नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५ ॐ नारदपञ्चरात्र-भारद्वाजसंहिता तत्त्वप्रकाशिकाख्याभिनवहिन्दीव्याख्यया सहिता अथ न्यासोपदेशो नाम प्रथमोऽध्यायः श्रुत्वा तु सकलान् धर्मान् सिद्धिमेषाञ्च शाश्वतीम् ॥ भूय एव मुनिश्रेष्ठमिदमूचुर्महर्षयः ॥१॥ ॐ नमः परब्रह्मणे अथ न्यासोपदेश नामक प्रथम-अध्याय समस्त निःश्रेयससाधनों के आपादक धर्मों¹ को तथा उन उन धर्मों तथा विद्याओं के विषय, प्रतिपादित इष्ट देवताओं के नियत गुणादि एवं उनके द्वारा प्राप्त होने वाली फलभूत सिद्धियों को सुन लेने के बाद भी महर्षिगण मुनिश्रेष्ठ भारद्वाज से पुनः प्रश्न की भावना से इस प्रकार बोले॥१॥ केनोपायेन भगवन्निह सर्वेऽपि जन्तवः । प्राप्नुयुः परमां सिद्धिं सद्यो विगतकल्मषाः ॥२॥ हे भगवन्, इस लोक में सभी प्राणी अपने अपने कल्मषों को सद्यः दूर करते हुए परमनिःश्रेयस् की प्राप्ति किस उपाय से कर सकते हैं, इसे हमें बतलाइये²॥२॥ १ यहाँ प्रयुक्त धर्मशास्त्र सम्मत सामान्य धर्म का बोधक होकर भी प्रकरण के अनुरोध के कारण अलौकिक निःश्रेयस परक भी है तथा कारिका में दिये हुए बहुवचन से उन उन विद्याओं में प्रदर्शित परमेश्वर के नियत गुणविशेष तथा विद्याओं की अनेक शाखाओं को भी संकेतित किया गया है। २ सभी वर्णों के अधिकार वाला तथा अपेक्षित काल एवं मोक्ष के फल को सम्पादन करनेवाला शीघ्र फलदायी उपाय क्या है (जो अतिशय पीड़ा या आर्ति वाले प्राणी को बिना किसी व्यवधान या विलम्ब के मोक्ष का सम्पादन कर दे, ऐसा उपाय क्या है।)