भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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२४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विषय श्लोक संख्या पृष्ठ परिशिष्टे प्रथमोऽध्यायः १-१०० ८८-१०७ भरद्वाजमुनि द्वारा शेष धर्मों का पुनः कथन १-९ ८८-८९ एकान्ती साधक के शुद्धादि प्रभेद १०-१५ ९०-९१ आराध्य श्रीहरि की अर्चा तथा उसका फल १६-२६ ९१-९३ एकान्ती के गुणात्मक प्रभेद तथा लक्षण २७-३३ ९३-९४ एकान्ती का विहित आचार तथा वर्जनीय कर्म ३४-५१ ९५-९८ एकान्ती का चक्राद्यङ्क धारणादि आचार ५२-६० ९८-९९ चक्राद्यङ्कन संस्कार विधान अधिकारी तथा आचार ६१-६९ ९९-१०१ इष्टदेव श्रीहरि का अर्चादि विवरण ७०-८४ १०१-१०४ एकान्ती द्वारा विरुद्धाचार परिवर्जनादि कर्म ८५-९२ १०४-१०५ न्यासयोग की महत्ता ९३-१०० १०५-१०७ परिशिष्टे द्वितीयोऽध्यायः १-१०० १०८-१२४ साधक को प्रदेय तापादि पञ्चसंस्कार तथा उनका विवरण १-५२ १०८-११६ संस्कारों के विहित मुहूर्त्तादि एवं अनुष्ठान ५३-५६ ११६-११७ साधक के उपासना के मध्य आने वाले प्रत्यवायादि के हेतु शान्त्यादि कर्म विधान ५७-१०० ११७-१२४ परिशिष्टे तृतीयोऽध्यायः १-१०० १२५-१४४ सद्‌वृत्ति तथा एकान्ती के विहित धर्मादि न्यासयोग तथा उसका महत्व ३७-५३ १३१-१३४ वृत्ति, सत्सेवन एवं अर्चादि कर्म ५४-६९ १३५-१३८ न्यासोपदेष्टा गुरु तथा उपदेशग्रहणादि ७०-८१ १३८-१४० कुदृष्टि एवं ऐसे जन का संवास त्याग का उपदेश ८१-१०० १४०-१४४ परिशिष्टे चतुर्थोऽध्यायः १-९८ १४५-१६१ न्यासयोग के उपयुक्त वृत्ति तथा उसका मूलादि १-२४ १४५-१४९ विहिताचार तथा उसका स्वरूपादि २५-३५ १४९-१५० भक्ति तथा उसके कार्य ३६-४५ १५०-१५२ सत्स्वरूप तथा सत्सेवनगत आचार ४६-७२ १५३-१५६ अन्य विरोधीशास्त्र, असदाचार का परित्याग तथा वृत्ति का सेवनीय पक्ष- ७३-९८ १५७-१६१ निरूपण-