नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित २७ —आपादक तथा साधनभूत है तथा यही अपने इष्ट देव (परमात्मा) के प्रति स्वात्मा —का न्यास या प्रपत्तिरूप है। अतः इसे ‘न्यास’ कहते हैं॥७॥ प्रायो गुणवशादेष कृतः सर्वत्र देहिनाम् । सर्वेषां साधयत्येव तांस्तानर्थानभीप्सितान् ॥८॥ अतः सत्वरज तमोगुण के पारवश्य विष्णु, ब्रह्मा तथा परमशिव आदि देवों के प्रति भी यह ‘न्यास’ किया जाए तो प्राणियों को इष्टअर्थों की प्रायः सिद्धि देता ही है (क्योंकि प्रपत्तिरूप अनुष्ठित न्यास का फल अवश्य होता है)॥८॥ अनन्तज्ञानशक्त्यादिकल्याणगुणसागरे । परे ब्रह्मणि लक्ष्मीशे मुख्योऽयं सर्वसिद्धिकृत् ॥९॥ परन्तु अनन्त, ज्ञान, शक्ति तथा कल्याण आदि गुणों के सागर जो परब्रह्म रूप लक्ष्मीपति श्री विष्णु है उनके प्रति मुख्यरूप में अर्थात् श्रेष्ठ पद की प्राप्ति तक के लिये यदि यह ‘न्यास’ किया जाए तो सम्पूर्ण सिद्धियों का प्रदाता और आपादक रहता है॥९॥ प्रशासितुरशेषाणामात्मनां परमात्मनः न हि प्रसादनं विष्णोरन्यदात्मार्पणादृते ॥१०॥ परमात्मस्वरूप श्री विष्णु के प्रति आत्मार्पण रूप न्यास के अतिरिक्त अन्य कोई प्रसन्नता देने वाला (अन्य) साधन नहीं है क्योंकि श्री विष्णु सम्पूर्ण जीवों के नियन्ता हैं॥१०॥ अहमस्मि तवैवेति प्रपन्नाय सकृत् स्वयम् । देवो नारायणो श्रीमान् ददात्यभयमुत्सुकः ॥११॥ यदि इन भगवान् श्री विष्णु के प्रति प्रपन्नभाव से एक बार भी हे प्रभो!, मैं तो आपका ही भक्त हूं, कहकर स्वयं को न्यस्त कर दे तो भगवान् श्री नारायणदेव स्वयं ही करुणावश भक्त के प्रति उत्सुक होकर उसे अभय प्रदान कर देते हैं॥११॥ आत्यन्तिकीमनिष्टानां सद्यः शान्तिमभीप्सताम् । प्रपत्तिरञ्जसा कार्या न त्वशुद्धमुखी क्वचित् ॥१२॥ १ मोक्ष के प्रयोजन से सम्पन्न न्यास का विषय तथा लक्ष्य श्रीविष्णुरूप परब्रह्म ही होते हैं, यह बात इस कारिका से दिखलाई गयी हैं, अतएव यह सभी सिद्धियों को देने वाला सर्वोत्तम उपाय है। २ प्रपति या न्यास के अतिरिक्त शीघ्रता से मोक्ष का सम्पादक दूसरा साधन नहीं है यह सिद्धांत भी इस कारिका से उपाय निदर्शनपूर्वक कहा गया है।