नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता वेद-वेदान्त-विज्ञानं विश्वासो गोप्तरि स्वयम् । गोप्तृत्ववरणादन्यन्न विष्णोरर्चनादिकम् ॥७८॥ प्रपत्तेहर्यात्मनि क्षेपो दास्यचिह्नैकलक्षणः । सतां देशिकमुख्यानां सेवा कार्पण्यमुच्यते ॥७९॥ १अपने धर्म में जो विहित आचरण के कारण अभिरति का हो जाना है वही प्रपत्ति में अनुकूलता की प्राप्त करता है और यही प्रतिषिद्ध कर्मों के प्रति वर्जन या निषेधभाव को प्राप्त कर ऐसे कर्मों से प्रतिकूलता भी प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार आगे इसी वृत्ति से वेद तथा वेदान्त के विशेष ज्ञान में यह वृत्ति प्रविष्ट होकर ज्ञान प्राप्त कर लेती है जो स्वयं अपने संरक्षक इष्टदेव के द्वारा रक्षा की भावना को उत्पन्न कर विश्वास को उत्पन्न कर देती है तथा इस प्रकार अपने इष्टदेव श्रीभगवद्विष्णु को संरक्षण के रूप में वरण से अन्य कार्य बन जाता है (क्योंकि यही 'भक्ति' बन जाती है) तब इस कार्य के द्वारा अपने आत्मा को प्रपन्नभाव से इष्ट के प्रति अर्पण करने पर 'न्यासयोग' सम्पन्न हो जाता है। जिसमें इष्ट की दास्यता के चिह्नों का धारण करना एक लक्षण होकर यही वृत्ति आगे अपने उपदेश या मन्त्र-प्रदाता मुख्य गुरु (देशिक मुख्य आचार्य) की सेवा वृत्ति के भाव से प्रपत्ति की करुणामयी स्थिति में जाकर अवस्थित हो जाती है॥७७-७९॥ अतः प्रपत्तिरेवेह वृत्तिर्भवति शाश्वती । तस्यैवास्मीति बोधात्मा प्रवृत्तिर्वृत्तिरेव वा ॥८०॥ अतएव प्रपत्तिभाव को ही शाश्वत स्थितिवाली 'वृत्ति' समझना चाहिए (या यही शाश्वत 'वृत्ति' कहलाती है) इसी का 'अस्मीति' भाव में होने वाला विबोध होता है। अतः प्रपत्ति ही शाश्वत वृत्ति है॥८०॥ तदेवं भगवान् प्रीतः प्रपत्या साधनं परम् । तयैव वृत्तिवपुषा प्रीतः फलमपि स्वयम् ॥८१॥ इस प्रकार इस प्रपत्ति के द्वारा प्रीत श्रीमद्भगवान् ही फलरूप या प्राप्तव्य होकर फल भी हो जाते हैं। जिसमें पर-साधन है प्रपत्ति तथा इसी प्रपत्तिवृत्ति से प्रसन्न हो जाने वाले श्रीविष्णु ही तब स्वयं फलरूप हो जाते हैं॥८१॥ १ यहाँ 'या स्वधर्मेषु' इत्यादि से मुनि ने प्रपत्ति तथा वृत्ति की समभेद रूप दशा दिखलाई है। २ यहाँ प्रपत्ति के उपायोपेयभाव का श्रीभगवदुपायोपेय भाव निबन्धन रूप रहने के कारण श्रीभगवद् का ही साक्षात् उपायोपेयभाव है यह तथ्य स्पष्ट होता है।