नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता जो अपने अनिष्टों की एक सद्यः शान्ति प्राप्त करने की इच्छा रखते हों तो ऐसे जन को अपने अनिष्टभूत अविद्या, कर्म, वासना आदि से विरत होने वाले दुष्कर्मों से उत्पन्न सुखदुःखादि की सदा सर्वदा के लिये समाप्ति के लिये श्रीविष्णु के प्रति प्रपत्ति तुरन्त बिना किसी व्यवधान या विलम्ब किये (ग्रहण) कर लेना चाहिए, इसे किसी अन्य चेतना के अन्तर से दबाकर या अन्य विद्याओं के आचरण के साथ साथ नहीं करना चाहिये जिससे अनिष्ट निवृत्ति में विलम्ब हो जाए॥१२॥ प्राप्तुमिच्छन् परां सिद्धिं जनः सर्वोऽप्यकिञ्चनाः । श्रद्धया परया युक्तो हरिं शरणमाश्रयेत् ॥१३॥ इसमें कोई अकिञ्चनजन भी परमश्रद्धा से युक्त होकर अपने कर्मों के सिद्धि की प्राप्ति की कामना करे तो वह भी श्रीकृष्ण की शरण में जाकर न्यास योग की साधना करे॥१३॥ न जातिभेदं न कुलं न लिङ्गं न गुणक्रियाः । न देशकालौ नावस्थां योगो ह्ययमपेक्षते ॥१४॥ इस न्यासयोग की साधना में न जातिभेद, न कुल, न स्त्रीपुरुष आदि लिंग न अपने गुणों और क्रिया आदि कार्यों का, न देश काल और अवस्था आदि का योग साधक को अपेक्षित होता है॥१४॥ ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्राः स्त्रियश्चान्तरजास्तथा । सर्व एव प्रपद्येरन् सर्वधातारमच्युतम् ॥१५॥ इसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ तथा अन्त्यज जैसे छोटी जातियों के किसी भी श्रद्धाभावयुक्त व्यक्ति को सभी प्राणियों के अधिपति अच्युत श्रीविष्णु की प्रपत्ति में प्रणत होकर 'न्यास' योग को विधिवत् प्रस्तुत कर देना चाहिए॥१५॥ प्रपत्तिं कारयन्त्येव सर्वभूतानि साधवः । अनपायहता सा तु तस्य तस्याशु सिद्धिदा ॥१६॥ प्रपत्ति सदैव अपायनिपहतस्वरूप है अतएव इस प्रपत्ति को सभी प्राणिजन को १ चेतना के अन्तर से व्यवधान होने की संभावना हो जाती है, यही प्रपत्ति की अशुद्धिमयी स्थिति है तथा इससे श्रीविष्णु की सायुज्य आदि प्राप्ति में विघ्न आकर विलम्ब हो सकता है। २ यह प्रपत्ति या न्यासयोग जातिभेदादि की अपेक्षा नहीं करता है। यहाँ गुण पद से औदार्यादि गुण, क्रिया से योगादि क्रियाएँ, देश से पुण्यकाल तथा स्थान समझना चाहिए। ३ यहाँ अपाय शब्द पारिभाषिक है जिसका विवेचन अपायाधिकार में बतलाया जा रहा है। आशय यही है कि ये अपाय भी प्रपत्ति के स्वरूप को नष्ट नहीं कर सकते केवल उस साधक के प्राप्त होने वाले फल में विलम्ब मात्र उत्पन्न कर देते हैं।