तथा आवसथ्याग्नि को छोड़ कर त्रेताग्नि प्रसिद्ध है वैसे ही कौतुक तथा स्नपन को छोड़ कर शेष तीन ध्रुव, उत्सव तथा बलि विग्रह अधिक प्रसिद्ध हैं। परमेश्वर श्रीविष्णु की अर्चा दो प्रकार से की जाती है-समूर्त अर्चन तथा अमूर्त अर्चन। इनमें समूर्त अर्चन विग्रहों में तथा अमूर्त अर्चन होमादि यज्ञ में विष्णु की रखी जाती है। यहां भी स्वार्थ अर्चना स्वगृह में एवं परार्थ अर्चना जगत्-कल्याणार्थ देवालयों में होती है। आहिताग्नि को जैसे अग्नि में आहुति देने का अधिकार रहने पर अनाहिताग्नि पूरुष उसे सामग्री देकर भी वैसा फल प्राप्त कर सकता है वैसे ही अर्चना के अनधिकारी व्यक्ति अधिकारी व्यक्ति को विग्रह के लिये पूजन सामग्री आदि उपकरण प्रस्तुत कर स्वपुण्य फलप्राप्ति करते हैं। देवालय इसी उद्देश्य से हैं कि सभी देवार्चन अथवा यज्ञ के फल को प्राप्त कर सकें। जैसे यज्ञ में पञ्चाग्नि होती हैं उसी प्रकार वैखानस मत के अनुसार देवालय मे पांच विग्रह होते हैं। यथा-ध्रुव, कौतुक, उत्सव, स्नपन तथा बलि। ये पाँच विग्रह वैखानस सम्प्रदाय में मान्य हैं। पाञ्चरात्र सम्प्रदाय में छः विग्रह तथा अर्चा मान्य है। ये हैं-ध्रुवार्चा, कमार्चा, उत्सवार्चा, बल्यार्चा, तीर्थार्चा तथा शयनार्चा। इनके अन्य नाम हैं- कमार्चा, बल्यार्चा, यात्रार्चा, कृत्रिममाल्यार्चा, यागार्चा तथा स्नानार्चा। परमेश्वर का विग्रह अचल तथा चल माना जाता है अतः अचल के पूजनार्थ ध्रुव विग्रह स्थापित करते हैं। इन विग्रहों के नाम से इनका प्रयोजन भी अभिव्यक्त होता है। समग्र संवत्सर में अनेक उत्सव रहते हैं जिनमें प्रभु देवालय से बाहर भी गजवाहन, गरुड़ वाहन आदि दशाओं में यात्रा आदि रूप में जाते हैं तदर्थ उत्सव विग्रह होता है। इसी प्रकार स्नान, बलि तथा शयन के लिये भी पृथक् पृथक् तत्तद् विग्रह नियत होते हैं। स्नपन विग्रह में पूजा के समय ध्रुवबेर से कुश के द्वारा सम्बन्ध स्थापित कर स्नपन विग्रह में प्रभु की प्रतिष्ठा कर स्नानार्चन के बाद पुनः ध्रुवबेर में स्थापित करने की विधि होती है। ध्रुवबेर प्रधान होता है तथा चार या पांच बेर ध्रुवबेर सें पूर्वाद्रिक्रम से स्थापित की जाती है। ये बेर या विग्रह तीन प्रकार के माने जाते हैं-चित्र, चित्रार्थ तथा चित्राभास। जो विग्रह अपने मान, प्रमाण, उन्मान, परिमाण, उपमान तथा लम्बमान से युक्त हो वह चित्रबिम्ब या चित्रवेर है।

१८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता इस बिम्ब में प्रभु के सभी अवयव दृश्य होते हैं तथा यह बिम्ब लौकिक तथा पारलौकिक सभी फलों का प्रदान करनेवाला होता है। चित्रार्थ में सर्वावयव अर्द्धदृश्य होते हैं अतः यह बिम्ब केवल लौकिक फलों का प्रदाता होता है। चित्राभास वह है जिसमें ऊंचाई और लम्बाई के मान पर अधिक विचार न रखते हुए वस्त्र, काष्ठफलक या भित्ति पर अंकित किया जाता है। पुनः ये विग्रह वैखानसों के मत में तीन तथा पाञ्चरात्रों के मत में चार प्रकार की स्थिति के कारण चार प्रकार के होते हैं। खड़ीमूर्ति, आसनबद्ध या बैठी हुई मूर्ति तथा शयानमूर्ति। ये तीन भेद वैखानस मानते हैं। इन भेदों के साथ पांचरात्र में यानग या वाहन पर स्थिति वाले विग्रह का चौथा भेद माना गया है। ये सभी विग्रह भोग, योग नीर तथा अभिचारिक भेद से प्रत्येक की एक दूसरे से भिन्नता रखते हैं। पाञ्चरात्र ग्रन्थों में इन भेदों के अतिरिक्त कुछ विशेष भेदों की कल्पना भी की गई है जिन्हें विस्तार भय से यहाँ नहीं दिया जा रहा है, उन्हें यथास्थान जिज्ञासु तथा विशेषार्थ के अन्वेषकजन तत्तत् स्थानों पर शास्त्रग्रन्थों का अवलोकन करें। इसमें कामना भेद से तत्तद् विग्रहों की अर्चा की स्थिति मानी गयी है। यज्ञों से होनेवाले अर्थव्ययों तथा असुविधाओं को ध्यान में रखकर वैखानस तथा पाञ्चरात्र आगमों में जगत्हितार्थ तथा कामनापूर्ति एवं उद्दिष्टफलों की उपलब्धि के लिये विग्रहार्चन का विधान अधिकरूप से किया जाता है जिनकी विधियां इन आगमों के अनुगत पद्धतिग्रन्थों में विद्यमान हैं तथा उनके प्रयोगों का समय समय पर अर्चा में उपयोग किया जाता है जिनका ज्ञान सम्बद्ध आचार्य रखते हैं। नारदपञ्चरात्र- पिछले पृष्ठों में पाञ्चरात्र-आगम की चर्चा की जा चुकी है। “नारद पञ्चरात्र" का वैष्णवागम के अन्तर्गत एक विशिष्ट स्थान तो है ही इसकी गणना भी प्राचीनतम आगमग्रन्थों में की जाती है। इतिहास के विद्वानों के मत में श्रीमद्भागवत ग्रन्थ ही इससे प्राचीन माना गया है जिसकी तात्विक रूप में भक्तिसिद्धान्त के साथ अर्चादि विधानादि से संयुक्त पाञ्चरात्र आगम में शास्त्रीय स्थिति को दिखलाया गया था। इसमें सर्वाधिक बल श्रीवासुदेव की दास्य-भक्ति तथा इसी से मुक्ति की प्राप्ति पर दिया गया है। इसके प्रतिपाद्य विषयों में श्रीकृष्ण, श्रीगोपाल तथा श्रीराधा की प्रशस्ति, इनकी अर्चा तथा इन्हीं के आगमोक्त सहस्रनाम, कवच तथा न्यास आदि का विधान दिखलाया गया है। इसकी मान्यता है कि श्रीकृष्ण की आराधना के बाद भक्त को सभी पदार्थों की प्राप्ति संभव है। इसमें भगवान् शिव के द्वारा दिये गये नारद को उपदेश तथा मन्त्र आदि में श्रीकृष्ण की आराधना को मोक्षप्राप्ति का परम साधन निरूपित किया गया है। नारद स्वयं इस पाञ्चरात्र आगमग्रन्थ का उपक्रम इस प्रकार करते हैं- "वेदेभ्यो दधिसिन्धुभ्यः चतुर्थः सुमनोहरम् । तज्ज्ञानमन्थान्दण्डेन सन्निर्मथ्य नवं नवम् । नवनीतं समुद्धृत्य नत्वा शम्भोः पदाम्बुजम् ॥ विधिपुत्रो नारदोऽहं पञ्चरात्रं समारभे ॥ (ना० प० रात्रि। अ० १/१०-११) यह कथन इस शास्त्र की समृद्ध एवं प्रामाणिकता को दिखलाने के साथ साथ नारदप्रोक्त स्थिति की ओर भी संकेत करता है। पाञ्चरात्र पद की व्याख्या भी इसमें स्वयं ग्रन्थकार ने ही की है। यथा- "रात्रञ्च ज्ञानवचनं ज्ञानं पञ्चविधं स्मृतम् । तेनेदं पञ्चरात्रञ्च प्रवदन्ति मनीषिणः । ज्ञानं परमतत्त्वञ्च मृत्युञ्जयजरापहम् ॥ (रा० । अ० १/४४-४५)

हिन्दीटीकासहित १९ इस प्रकार रात्र पद की व्याख्या के साथ पञ्चरात्र आगम की परम्परा में इस शास्त्र के अनेक ग्रन्थों का विवरण दिया है। तदनुसार इस शास्त्र के सात शास्त्रकर्तागण मान्य हैं। यथा- ब्राह्मं शैवञ्च कौमारं वासिष्ठं कापिलं परम्। गौतमीयं नारदीयमिदं सप्तविधं स्मृतम्॥ (वही 1/-५७) इस विवरण के अनुसार इस पञ्चरात्र शास्त्र के छः अन्य शास्त्रकर्ता भी हैं जिनके इस वैष्णव आगम पर ग्रन्थ हैं। प्रकृत ग्रन्थ इन छः ग्रन्थों के अनुशीलन की भी सूचना देता है। इस ग्रन्थ में सर्वप्रथम नारद को एक देववाणी का श्रवण होता है जिसमें श्रीहरि की उपासना का कार्य ही सर्वोपरि कहकर उसे प्राप्त करने की प्रेरणा दी गयी- “आराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम् नाराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम्। अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम् नान्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्॥ विरम विरम ब्रह्मन् किं तपस्यासु वत्स व्रज व्रज द्विज शीघ्रं शङ्करं ज्ञानसिन्धुम्। लभ लभ हरिभक्तिं वैष्णवोक्तां सुपक्वाम् भवनिगड़निबद्धच्छेदिनों कत्र्तनीञ्च॥ (ना० प० रात्रि 1/अ० २/६-७) इस दैवी कथन को सुनकर नारद अपने पिता सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के समीप इसकी व्याख्या हेतु जाते हैं। वहां वह सनत्कुमार तथा ब्रह्मा को इन दो श्लोकों को सुनाता है। ब्रह्मा ने इनकी व्याख्या करते हुए नारद को शंकर से दीक्षा लेकर वैष्णव अर्चा आदि की पारम्परिक विधि का पालन कर भक्ति की चरितार्थता का रहस्य बतलाया तथा नारद ने भी तदनुसार बड़ी साधना के बाद भगवान् शिव से उपदेश में एकान्ती श्रीविष्णु की भक्ति का तत्व प्राप्त किया। नारद पञ्चरात्र ग्रन्थ में पांच रात्र या खण्ड हैं जिनमें प्रथमरात्र में पन्द्रह, दूसरे में आठ, तीसरे में पन्द्रह, चौथे में ग्यारह तथा पांचवे में ग्यारह अध्याय हैं। इनमें वैष्णव धर्म तथा उसके आदिदेव श्रीविष्णुरूप वासुदेवकृष्ण तथा श्रीराधा के तात्त्विक आराधना का विस्तार से विवरण रखा गया है। इसमें अपना पक्ष प्रस्तुत करने तथा उसे परमोयोगी एवं हितावह दिखलाने की भावना से आस्था जाग्रत करने के लिये ही अन्य देवों तथा धर्मों की उपासना प्रक्रिया की समीक्षा रखी है, जिसे किसी अन्य देव तथा उनकी उपासना पर प्रहार नहीं समझना चाहिए। पाञ्चरात्र-आगम के ग्रन्थों में नारदपञ्चरात्र मध्यमणि की तरह महत्वपूर्ण स्थान पर विद्यमान है। भारद्वाजसंहिता पाञ्चरात्रागम की अतिसमृद्ध ग्रन्थ सम्पत्ति रहने से इसकी चर्चा पूर्व में की जा चुकी है। यह ग्रन्थ नारदपञ्चरात्र का वार्तिक भूत परिशिष्ट है जिसमें चार अध्याय हैं तथा इन्हीं चार अध्यायों की शेषभूत तात्विक व्याख्या को परिशिष्ट में देकर इस शास्त्र की समग्र पूर्ति की गई है। भारद्वाजसंहिता मे विद्यमान द्वितीय अध्याय थोड़ा ही है तथा ऐसा माना जाता है कि यह भाग अब प्राप्य नहीं है। हमने भी भारत के मुख्य मुख्य तथा प्रामाणिक हस्तलिखित ग्रन्थों के पुस्तकालयों में खोजने पर तथा उनके सूची ग्रन्थों में देखने पर भी उक्त द्वितीय अध्याय की पूर्ण प्रति नहीं देखी। अतः श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस की पहिले मुद्रित प्रति के पाठ को लेकर ही सम्पादन तथा हिन्दी व्याख्या का कार्य सम्पन्न किया। आगम परम्परा में पाञ्चरात्र के प्रवर्तक मुनियों में सनत्कुमार नारदादि ब्रह्मपुत्रों से इस आगम

२० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता का ज्ञान भारद्वाज मुनि ने प्राप्त किया था जो पांच मुनियों में एक थे तथा इसी कारण यह पाञ्चरात्र कहलाया इसे पूर्व में बतला चुके हैं। इसी क्रम में पाञ्चरात्र के कुछ अनुन्मीलित उपासनादि के तत्वों की साधकादि भक्तों के लिये "भारद्वाजसंहिता" में चर्चा है जो नारदपञ्चरात्र (ग्रन्थ) में नहीं है। इसी कारण यह संहिता वार्तिक के समान आदर पा रही है। इसके भी परिशिष्ट में चारों अध्यायों के चर्चित तथ्यों पर और विवेचन है जो संहिता में संक्षेप में दिखलाया गया था। भारद्वाज संहिता के प्रथमाध्याय में मुख्यरूपसे न्यासयोग या भगवत्प्रपत्ति को ईश्वर की प्राप्ति तथा मोक्ष के लिये परमोपयोगी दिखलाकर शिष्य या साधक को न्यासयोग की दीक्षा प्रदान करने की विधि तथा वृत्ति आदि का विस्तार से विवरण दिया गया है। इस क्रम में इस दीक्षा तथा उपासना के लिये अधिकारी सभी वर्ण तथा स्त्री, शूद्र, म्लेच्छ आदि जातियों को भी मान्य किया गया है जो सभी तन्त्र एवं आगम परम्परा का अनुसरण करने वाला मत है। इन सभी के लिये दीक्षाप्रदाता गुरु पात्रानुरूप वैदिक, तान्त्रिक तथा भाषा मन्त्रों में से उपयुक्त मन्त्र का उपदेश देकर उन्हें श्रीहरि की प्रपत्ति अथवा न्यासयोग की दीक्षा सम्पन्न करवाता है। इसी क्रम में द्वितीयाध्याय में प्रपत्ति के अंगों की विवृत्ति है परन्तु परम्परा में द्वितीयाध्याय लुप्त है। तृतीयाध्याय में न्यासयोग प्राप्त कर लेने वाले आराधक के अर्चा तथा अन्य दैनिक तथा नैतिक कार्यों तथा विधानों का विवरण है तथा उसके द्वारा मुद्रा तप्त चक्रादि के अंकन तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण की विधि बतलायी गई है जिससे भक्ति में परिनिष्ठता आ सके। चतुर्थाध्याय में आराधक के लिये वृत्ति तथा उसके अंगों का विस्तार से विवरण दिया गया है। भारद्वाज-संहिता के इन चारों अध्यायों पर परिशिष्ट के चार अध्याय और लगाये गये हैं जिनमें चारों अध्यायों में उपदिष्ट तत्वों के विषय में छोड़े गये तात्विक विवरणों को लेकर पाञ्चरात्र आगम की परम्परा तथा रहस्यों का स्पष्टीकरण किया गया है। वैष्णव परम्परा में पाञ्चरात्र आगम को दिव्यशास्त्र माना गया है तथा इसका श्रवण तथा अनुचिन्तन उपासक को अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि वैराग्य, ज्ञान तथा भक्ति के परिपाक के द्वारा ही परमेश्वर की प्राप्ति तथा मुक्ति मिलती है। इस ग्रन्थ की इस प्रकार संक्षिप्त चर्चा के साथ प्रकृत ग्रन्थ के अध्ययन तथा चिन्तन की ओर स्वतः प्रवृत्ति बनकर उपासकों एवं पाठकों का इस शास्त्र में प्रवेश होगा ऐसी आशा है। प्रकृत संस्करण नारदपञ्चरात्र-भारद्वाजसंहिता का वैष्णव आगम के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान था परन्तु यह ग्रन्थ पूर्व में भी खेमराज श्रीकृष्णदास के वेङ्कटेश्वर प्रेस द्वारा प्रकाशित होकर लगभग तीस वर्षों से अनुपलब्ध रहा। जब इस ग्रन्थ का मुद्रण हुआ था उस समय वह संस्कृत भाषा में छपा था। इतने वर्षों के अन्तराल के पश्चात् इस ग्रन्थ की पुनः प्रकाशन की योजना पुनः प्रकाशक ने ऐसी बनाई कि हिन्दी व्याख्या के साथ यह ग्रन्थ प्रकाशित होकर सर्वजन हितार्थ बनें। यह कार्य करने का प्रकाशक का प्रस्ताव मैंने सहर्ष स्वीकार कर इस ग्रन्थ पर "तत्वप्रकाशिका" नामक हिन्दी व्याख्या तैयार की तथा अपेक्षित टिप्पणी तथा श्लोकानुक्रमणिका आदि के साथ "प्रस्तावना" से युक्त करते हुए यह ग्रन्थ प्रस्तुत कर दिया। प्रस्तावना भाग में इस शास्त्र के ऐतिहासिक तथा अन्य सभी पक्षों की चर्चा रखकर अनुशीलन कर्ताओं की अपेक्षा की पूर्ति के साथ अब यह प्रकाशित करवाया जा रहा है। इससे सुधीजन अवश्य संतुष्ट होंगे यही आशा है। आभार सर्वप्रथम नारदपञ्चरात्र तथा भारद्वाजसंहिता के अनुसन्धान अनुशीलन में सहायता करने वाले पञ्चरात्र आगम के विविध ग्रन्थों के रचयिताओं, सम्पादकों तथा ग्रन्थकारों का आभार मानता हू जिनके कारण प्रकृत ग्रन्थ इस रूप को प्राप्त कर सका। इसके हिन्दी व्याख्यादि के लेखनक्रम में सहायत

हिन्दीटीकासहित २१ करने के प्रसंग में मैं अपने मित्र डॉ० रुद्रदेवजी त्रिपाठी प्रकाशन सम्पादन तथा अनुसन्धान अधिकारी, ब्रजमोहन बिड़ला शोध केन्द्र, उज्जैन का आभार मानता हूँ। कालिदास अकादमी के सञ्चालक श्री प्रोफेसर श्रीनिवास "रथ" का भी इस ग्रन्थ के प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप में सहायक बन प्रेरित करने के साथ साथ प्रकाशन तक के कार्य में योगदान के कारण आभारी हूँ। कालिदास अकादमी परिवार के डॉ० जगदीश शर्मा, अनुसंधान सहकारी का तथा टंकण कार्य में सहायता के कारण श्री अवधेश श्रीवास्तव तथा श्री आर० जे० पानड़ीवाल का भी आभार मानता हूँ। इस ग्रन्थ को अपने प्रकाशनक्रम में लगाकर शीघ्र मुद्रणादि कार्य पूर्ण करवाने के कारण सर्वप्रथम श्रीमुरलीधरजी बजाज, स्वामी खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन बम्बई का तथा इसी प्रतिष्ठान के व्यवस्थापक भाई श्री ऋषिकेश शर्माजी का भी हृदय से आभारी हूँ। मुद्रणादि कार्य में रुचि लेकर समय पर कार्य पूर्ण करने के लिये वेङ्कटेश्वर प्रेस के सभी कर्मचारियों का भी आभारी हूं। उज्जैन के बालाजी पुस्तकालय के व्यवस्थापक श्रीतरुणकुमार गर्ग का मैं किन शब्दों में आभार मानूं। इसके साथ मुद्रण की या विवेचन के क्रम में रहनेवाले स्खलनों के लिये विनम्र क्षमाप्रार्थना के साथ सभी विद्वज्जन एवं पाठकों को प्रकृत ग्रन्थ को अपनाकर सहृदयता के साथ अनुग्रह रखने की साग्रह प्रार्थना करता हूं। आशा है इस ग्रन्थ का वे पूरी तत्परता से स्वागत करेंगे। सुधीजन से निवेदन के इस पद्य के साथ इस प्रकृत कथन का उपसंहार करतां हूँ। "इह प्रमादान्मति-विभ्रमाद्वा भवेत् क्वचिन्मे स्खलितं बुधैस्तत् । संशोधनीयं कृपया यदीशादन्यो न सर्वज्ञपदं प्रयाति ॥" इति निवेदकः विदुषां वशंवदः बाबूलाल शुक्ल, शास्त्री, हिन्दी व्याख्याकारः सम्पादकश्च

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२३ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विषयानुक्रमणिका विषय श्लोक संख्या पृष्ठ न्यासोपदेशो नाम प्रथमोऽध्यायः १-१०० २५-४६ ऋषिगण का भारद्वाज मुनि से धर्मविषय प्रश्न १-२ २५-२५ भारद्वाजमुनि द्वारा न्यासयोग का कथन तथा विवरणादिवर्णन ३-७ २६-२७ भगवत्प्रपत्तिरूप न्यास का माहात्म तथा प्रतिपाद्य विषय- ८-२७ २७-३१ प्रपत्ति के गुणानुगत प्रभेद महत्ता एवं फल २८-३२ ३१-३२ न्यासदीक्षाप्रदाता आचार्य एवं उनका लक्षणादिविवरण ३३-५९ ३२-३८ शिष्य या साधक को प्रदेय मन्त्र तथा उसके कर्मादि की मीमांसा तथा प्रपत्तिस्वरूप- ६०-७० ३८-४० वृत्ति का स्वरूप सम्बन्ध एवं प्रभेद ७१-८९ १६-२० वृत्ति काल के मध्य आनेवाले दोष तथा दुरितादि ९०-१०० ४४-४६ प्रपत्तिधर्मादिनिरूपणो नाम द्वितीयोऽध्यायः १-१ ४७ न्यासोपदेशो नाम तृतीयोऽध्यायः १-१०० ४८-६७ दीक्षित साधक द्वारा इष्टाराधन कर्म तथा सत्सेवन १-२६ ४८-५३ इष्टाराधक का आचार तथा उसके द्वारा इसका अन्यों को उपदेश २७-३५ ५३-५४ एकान्ती साधक द्वारा साङ्गवेदादि का स्वाध्याय तथा आराधनादि ३६-४५ ५४-५६ भक्ति के क्रम में होनेवाली आराधनादि विधानादि ४६-५८ ५७-५९ दीक्षाक्रम में शिष्य को चक्राद्यङ्कन संस्कार, उसके आचार एवं प्रयोजन का विवरण ५९-८१ ५९-६३ सत्सेवन एवं उसके विधानादि ८२-१०० ६३-६७ न्यासोपदेशो नाम चतुर्थोऽध्यायः १-१०० ६८-८७ विहिताचार तथा विरुद्धवर्जनादि का विवरण १-१६ ६८-७१ दृष्टि विरोध १७-२६ ७१-७३ भक्ति विरुद्धता- २७-३५ ७३-७५ लक्ष्य विरुद्धता- ३६-५७ ७५-७९ सत्सेवा विरुद्धता ५६-७९ ७९-८३ न्यासयोग से प्रपन्न साधक की परिणति तथा न्यासयोग माहात्म्य ८०-१०० ८३-८७

२४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विषय श्लोक संख्या पृष्ठ परिशिष्टे प्रथमोऽध्यायः १-१०० ८८-१०७ भरद्वाजमुनि द्वारा शेष धर्मों का पुनः कथन १-९ ८८-८९ एकान्ती साधक के शुद्धादि प्रभेद १०-१५ ९०-९१ आराध्य श्रीहरि की अर्चा तथा उसका फल १६-२६ ९१-९३ एकान्ती के गुणात्मक प्रभेद तथा लक्षण २७-३३ ९३-९४ एकान्ती का विहित आचार तथा वर्जनीय कर्म ३४-५१ ९५-९८ एकान्ती का चक्राद्यङ्क धारणादि आचार ५२-६० ९८-९९ चक्राद्यङ्कन संस्कार विधान अधिकारी तथा आचार ६१-६९ ९९-१०१ इष्टदेव श्रीहरि का अर्चादि विवरण ७०-८४ १०१-१०४ एकान्ती द्वारा विरुद्धाचार परिवर्जनादि कर्म ८५-९२ १०४-१०५ न्यासयोग की महत्ता ९३-१०० १०५-१०७ परिशिष्टे द्वितीयोऽध्यायः १-१०० १०८-१२४ साधक को प्रदेय तापादि पञ्चसंस्कार तथा उनका विवरण १-५२ १०८-११६ संस्कारों के विहित मुहूर्त्तादि एवं अनुष्ठान ५३-५६ ११६-११७ साधक के उपासना के मध्य आने वाले प्रत्यवायादि के हेतु शान्त्यादि कर्म विधान ५७-१०० ११७-१२४ परिशिष्टे तृतीयोऽध्यायः १-१०० १२५-१४४ सद्‌वृत्ति तथा एकान्ती के विहित धर्मादि न्यासयोग तथा उसका महत्व ३७-५३ १३१-१३४ वृत्ति, सत्सेवन एवं अर्चादि कर्म ५४-६९ १३५-१३८ न्यासोपदेष्टा गुरु तथा उपदेशग्रहणादि ७०-८१ १३८-१४० कुदृष्टि एवं ऐसे जन का संवास त्याग का उपदेश ८१-१०० १४०-१४४ परिशिष्टे चतुर्थोऽध्यायः १-९८ १४५-१६१ न्यासयोग के उपयुक्त वृत्ति तथा उसका मूलादि १-२४ १४५-१४९ विहिताचार तथा उसका स्वरूपादि २५-३५ १४९-१५० भक्ति तथा उसके कार्य ३६-४५ १५०-१५२ सत्स्वरूप तथा सत्सेवनगत आचार ४६-७२ १५३-१५६ अन्य विरोधीशास्त्र, असदाचार का परित्याग तथा वृत्ति का सेवनीय पक्ष- ७३-९८ १५७-१६१ निरूपण-

२५ ॐ नारदपञ्चरात्र-भारद्वाजसंहिता तत्त्वप्रकाशिकाख्याभिनवहिन्दीव्याख्यया सहिता अथ न्यासोपदेशो नाम प्रथमोऽध्यायः श्रुत्वा तु सकलान् धर्मान् सिद्धिमेषाञ्च शाश्वतीम् ॥ भूय एव मुनिश्रेष्ठमिदमूचुर्महर्षयः ॥१॥ ॐ नमः परब्रह्मणे अथ न्यासोपदेश नामक प्रथम-अध्याय समस्त निःश्रेयससाधनों के आपादक धर्मों¹ को तथा उन उन धर्मों तथा विद्याओं के विषय, प्रतिपादित इष्ट देवताओं के नियत गुणादि एवं उनके द्वारा प्राप्त होने वाली फलभूत सिद्धियों को सुन लेने के बाद भी महर्षिगण मुनिश्रेष्ठ भारद्वाज से पुनः प्रश्न की भावना से इस प्रकार बोले॥१॥ केनोपायेन भगवन्निह सर्वेऽपि जन्तवः । प्राप्नुयुः परमां सिद्धिं सद्यो विगतकल्मषाः ॥२॥ हे भगवन्, इस लोक में सभी प्राणी अपने अपने कल्मषों को सद्यः दूर करते हुए परमनिःश्रेयस् की प्राप्ति किस उपाय से कर सकते हैं, इसे हमें बतलाइये²॥२॥ १ यहाँ प्रयुक्त धर्मशास्त्र सम्मत सामान्य धर्म का बोधक होकर भी प्रकरण के अनुरोध के कारण अलौकिक निःश्रेयस परक भी है तथा कारिका में दिये हुए बहुवचन से उन उन विद्याओं में प्रदर्शित परमेश्वर के नियत गुणविशेष तथा विद्याओं की अनेक शाखाओं को भी संकेतित किया गया है। २ सभी वर्णों के अधिकार वाला तथा अपेक्षित काल एवं मोक्ष के फल को सम्पादन करनेवाला शीघ्र फलदायी उपाय क्या है (जो अतिशय पीड़ा या आर्ति वाले प्राणी को बिना किसी व्यवधान या विलम्ब के मोक्ष का सम्पादन कर दे, ऐसा उपाय क्या है।)

२६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता तेषां तद्वचनं श्रुत्वा भरद्वाजो महामनाः । सस्मार परमं गुह्यं पुनश्चेदमभाषत ॥३॥ सभी प्राणियों के कलुषों को शीघ्र दूर कर मुक्ति या निःश्रेयस प्रदान करनेवाले मुनिजन के वचनों को सुनकर महातपोनिधि भारद्वाज ऋषि ने परम गुह्य रहस्यो की ओर ध्यान लगाया (और चिन्तन के) बाद में वे उन मुनियों से इस प्रकार कहने लगे॥३॥ श्रूयतां सम्प्रवक्ष्यामि न्यासाख्यं योगमुत्तमम् । सिद्धिञ्चैवास्य परमां द्वयमेतच्छ्रुतम् मया ॥४॥ हे मुनिगण! आप ध्यान से सुनें, मैं आपको समस्त प्राणियों के कल्मष निवारक 'न्यास' नामक एक उत्तम योग तथा उससे प्राप्त होनेवाली फलरूप सिद्धियों को कहता हूं, जिन्हें मैंने परम्परा से सुन रखा है॥४॥ अयञ्च योगो वेदेषु वेदान्तेषु च गीयते । तथैव धर्मशास्त्रेषु दिव्यशास्त्रगणेषु च ॥५॥ यह न्यास-योग वेदों तथा वेदान्त के ग्रन्थों में रहस्यरूप में तथा इसी प्रकार मनु आदि प्रणीत स्मृतियों में तथा पञ्चरात्र संहिता आदि आगमों में दिखलाया गया है। (वही अब मैं आप सभी को कह रहा हूँ)॥५॥ अनेनैव हि कर्माद्याः योगाः सिध्यन्ति योगिनाम् । सिद्धिर्न तद्व्यपेक्षास्य तस्मादेनं परं विदुः ॥६॥ न्यास नामक इस उत्तम योग के द्वारा ही योगिजन को कर्म, ज्ञान तथा भक्ति आदि योगों में सिद्धि मिलती है परन्तु यह योग उन कर्मादि योगों की अपेक्षा नहीं रखता है अतः (उन सभी योगों से) यह न्यास-योग ही उत्तम है, यह निश्चित है॥६॥ निश्चितेऽनन्यसाध्यस्य परत्रेष्टस्य साधने । अयमात्मभरन्यासः प्रपत्तिरिति चोच्यते ॥७॥ इस न्यास का स्वरूप इस प्रकार है कि इस न्यास के अतिरिक्त अन्य उपायों से साध्य फलों से (इष्टार्थ की) सिद्धि नहीं होती। अतः यह न्यास ही इष्ट फलों का १ यहाँ प्रयुक्त उत्तम पद इस न्यासयोग को भक्तियोग से भी श्रेष्ठता दिखलाने के लिये है क्योंकि इससे परम सिद्धि की उपलब्धि होती है। २ वेद के यज्ञादि कर्म प्रतिपादक भाग में तथा वेदान्त के ब्रह्मप्रतिपादक भाग में तथा मनुप्रणीतादि स्मृतियों में धर्मशास्त्र के भागों में भी तथा पञ्चरात्र आदि वैष्णवमान्य दिव्यागम में भी इसी योग का संकेत रहस्यरूप में है जहाँ 'प्रपत्तिं तां प्रयुञ्जीत स्वाङ्गैः पञ्चभिरावृताम्' इत्यादि वचनों से यही बात दिखलाई गयी है।

हिन्दीटीकासहित २७ —आपादक तथा साधनभूत है तथा यही अपने इष्ट देव (परमात्मा) के प्रति स्वात्मा —का न्यास या प्रपत्तिरूप है। अतः इसे ‘न्यास’ कहते हैं॥७॥ प्रायो गुणवशादेष कृतः सर्वत्र देहिनाम् । सर्वेषां साधयत्येव तांस्तानर्थानभीप्सितान् ॥८॥ अतः सत्वरज तमोगुण के पारवश्य विष्णु, ब्रह्मा तथा परमशिव आदि देवों के प्रति भी यह ‘न्यास’ किया जाए तो प्राणियों को इष्टअर्थों की प्रायः सिद्धि देता ही है (क्योंकि प्रपत्तिरूप अनुष्ठित न्यास का फल अवश्य होता है)॥८॥ अनन्तज्ञानशक्त्यादिकल्याणगुणसागरे । परे ब्रह्मणि लक्ष्मीशे मुख्योऽयं सर्वसिद्धिकृत् ॥९॥ परन्तु अनन्त, ज्ञान, शक्ति तथा कल्याण आदि गुणों के सागर जो परब्रह्म रूप लक्ष्मीपति श्री विष्णु है उनके प्रति मुख्यरूप में अर्थात् श्रेष्ठ पद की प्राप्ति तक के लिये यदि यह ‘न्यास’ किया जाए तो सम्पूर्ण सिद्धियों का प्रदाता और आपादक रहता है॥९॥ प्रशासितुरशेषाणामात्मनां परमात्मनः न हि प्रसादनं विष्णोरन्यदात्मार्पणादृते ॥१०॥ परमात्मस्वरूप श्री विष्णु के प्रति आत्मार्पण रूप न्यास के अतिरिक्त अन्य कोई प्रसन्नता देने वाला (अन्य) साधन नहीं है क्योंकि श्री विष्णु सम्पूर्ण जीवों के नियन्ता हैं॥१०॥ अहमस्मि तवैवेति प्रपन्नाय सकृत् स्वयम् । देवो नारायणो श्रीमान् ददात्यभयमुत्सुकः ॥११॥ यदि इन भगवान् श्री विष्णु के प्रति प्रपन्नभाव से एक बार भी हे प्रभो!, मैं तो आपका ही भक्त हूं, कहकर स्वयं को न्यस्त कर दे तो भगवान् श्री नारायणदेव स्वयं ही करुणावश भक्त के प्रति उत्सुक होकर उसे अभय प्रदान कर देते हैं॥११॥ आत्यन्तिकीमनिष्टानां सद्यः शान्तिमभीप्सताम् । प्रपत्तिरञ्जसा कार्या न त्वशुद्धमुखी क्वचित् ॥१२॥ १ मोक्ष के प्रयोजन से सम्पन्न न्यास का विषय तथा लक्ष्य श्रीविष्णुरूप परब्रह्म ही होते हैं, यह बात इस कारिका से दिखलाई गयी हैं, अतएव यह सभी सिद्धियों को देने वाला सर्वोत्तम उपाय है। २ प्रपति या न्यास के अतिरिक्त शीघ्रता से मोक्ष का सम्पादक दूसरा साधन नहीं है यह सिद्धांत भी इस कारिका से उपाय निदर्शनपूर्वक कहा गया है।

२८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता जो अपने अनिष्टों की एक सद्यः शान्ति प्राप्त करने की इच्छा रखते हों तो ऐसे जन को अपने अनिष्टभूत अविद्या, कर्म, वासना आदि से विरत होने वाले दुष्कर्मों से उत्पन्न सुखदुःखादि की सदा सर्वदा के लिये समाप्ति के लिये श्रीविष्णु के प्रति प्रपत्ति तुरन्त बिना किसी व्यवधान या विलम्ब किये (ग्रहण) कर लेना चाहिए, इसे किसी अन्य चेतना के अन्तर से दबाकर या अन्य विद्याओं के आचरण के साथ साथ नहीं करना चाहिये जिससे अनिष्ट निवृत्ति में विलम्ब हो जाए॥१२॥ प्राप्तुमिच्छन् परां सिद्धिं जनः सर्वोऽप्यकिञ्चनाः । श्रद्धया परया युक्तो हरिं शरणमाश्रयेत् ॥१३॥ इसमें कोई अकिञ्चनजन भी परमश्रद्धा से युक्त होकर अपने कर्मों के सिद्धि की प्राप्ति की कामना करे तो वह भी श्रीकृष्ण की शरण में जाकर न्यास योग की साधना करे॥१३॥ न जातिभेदं न कुलं न लिङ्गं न गुणक्रियाः । न देशकालौ नावस्थां योगो ह्ययमपेक्षते ॥१४॥ इस न्यासयोग की साधना में न जातिभेद, न कुल, न स्त्रीपुरुष आदि लिंग न अपने गुणों और क्रिया आदि कार्यों का, न देश काल और अवस्था आदि का योग साधक को अपेक्षित होता है॥१४॥ ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्राः स्त्रियश्चान्तरजास्तथा । सर्व एव प्रपद्येरन् सर्वधातारमच्युतम् ॥१५॥ इसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ तथा अन्त्यज जैसे छोटी जातियों के किसी भी श्रद्धाभावयुक्त व्यक्ति को सभी प्राणियों के अधिपति अच्युत श्रीविष्णु की प्रपत्ति में प्रणत होकर 'न्यास' योग को विधिवत् प्रस्तुत कर देना चाहिए॥१५॥ प्रपत्तिं कारयन्त्येव सर्वभूतानि साधवः । अनपायहता सा तु तस्य तस्याशु सिद्धिदा ॥१६॥ प्रपत्ति सदैव अपायनिपहतस्वरूप है अतएव इस प्रपत्ति को सभी प्राणिजन को १ चेतना के अन्तर से व्यवधान होने की संभावना हो जाती है, यही प्रपत्ति की अशुद्धिमयी स्थिति है तथा इससे श्रीविष्णु की सायुज्य आदि प्राप्ति में विघ्न आकर विलम्ब हो सकता है। २ यह प्रपत्ति या न्यासयोग जातिभेदादि की अपेक्षा नहीं करता है। यहाँ गुण पद से औदार्यादि गुण, क्रिया से योगादि क्रियाएँ, देश से पुण्यकाल तथा स्थान समझना चाहिए। ३ यहाँ अपाय शब्द पारिभाषिक है जिसका विवेचन अपायाधिकार में बतलाया जा रहा है। आशय यही है कि ये अपाय भी प्रपत्ति के स्वरूप को नष्ट नहीं कर सकते केवल उस साधक के प्राप्त होने वाले फल में विलम्ब मात्र उत्पन्न कर देते हैं।

हिन्दीटीकासहित २९ साधुजन या विद्वान् अपने ज्ञान तथा परम्परा के अनुरूप विधिवत् करवाते हैं, क्योंकि यह प्रपत्ति यदि अनपायहृतत्वरूप में आये तो वह शीघ्र ही सिद्धि को देने वाली होती है॥१६॥ प्रपत्तिरानुकूल्यस्य सङ्कल्पोऽप्रतिकूलता । विश्वासो वरणं न्यासः कार्पण्यमिति षड्विधा ॥१७॥ कृतानुकूल्यसङ्कल्पः प्रातिकूल्यं विवर्जयेत् । विश्वासशाली कृपणः प्रार्थयन् रक्षणं प्रति ॥१८॥ इस प्रपत्ति के छः भेद बतलाने के साथ उसका स्वरूप भी दिखाने की इच्छा से कहते हैं कि अनुकूलता के हेतु सङ्कल्प के समय किसी प्रतिकूल बात का न आना ही प्रपत्ति है। यह छः प्रकार की है—सङ्कल्प, अप्रतिकूलता, विश्वास, वरण, न्यास तथा कार्पण्य। इनमें अनुकूल अनुष्ठान का संकल्प करना 'सङ्कल्प, प्रतिकूलता का परिहार करना 'अप्रातिकूल्य, इष्ट ही रक्षण करेगा, यह आस्था रखना 'विश्वास' अपनी रक्षा के लिये उपयुक्त रक्षक देवता का वरण करना 'वरण' स्वयं का इष्टदेव को निष्ठापूर्वक समर्पण 'न्यास' स्वयं को अकिञ्चन भाव में हृदय से प्रस्तुत करना 'कार्पण्यम्'। इस प्रकार से यह छः प्रकार की है॥१७-१८॥ आत्मानं निक्षिपति यद् विप्रदेवस्य पादयोः । सा प्रपत्तिरियं सद्यः सर्वपापप्रमोचनी ॥१९॥ इस प्रकार अपने गुरु, विप्र तथा इष्टदेव श्री विष्णु आदि के चरणों में स्वयं आत्मा का समर्पण करना 'प्रपत्ति' है, यही निक्षेप होने से 'न्यास' (इसे ही शास्त्र में 'निक्षेपापर पर्यायो न्यासः इत्यादि) कह कर उसके पांच अंग भी बतलाये हैं॥१९॥ आर्तानामाशु फलदा सकृदेव कृता ह्यसौ । दृप्तानामपि जन्तूनां देहान्तर-निवारिणी ॥२०॥ इस प्रपत्ति का अधिकारी भेद से फल यह है कि यह 'आर्तजन को शीघ्र फल देने वाली होती है (यदि इसे एक बार भी विधिवत् सम्पन्न किया जाए) और 'अहंकाराभिभूत' प्राणियों के द्वारा इसका आचरण हो तो उनका भी शोकादि का निवारण हो जाता है॥२०॥ एषा च त्रिविधा ज्ञेया करणत्रयभेदतः । गुणत्रयविभेदादप्येकैका त्रिविधा पुनः ॥२१॥ करणों के भेद से इस प्रपत्ति के तीन भेद कायिकी, वाचिकी तथा मानसी रूपवाले हो जाते हैं, जो सत्त्व, रज तथा तमोगुण के भेद से प्रत्येक प्रपत्ति के होकर यह त्रिविधा

३० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता बन जाती है॥२१॥ प्रणामाङ्कनमुख्येन न्यासलिङ्गेन केवलम् । गुर्वधीना हि भवति प्रपत्तिः कायिकी क्वचित् ॥२२॥ इस प्रकार यदि सर्वप्रथम 'कायिकी' को देखे तो कहीं साष्टाङ्ग प्रणामादि रूप वाली, कहीं चक्रादि चिन्हों के अंकनरूप में धारण करने से, ऊर्ध्वपुण्ड्रादि के धारण- रूपी न्यास के चिन्ह से अपने दीक्षा देनेवाले आचार्य के अधीन कही गयी है और यह 'कायिकी-प्रपत्ति' कहलाती है॥२२॥ अविज्ञातार्थतत्त्वस्य मन्त्रमीरयतः परम् । गुर्वधीनस्य कस्यापि प्रपत्तिर्वाचिकी भवेत् ॥२३॥ जिसका तात्विक अर्थ विशेष रूप में अवगत नहीं होता ऐसे गुरु के अधीन रहने वाले परम मन्त्रों को उनसे पाकर उच्चारण करने वाले किसी भी गुरु के अनुशासन में स्थित रहने वाले शिष्य साधक की प्रपत्ति को 'वाचिकी' समझना चाहिए॥२३॥ न्यासलिङ्गवताङ्गेन धियाऽर्थज्ञस्य मन्त्रतः । उपासितगुरोः सम्यक् प्रपत्तिर्मानसी भवेत् ॥२४॥ न्यास-योग के (धारण) चिन्हों से मण्डित तथा अपने दीक्षा प्रदाता गुरू की विधिवत् उपासना करने वाले, मंत्रों के अर्थों के (तात्विक) ज्ञान को बुद्धि से धारण किये हुए शिष्य साधक की अनुकूल अंगादि के द्वारा की गई विशिष्ट प्रपत्ति 'मानसी' होती है॥२४॥ यदीच्छन् प्रतिकूलानि सर्वभूतानुकम्पिनम् । प्रपद्यते हरिं मोहात् सा प्रपत्तिस्तु तामसी ॥२५॥ मोक्ष भावना के विपरीत शत्रुवध जैसी भूतहिंसादि की आकांक्षा रखते हुए सभी भूतों पर अनुकंपा करनेवाले इष्टदेव श्री विष्णु की मोहवश जब 'प्रपत्ति' की जाए तो यह प्रपत्ति 'तामसी' होगी॥२५॥ अभीप्सन् विविधान् कामान् यदकामैकवत्सलम् । प्रपद्यते हृषीकेशं तामिमां राजसीं विदुः ॥२६॥ यदि ऐहिक तथा आमुष्मिक अनेक भोगों की कामना से निष्काम भाव से प्रसन्न होने वाले श्री विष्णु (ऋषीकेश-इन्द्रियों के नियामक देव) की प्रपत्ति की जाए तो यह 'राजसी' प्रपत्ति होगी॥२६॥ परित्यज्याखिलान् कामान् भक्त्यैवात्मेश्वरं हरिम् । प्रपद्यते दास्यरतिर्यदैषा सा तु सात्विकी ॥२७॥

हिन्दीटीकासहित ३१ यदि सभी कामनाओं का परित्याग कर भक्तिभावना से आत्माधीश्वर श्री हरि की दास्यभाव से उनके समीप एक किंकर की प्राप्ति की भावना से प्रपत्ति की जाए तो यह 'सात्विकी' प्रपत्ति होती है॥२७॥ हीना हीनतमाश्चैव रजसा तमसा कृताः । सत्त्वेन याः प्रयुज्यन्ते मुख्यास्ताः परिकीर्तिताः ॥२८॥ जो प्रपत्ति रजोगुण वाली है वह हीन तथा जो तामसभाव वाली है वह हीनतमा है, अतः इन दोनों को छोड़कर सात्विक भाव से प्रपत्ति की जाए तो यही 'सात्विक' प्रपत्ति मुख्य मानी गयी है॥२८॥ सत्त्वजा मानसी त्वेका तत्र मुख्यतमा मता । तया हि परमां सिद्धिं सद्यो यान्ति मनीषिणः ॥२९॥ सत्व मूलक प्रपत्ति की मुख्यता इसीलिये है जैसा कि पूर्व में कहा गया है परन्तु इनमें भी जो मानसी है वह सात्विक प्रपत्ति होगी। वह मुख्यतम मानी जाएगी क्योंकि इस प्रपत्ति से मनीषीगण शीघ्र ही परमसिद्धि की प्राप्ति कर लेते हैं॥२९॥ प्रणामः कीर्तनं वापि स्मरणं वापि केवलम् । एकैकमपि चाङ्गानां प्रपत्तिः प्राज्ञसंश्रयात् ॥३०॥ अन्वयादपि चैकस्य सम्यङ्न्यस्तात्मनो हरौ । सर्व एव प्रमुच्येरन् नराः पूर्वे परे तथा ॥३१॥ कायिक प्रपत्ति के एकभाग प्रणाम क्रिया, वाचिक की प्रपत्ति के कीर्तन तथा मानसिक 'स्मरण' के केवल अंग को यदि विशेषज्ञ दीक्षा गुरु के अधीन रहकर किया जाए अथवा भगवत् सम्बन्धी इनमें से एक एक का सम्बन्ध रखते हुए यदि श्री हरि को स्वयं को अर्पित कर 'न्यासयोग' साधे तो इससे सभी पूर्व तथा बाद में कहे गये सभी प्रकार के साधकों को मुक्ति प्राप्त होती है॥३०-३१॥ बालमूकजडान्धाश्च पङ्गवो बधिरास्तथा । सदाचार्येण संदृष्टाः प्राप्नुवन्ति परां गतिम् ॥३२॥ यहां तक कि सदैव अपने दीक्षाप्रदाता आचार्य की कृपा दृष्टि रहने पर उनके द्वारा प्रदत्त मन्त्रों के प्रभाव से 'न्यासयोग' में दीक्षितों के वंश में उत्पन्न होने वाले जो भी बालक, मूक, जड़ तथा अन्धे पंगु बधिर जन होंगे तो ये भी परमपद मुक्ति को प्राप्त १ न्यास को दर्शानेवाले प्रणाम आदि कायिक प्रपत्ति तथा दीक्षामन्त्र के उच्चारण की क्रिया वाली वाचिक प्रपत्ति होती है। ये दोनों प्रपत्ति मुक्ति के प्रति साधकभूत मानी जाती है। 'स्मरण' मानसिक प्रपत्ति का अंग है जो अनुकूलता संकल्प जैसे विशिष्ट अंग से युक्त है। इसे किसी विशिष्ट एवं ज्ञानानुभवादि से पूर्ण आचार्य के आश्रय या निर्देशन में करना चाहिए।

३२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता कर लेंगे॥३२॥ गुरुणा योऽभिमन्येत गुरुं वा योऽभिमन्यते । तावुभौ परमां सिद्धिं नियमादुपगच्छतः ॥३३॥ अतः जो अपने गुरु को प्रपत्ति के साथ न्यासयोग की भावना से श्रद्धाभाव से समर्पित करे तथा जो अपने प्रपत्ति के अनुष्ठान के पूर्णतः सम्पन्न होने के बाद भी न्यासयोग की सिद्धि में उनके कारण बनने की कृपा की अतिशय कृतज्ञभाव से बुद्धि रखे तो ये दोनों ही प्रकार के साधक नियमतः परमसिद्धि की प्राप्ति कर लेते हैं॥३३॥ ज्ञानतस्त्वनुपेतस्य ब्रह्मचर्यमभीप्सतः । वृथैवात्मसमित्क्षेपो जायते कृष्णवर्त्मनि ॥३४॥ जो केवल पुस्तकादि के पठन से ज्ञान प्राप्त कर आचार्य के आश्रय ग्रहण करने के बिना ही प्रपत्ति का अनुष्ठान कर ब्रह्मचर्य की प्राप्ति (मोक्षादि) की अभिलाषा रखते हैं तो उनका निक्षेप या न्यासयोग अग्नि में फेंक दी जाने वाली समिधाओं के दाह की तरह वृथा होता है॥३४॥ शास्त्रादिषु सुदृष्टोऽपि साङ्गं सह फलोदया । न प्रसीदति वै विद्या विना सदुपदेशतः ॥३५॥ अतएव जैसे भली प्रकार से शास्त्रादि के ज्ञान के साङ्ग प्राप्त कर लेने पर भी बिना गुरु के उत्तम अनुभव सहित उपदेश के प्राप्त न होने पर फलोन्मुखी ब्रह्मविद्या भी ठीक से फल देनेवाली नहीं होती है॥३५॥ कामं लोकप्रमाणस्य कामाः सिध्यन्ति कामिनः । गृहीतसत्यदस्त्वैव निरपायफलोदयः ॥३६॥ प्रत्यक्षादि लोक प्रमाणों से इष्टसाधनों के प्रमाणित भाव के ग्रहण करने के बाद भी लौकिक पदार्थों से साधित हो जाने से किसी कामना करनेवाले साधक की सिद्धि हो परन्तु अलौकिक प्रमाण से सिद्ध होनेवाले मोक्षादि फल की प्राप्ति आचार्य की दीक्षा के अधीन रहने से सहज ही प्राप्त नहीं हो सकेगी। अतः ब्रह्मविद्या की प्राप्ति के लिये आचार्यौपसत्ति ही अपेक्षित है॥३६॥ न्यासे वाप्यर्चने वाऽपि मन्त्रमेकान्तिनः श्रयेत् । अवैष्णवोपदिष्टेन मन्त्रेण न परा गतिः ॥३७॥ १ यहाँ ब्रह्मचर्य पद का आशय है परब्रह्म की अनुभूति करते हुए उसके किङ्कर भाव या सामीप्य प्राप्ति की इच्छा करना। इस करिका की अन्य व्याख्या है कि जिसका उपनयन संस्कार न हुआ हो ऐसे व्यक्ति का जैसे ब्रह्मचर्य का आचरण करना वैसे ही वृथा है जैसे अग्नि में बिना विधि तथा मन्त्रों के समिधा का क्षेप या समर्पण करना।

हिन्दीटीकासहित ३३ अतएव न्यासयोग, इष्टदेव के अर्चन के लिये किसी अनन्य याजी गुरु का आश्रय या सभापतित्व को ग्रहण करें, क्योंकि अवैष्णव या अन्ययागी दीक्षाप्रद आचार्य से यदि 'न्यास' प्राप्त किये जावें तो उनसे परमपद की प्राप्तिरूप फल का मिलना कठिन होगा।।३७।। प्रपित्सुर्मन्त्रनिरतं प्राज्ञं हितपरं शुचिम् । प्रशान्तं नियतं वृत्तौ भजेद् द्विजवरं गुरुम् ॥३८॥ अतएव जो इस प्रपत्तिभाव की इच्छा रखते हों तो ऐसे साधकों को सर्वदा मन्त्रानुसंधान में रत रहनेवाले तथा मन्त्र के तात्विक रहस्यों के जाननेवाले, शिष्य के प्रति हितबुद्धि रखनेवाले, शिष्य से किसी प्रकार के अर्थादि प्राप्ति से निरपेक्ष रहने वाले, पवित्रभाव से रहने वाले, प्रशान्त वृत्ति के तथा विहित-आचारों में रत ऐसे किसी श्रेष्ठ वेदज्ञ ब्राह्मण का दीक्षा के लिये आचार्यरूप में आश्रय लेना उचित है।।३८।। सप्तपूरुषविज्ञेये सन्ततैकान्तिनिर्मले । कुले जातो गुणैर्युक्तो विप्रो श्रेष्ठतमो गुरुः ॥३९॥ यही गुरु यदि अपने वंश की सात पीढ़ियों का ज्ञाता या उसकी सातों पीढ़ी विद्यादि से विश्रुत रहीं हो तथा जिसका अविच्छिन्न भाव से चलनेवाला वंश एकान्तरूप में परिशुद्ध हो तो ऐसे वंश में उत्पन्न होने वाला तथा पूर्वकथित विशेषताओं से युक्त ब्राह्मण हो तो उसे श्रेष्ठतम आचार्य समझना चाहिए।।३९।। स्वयं वा भक्तिसम्पन्नो ज्ञानवैराग्यभूषितः । स्वकर्मनिरतो नित्यमर्हत्याचार्यतां द्विजः ॥४०॥ इसके अतिरिक्त जो स्वयं परमेश श्रीविष्णु की भक्ति से युक्त हो तथा ज्ञान वैराग्यादि गुणों से सम्पन्न हो तो अपनी सात पीढ़ी में भक्ति ज्ञानादि से रहित पुरुषों के रहने पर भी या ऐसे पूर्ववर्णित कुल में जन्म न लेने पर भी अपने उत्तम आचरण के कारण अन्य साधकों को मन्त्रदीक्षा देने में आचार्यत्व के गुणों की अर्हता के रखने से भी गुरु होता है।।४०।। नाचार्यः कुलजातोऽपि ज्ञानभक्त्यादिवर्जितः । न च हीनवयोजातिः प्रकृष्टानासनापदि ॥४१॥ यदि उत्तम सात पीढ़ियों के वंशधरों के रहने पर भी ज्ञान तथा भक्तिभाव से रहित १ यहाँ गुरु या मन्त्रदीक्षादि प्रदाता आचार्य के गुण तथा विद्यादि सम्पन्नता का विवरण साधक या शिष्य के उपकार के लिये रखा गया है। इसे प्रशंसादि के रूप में अर्थवाद परक नहीं मानते हुए क्रियोपकारकत्त्व रूप में समझना युक्तियुक्त है।

३४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विप्र भी हो तो वह दीक्षादाता आचार्य नहीं हो सकता है। इसी प्रकार जो कम अवस्था या आयुवाला और अपकृष्टजाति का गुणशाली भी पुरुष हो तो वह क्रमशः अपने से प्रकृष्टजाति के साधक को मन्त्रादि दीक्षा प्रदान करने वाला ‘आचार्य’ नहीं होगा। यदि कोई आपद्धर्म की स्थिति न हो परन्तु आपद्धर्म में ऐसी विज्ञ तथा हीन जाति भी आचार्यरूप में ली जा सकती है॥४१॥ न जातु मन्त्रदा नारी न शूद्रो नान्तरोद्भवः । नाभिशस्तो न पतितः कामकामोऽप्यकामिनः ॥४२॥ आपद स्थिति में हीनजाति के (द्वारा दीक्षित होने में) आचार्यत्व की अनुमति रहने पर भी कोई स्त्री मन्त्र की देनेवाली नहीं रखनी चाहिए और न ही कोई प्रतिलोमजाति में। उत्पन्न शुद्र ही मन्त्रदाता होता है। इसी प्रकार जो महापातकी या पतित हो तो उसे भी मन्त्रदाता आचार्य नहीं रखते हैं तथा जो सांसारिक कामनाओं से रहित हों तो उसे भी मन्त्रदाता नहीं रखा जावे॥४२॥ स्त्रियः शूद्रादयश्चैव बोधयेयुर्हिताहितम् । यथार्हं माननीयाश्च नार्हन्त्याचार्यतां क्वचित् ॥४३॥ स्त्री तथा शूद्रादि हिताहित की सलाह दे सकते हैं तथा वे अपनी स्थिति के अनुरूप सम्मान के भी अधिकारी होते हैं परन्तु उन्हें मन्त्रदाता आचार्य के रूप में नहीं रखा जा सकता है॥४३॥ किमप्यत्राभिजायन्ते योगिनः सर्वयोनिषु । प्रत्यक्षितात्मनाथानां नैषां चिन्त्यं कुलादिकम् ॥४४॥ इस संसार में योगीजन अनेक निकृष्ट तथा उत्तम योनि तथा जातियों में जन्म ले लेते हैं अतः जिसने अपनी साधनाओं के कारण भगवत्-तत्त्व का साक्षात्कार प्राप्त कर लिया हो ऐसे योगीजन के लिये कुलादि का विचार नहीं माना जाता है। अतः ऐसे किसी भी योगी से मन्त्रदीक्षा लेना निषिद्ध नहीं है॥४४॥ विश्वात्मन्यात्मनो न्यासं धिया वृत्तिञ्च शाश्वतीम् । मन्त्रेणोच्चारयेद् यस्तु स आचार्यः परो मतः ॥४५॥ जो विहित आचार दृष्टि तथा भक्ति के तात्विक भावों से युक्त मन्त्र का उच्चारण कर उपकारातिशय के भाव के कारण सभी के अन्तर्यामी भगवान् में अपने शिष्यको प्रपत्ति के रूप में न्यास-योग का सम्पादन करवाता हो तथा अपने ज्ञान से जो शाश्वती-वृत्ति को मन्त्रों के द्वारा कहलवाता हो तो उसे परम या उत्तम आचार्य माना जाता है॥४५॥

हिन्दीटीकासहित ३५ शान्तोऽनसूयुः श्रद्धावान् गुर्वर्थार्पितमद्वृत्तिकः । शुचिः प्रियहितो दान्तः शिष्यश्चोक्तो मनीषिभिः ॥४६॥ विद्वान ऐसे गुणवाले को जो कि शान्त प्रकृतिवाला, किसी से भी असूया न रखनेवाला, अर्थराशि तथा अपने कार्यों को जो आपने गुरुजन के लिये करने में उद्यत हो (अपनी वृत्ति भी गुरू के हित में चलाने वाला हो) शुद्ध वृत्ति तथा आचरणशील, अपने आचार्य के प्रिय तथा हित में तल्लीन रहनेवाला तथा अपनी इन्द्रियों को वश में रखनेवाला, अतिशय आसंग से हीन जो रहता हो उसे 'शिष्य' समझना चाहिए तथा जो उपदिष्ट अर्थ के ग्रहण करने में समर्थ बुद्धिवाला या दक्ष हो॥४६॥ न मत्तोन्मत्तपतिताभिशस्तक्रूरनास्तिकाः । नानर्थिनो न चाज्ञाताः कर्तव्याः मन्त्रगामिनः ॥४७॥ अतएव जो मत्त या उन्मत्त प्रकृति के हों, जो पतित हों, जो अभिशस्त क्रूर तथा नास्तिक हो, जो अर्थ के बोध में असमर्थ हों तथा जिनका कुलादि परिचय न हो तो ऐसे शिष्यों को न्यास का मन्त्रोपदेश नहीं दिया जावे॥४७॥ स्त्रीणाञ्च पतिमित्रादीननतिक्रम्य सत्तमान् । अनुज्ञया वाप्यन्येभ्यः स्मृतो मन्त्रपरिग्रहः ॥४८॥ स्त्रियों के पति, मित्र, पिता तथा श्वसुर जैसे सम्बन्धियों तथा श्रेष्ठ विद्याओं से युक्त जन को न छोड़कर अथवा अन्यों से भी अपने पूज्यजन से अनुमति लेकर मन्त्रग्रहण किया जा सकता है (पति, पिता तथा अन्य सम्मान्य पुरुष हों तो उनसे भी अनुज्ञा लेकर मन्त्र ग्रहण किया जा सकता है)॥४८॥ वैदिकास्तान्त्रिकाश्चैव यथार्था लौकिकास्तथा । प्रपत्तौ विहिता मन्त्रास्तत्र तत्र व्यवस्थया ॥४९॥ इस न्यास विधि में प्रपत्ति के लिये वैदिक, तान्त्रिक, उन मन्त्रों के अर्थवाले लौकिक भाषा वाले मन्त्रों को भी विहित माना गया है। ये मन्त्र यथेष्ट दिये जा सकते हैं तथा ये आचार्य के अधिकारी भेद की व्यवस्था के अनुगत होते हैं॥४९॥ न्यासिनो न्यास एव स्यान्निष्ठा तत्पूर्विकाः क्रियाः । व्यापकैर्नैष्ठिकैर्वाह्यैः कुर्यात् तेऽप्यर्पणे सताः ॥५०॥ १ कारिका में प्रयुक्त यथार्थ पद का आशय है कि ऐसे मन्त्र जो वैदिक तथा तन्त्रशास्त्र के मन्त्रों के समान शब्द या अर्थवाले हों तो वे यथार्थ मन्त्र होते हैं। यहाँ व्यवस्था यही है कि आचार्य त्रैवर्णिक शिष्यों को उनकी सामर्थ्य के तथा बुद्धि के अनुरूप वैदिक मन्त्र तथा तन्त्रादि आगमों से प्राप्त मन्त्र की दीक्षा दे सकते हैं। इसी प्रकार अत्रैवर्णिक अशूद्रादि को भी आगमिक मन्त्र, प्रतिलोमज जाति के शिष्य को वैदिकादि के समानार्थक उपयुक्त मन्त्र को तथा लौकिक भाषा के मन्त्रों को दिया जा सकता है।

३६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता जिसे आचार्य न्यास विधि में प्रपत्ति प्रतिपादक मन्त्र देवें उसे उसमें निष्ठा रखना चाहिए तथा वह उसी का नित्य जपादि करे। अर्चनादि किया भी उसी मन्त्र को ध्यान में रखते हुए रखे। अथवा यह कार्य व्यापकों अर्थात् आम्नात मन्त्रों के तथा नैष्ठिक मन्त्रों के जो दीक्षा प्राप्त मन्त्र रत्न से भिन्न हो तो उनसे भी किया जा सकता है। ये मन्त्र भी न्यास या प्रपत्ति में मान्य होते हैं। क्योंकि ऐसे मन्त्र भी 'नमः' आदिशब्दों से युक्त रहने से इनसे भी प्रपत्ति की स्थिति या प्रतिपादकता बनती ही है॥५०॥ करेण संस्पर्शयन् गात्रं मन्त्रविद् भावयेद् दृशा । एषा वा सर्ववर्णानां दीक्षेत्याह मुनिः स्वयम् ॥५१॥ मन्त्र-विधाता आचार्य अपने हाथ से शिष्य के शरीर का स्पर्श करते हुए तथा उसे (अपनी दृष्टि से) देखते हुए दीक्षा मन्त्र प्रदान करें। सभी वर्णों को दी जाने वाली दीक्षा का यही मान्य सिद्धान्त है। जो भारद्वाज मुनि ने स्वयं कहा है॥५१॥ यां सिद्धिं वैष्णवैर्मन्त्रैराधत्ते वैष्णवो गुरुः । सर्ववेदधरोऽप्यन्यो नान्यैः कुर्वीत् तादृशीम् ॥५२॥ मन्त्रदीक्षा-प्रदाता आचार्य जिन वैष्णव मन्त्रों से जितनी सिद्धि प्राप्त किये रहता है वह सभी वेदों के ज्ञाता भी अन्य गुरू दूसरे अवैष्णव मन्त्रों से वैसी सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता है॥५२॥ वैदिकास्तान्त्रिकाश्चैव द्वये मुख्या द्विजन्मनाम् । शूद्रानुलोमजातीनां मन्त्राः स्युस्तान्त्रिकाः परम् ॥५३॥ भाषाख्या लौकिका मन्त्राः प्रपत्त्यर्थविभावनावः । सर्वेभ्यः प्रतिलोमेभ्यो देयाः कामं द्विजातिभिः ॥५४॥ द्विजों में दो प्रकार के साधक मुख्य होते हैं-जिनमें एक वैदिक तथा दूसरे तान्त्रिक (आगमिक) हैं। इनमें जो शूद्र वर्ण तथा अनुलोम-जातियों में उत्पन्न जन हैं उनके हितकर (तथा उनसे साध्य) तान्त्रिक-मन्त्र (होते) हैं। ये लौकिक-भाषाओं में (भाषाओं में) भी प्राप्त होते हैं जो लौकिक मन्त्र के रूप में प्रपत्ति के भावों को दिखलाने वाले होते हैं । ऐसे उपयोगी मन्त्रों को भी ब्राह्मण आँचायों तथा दीक्षा गुरुओं के द्वारा ही सभी शूद्र तथा प्रतिलोम जाति के भक्त शिष्यों को दीक्षापूर्वक यथेष्ट रूप में ग्रहण करना चाहिए॥५३-५४॥ १. सभी प्रकार के मन्त्रों को शिष्य की क्षमता आदि का विचार कर दीक्षादाता आचार्य के द्वारा प्रदान किया जाए तथा ब्राह्मण आचार्य ही भाषा के मन्त्रों को भी दीक्षा के साथ प्रदान करें।