नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विप्र भी हो तो वह दीक्षादाता आचार्य नहीं हो सकता है। इसी प्रकार जो कम अवस्था या आयुवाला और अपकृष्टजाति का गुणशाली भी पुरुष हो तो वह क्रमशः अपने से प्रकृष्टजाति के साधक को मन्त्रादि दीक्षा प्रदान करने वाला ‘आचार्य’ नहीं होगा। यदि कोई आपद्धर्म की स्थिति न हो परन्तु आपद्धर्म में ऐसी विज्ञ तथा हीन जाति भी आचार्यरूप में ली जा सकती है॥४१॥ न जातु मन्त्रदा नारी न शूद्रो नान्तरोद्भवः । नाभिशस्तो न पतितः कामकामोऽप्यकामिनः ॥४२॥ आपद स्थिति में हीनजाति के (द्वारा दीक्षित होने में) आचार्यत्व की अनुमति रहने पर भी कोई स्त्री मन्त्र की देनेवाली नहीं रखनी चाहिए और न ही कोई प्रतिलोमजाति में। उत्पन्न शुद्र ही मन्त्रदाता होता है। इसी प्रकार जो महापातकी या पतित हो तो उसे भी मन्त्रदाता आचार्य नहीं रखते हैं तथा जो सांसारिक कामनाओं से रहित हों तो उसे भी मन्त्रदाता नहीं रखा जावे॥४२॥ स्त्रियः शूद्रादयश्चैव बोधयेयुर्हिताहितम् । यथार्हं माननीयाश्च नार्हन्त्याचार्यतां क्वचित् ॥४३॥ स्त्री तथा शूद्रादि हिताहित की सलाह दे सकते हैं तथा वे अपनी स्थिति के अनुरूप सम्मान के भी अधिकारी होते हैं परन्तु उन्हें मन्त्रदाता आचार्य के रूप में नहीं रखा जा सकता है॥४३॥ किमप्यत्राभिजायन्ते योगिनः सर्वयोनिषु । प्रत्यक्षितात्मनाथानां नैषां चिन्त्यं कुलादिकम् ॥४४॥ इस संसार में योगीजन अनेक निकृष्ट तथा उत्तम योनि तथा जातियों में जन्म ले लेते हैं अतः जिसने अपनी साधनाओं के कारण भगवत्-तत्त्व का साक्षात्कार प्राप्त कर लिया हो ऐसे योगीजन के लिये कुलादि का विचार नहीं माना जाता है। अतः ऐसे किसी भी योगी से मन्त्रदीक्षा लेना निषिद्ध नहीं है॥४४॥ विश्वात्मन्यात्मनो न्यासं धिया वृत्तिञ्च शाश्वतीम् । मन्त्रेणोच्चारयेद् यस्तु स आचार्यः परो मतः ॥४५॥ जो विहित आचार दृष्टि तथा भक्ति के तात्विक भावों से युक्त मन्त्र का उच्चारण कर उपकारातिशय के भाव के कारण सभी के अन्तर्यामी भगवान् में अपने शिष्यको प्रपत्ति के रूप में न्यास-योग का सम्पादन करवाता हो तथा अपने ज्ञान से जो शाश्वती-वृत्ति को मन्त्रों के द्वारा कहलवाता हो तो उसे परम या उत्तम आचार्य माना जाता है॥४५॥