भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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३६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता जिसे आचार्य न्यास विधि में प्रपत्ति प्रतिपादक मन्त्र देवें उसे उसमें निष्ठा रखना चाहिए तथा वह उसी का नित्य जपादि करे। अर्चनादि किया भी उसी मन्त्र को ध्यान में रखते हुए रखे। अथवा यह कार्य व्यापकों अर्थात् आम्नात मन्त्रों के तथा नैष्ठिक मन्त्रों के जो दीक्षा प्राप्त मन्त्र रत्न से भिन्न हो तो उनसे भी किया जा सकता है। ये मन्त्र भी न्यास या प्रपत्ति में मान्य होते हैं। क्योंकि ऐसे मन्त्र भी 'नमः' आदिशब्दों से युक्त रहने से इनसे भी प्रपत्ति की स्थिति या प्रतिपादकता बनती ही है॥५०॥ करेण संस्पर्शयन् गात्रं मन्त्रविद् भावयेद् दृशा । एषा वा सर्ववर्णानां दीक्षेत्याह मुनिः स्वयम् ॥५१॥ मन्त्र-विधाता आचार्य अपने हाथ से शिष्य के शरीर का स्पर्श करते हुए तथा उसे (अपनी दृष्टि से) देखते हुए दीक्षा मन्त्र प्रदान करें। सभी वर्णों को दी जाने वाली दीक्षा का यही मान्य सिद्धान्त है। जो भारद्वाज मुनि ने स्वयं कहा है॥५१॥ यां सिद्धिं वैष्णवैर्मन्त्रैराधत्ते वैष्णवो गुरुः । सर्ववेदधरोऽप्यन्यो नान्यैः कुर्वीत् तादृशीम् ॥५२॥ मन्त्रदीक्षा-प्रदाता आचार्य जिन वैष्णव मन्त्रों से जितनी सिद्धि प्राप्त किये रहता है वह सभी वेदों के ज्ञाता भी अन्य गुरू दूसरे अवैष्णव मन्त्रों से वैसी सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता है॥५२॥ वैदिकास्तान्त्रिकाश्चैव द्वये मुख्या द्विजन्मनाम् । शूद्रानुलोमजातीनां मन्त्राः स्युस्तान्त्रिकाः परम् ॥५३॥ भाषाख्या लौकिका मन्त्राः प्रपत्त्यर्थविभावनावः । सर्वेभ्यः प्रतिलोमेभ्यो देयाः कामं द्विजातिभिः ॥५४॥ द्विजों में दो प्रकार के साधक मुख्य होते हैं-जिनमें एक वैदिक तथा दूसरे तान्त्रिक (आगमिक) हैं। इनमें जो शूद्र वर्ण तथा अनुलोम-जातियों में उत्पन्न जन हैं उनके हितकर (तथा उनसे साध्य) तान्त्रिक-मन्त्र (होते) हैं। ये लौकिक-भाषाओं में (भाषाओं में) भी प्राप्त होते हैं जो लौकिक मन्त्र के रूप में प्रपत्ति के भावों को दिखलाने वाले होते हैं । ऐसे उपयोगी मन्त्रों को भी ब्राह्मण आँचायों तथा दीक्षा गुरुओं के द्वारा ही सभी शूद्र तथा प्रतिलोम जाति के भक्त शिष्यों को दीक्षापूर्वक यथेष्ट रूप में ग्रहण करना चाहिए॥५३-५४॥ १. सभी प्रकार के मन्त्रों को शिष्य की क्षमता आदि का विचार कर दीक्षादाता आचार्य के द्वारा प्रदान किया जाए तथा ब्राह्मण आचार्य ही भाषा के मन्त्रों को भी दीक्षा के साथ प्रदान करें।