नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ३५ शान्तोऽनसूयुः श्रद्धावान् गुर्वर्थार्पितमद्वृत्तिकः । शुचिः प्रियहितो दान्तः शिष्यश्चोक्तो मनीषिभिः ॥४६॥ विद्वान ऐसे गुणवाले को जो कि शान्त प्रकृतिवाला, किसी से भी असूया न रखनेवाला, अर्थराशि तथा अपने कार्यों को जो आपने गुरुजन के लिये करने में उद्यत हो (अपनी वृत्ति भी गुरू के हित में चलाने वाला हो) शुद्ध वृत्ति तथा आचरणशील, अपने आचार्य के प्रिय तथा हित में तल्लीन रहनेवाला तथा अपनी इन्द्रियों को वश में रखनेवाला, अतिशय आसंग से हीन जो रहता हो उसे 'शिष्य' समझना चाहिए तथा जो उपदिष्ट अर्थ के ग्रहण करने में समर्थ बुद्धिवाला या दक्ष हो॥४६॥ न मत्तोन्मत्तपतिताभिशस्तक्रूरनास्तिकाः । नानर्थिनो न चाज्ञाताः कर्तव्याः मन्त्रगामिनः ॥४७॥ अतएव जो मत्त या उन्मत्त प्रकृति के हों, जो पतित हों, जो अभिशस्त क्रूर तथा नास्तिक हो, जो अर्थ के बोध में असमर्थ हों तथा जिनका कुलादि परिचय न हो तो ऐसे शिष्यों को न्यास का मन्त्रोपदेश नहीं दिया जावे॥४७॥ स्त्रीणाञ्च पतिमित्रादीननतिक्रम्य सत्तमान् । अनुज्ञया वाप्यन्येभ्यः स्मृतो मन्त्रपरिग्रहः ॥४८॥ स्त्रियों के पति, मित्र, पिता तथा श्वसुर जैसे सम्बन्धियों तथा श्रेष्ठ विद्याओं से युक्त जन को न छोड़कर अथवा अन्यों से भी अपने पूज्यजन से अनुमति लेकर मन्त्रग्रहण किया जा सकता है (पति, पिता तथा अन्य सम्मान्य पुरुष हों तो उनसे भी अनुज्ञा लेकर मन्त्र ग्रहण किया जा सकता है)॥४८॥ वैदिकास्तान्त्रिकाश्चैव यथार्था लौकिकास्तथा । प्रपत्तौ विहिता मन्त्रास्तत्र तत्र व्यवस्थया ॥४९॥ इस न्यास विधि में प्रपत्ति के लिये वैदिक, तान्त्रिक, उन मन्त्रों के अर्थवाले लौकिक भाषा वाले मन्त्रों को भी विहित माना गया है। ये मन्त्र यथेष्ट दिये जा सकते हैं तथा ये आचार्य के अधिकारी भेद की व्यवस्था के अनुगत होते हैं॥४९॥ न्यासिनो न्यास एव स्यान्निष्ठा तत्पूर्विकाः क्रियाः । व्यापकैर्नैष्ठिकैर्वाह्यैः कुर्यात् तेऽप्यर्पणे सताः ॥५०॥ १ कारिका में प्रयुक्त यथार्थ पद का आशय है कि ऐसे मन्त्र जो वैदिक तथा तन्त्रशास्त्र के मन्त्रों के समान शब्द या अर्थवाले हों तो वे यथार्थ मन्त्र होते हैं। यहाँ व्यवस्था यही है कि आचार्य त्रैवर्णिक शिष्यों को उनकी सामर्थ्य के तथा बुद्धि के अनुरूप वैदिक मन्त्र तथा तन्त्रादि आगमों से प्राप्त मन्त्र की दीक्षा दे सकते हैं। इसी प्रकार अत्रैवर्णिक अशूद्रादि को भी आगमिक मन्त्र, प्रतिलोमज जाति के शिष्य को वैदिकादि के समानार्थक उपयुक्त मन्त्र को तथा लौकिक भाषा के मन्त्रों को दिया जा सकता है।