भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित ४१ उसका ज्ञान तथा ४-उसी की भक्ति ५-उसी इष्टदेव भगवान् श्री विष्णु के शंखादि चिन्ह (लाञ्छनादि) का धारण करना तथा ६-सन्तों की या पूज्य आचार्यों की सेवा करना॥७२॥ अनन्यरतिरत्यन्तं विहितानि समाचरन् । वर्जयन् प्रतिषिद्धानि वेदवेदान्ततत्ववित् ॥७३॥ अपने इष्ट के प्रति अनन्य या अत्यन्त निष्ठा या भक्ति रखना तथा इष्ट देव के अतिरिक्त अन्यों के प्रति निवर्तन का भाव रखना ही दृष्टि या 'ज्ञान' है। यही उस वेद और वेदान्त के तत्ववेत्ता के द्वारा किया जाए और इसी प्रकार की वृत्ति वह रखे॥७३॥ अर्च्चादिष्वर्चयन् विष्णुमङ्कितो हरिलाञ्छनैः । सेवते यद् गुरून् भक्त्या सेयं वृत्तिः परा मता ॥७४॥ इस वृत्ति में स्थित रहते हुए इष्टदेव श्रीविष्णु की अर्चनादि के द्वारा पूजन करते हुए तथा अपने शरीर को श्रीहरि के लांछनों से अंकित रखकर वह जब पूज्य गुरुजन की भक्तिपूर्वक सेवा करता है तो यह श्रेष्ठ वृत्ति मानी गयी है॥७४॥ स्वाभाविकोऽस्य सम्बन्धः पुंसो यः परमात्मना । तस्यैव बोधो न्यासाख्यः प्रथमं यात्युपायताम् ॥७५॥ इस प्रकार इस उपासक या भक्त (जीव) का परमेश्वर श्रीविष्णु के साथ जो स्वाभाविक भाव से स्वामी तथा सेवकरूप में जो सम्बन्ध हो जाता है इसका बोध रहना ही 'न्यास' (नामक रूप) होकर प्राथमिकरूप से श्रीभगवान् की अनुग्रह प्राप्ति में साधनभूत उपाय बनता है॥७५॥ स एवोपर्य्युपर्य्यस्य परां प्रीतिमुपावहन् । वृत्त्याख्यां फलतां याति तदेवामृतमुच्यते ॥७६॥ यही सम्बन्ध धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए श्री भगवान् की परम प्रीति को उत्पन्न करते हुए वृत्तिरूप फल का आकार धारणकर लेता है जो 'अमृत रूप' कहा जाता है (अर्थात् इस वृत्ति का फल ही 'अमृतत्व' है)॥७६॥ या स्वधर्मेष्वभिरतिः सा भवत्यनुकूलता । वर्जनं प्रतिषिद्धानां तथैषा प्रतिकूलता ॥७७॥ १ अमृतरूप अर्थात् मोक्ष जो कि वृत्ति का फल है। इसमें जीव परमात्म सम्बन्ध का ज्ञान प्रथम उपाय तथा बाद में वृत्ति के फलरूप मोक्ष की स्वरूप प्राप्ति होती है क्योंकि मोक्ष के स्वरूप का आविर्भूत होना मोक्ष माना गया है।