नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता (उन्हें) मिल जाना ही पूर्वपुण्यों का फल होता है तथा उस लोक में भी परेश श्रीविष्णु की कामना के संकल्प रहने से स्वच्छन्दरूप में उन्हें श्रीभगवद्विष्णु के प्रसाद से स्वाभिमत मोक्ष की (उनके किंकर भाव से युक्त) प्राप्ति भी हो जाती है।१॥६८॥ निक्षिप्यात्मानमात्मीयमशेषमखिलात्मनि । क्रियाश्च सकलास्तत्र वर्तन्ते वीतकल्मषाः ॥६९॥ मन्यते च स्वकीयान्नः स्वप्रीतयै स्वोचितां स्वयम् । नाथः स्वकीयसेवां तां वृत्तिं कारयतीति वै ॥७०॥ जो अखिलभुवनों के अधिपति श्रीभगवान् विष्णु में स्वयं की आत्मा को अर्पित या स्थापित कर भगवदनुसन्धान में अपना समय बिताते हैं तथा सभी क्रियाएं भी भगवदर्पित कर देते हैं वे निष्पाप होकर ऐसे किसी भी वस्तु पर अपना अधिपत्य नहीं मानते तथा अपनी प्रीति के लिये किसी अन्य देव को अपने अर्चन के योग्य नहीं मानते हैं किन्तु ईश सेवा के आचरण में लगी हुई वृत्ति या जीविका को भी परमेश्वर के द्वारा करवाने वाली क्रिया के रूप में जो मानता है वह प्रपन्न या शरणागत भक्त “न्यासयोग” वाला है तथा उसे ही श्रीविष्णु का दास्यभाव प्राप्त रहता है॥६९-७०॥ (प्रपत्यधिकार समाप्त) यथा प्रपत्तिर्विहिता भगवच्चरणाम्बजयोः । तथैव तत्र वृत्तिश्च कार्या गुरुनिदेशतः ॥७१॥ उपासक या भक्त की वृत्ति की आगे व्याख्या करते हैं, जब उसने अपने मन तथा बुद्धि के द्वारा जिस शाश्वत वर्णानुक्रमागत वृत्ति को प्राप्त किया तथा भगवान् श्री विष्णु के चरणों में प्रपत्ति या न्यासदीक्षा प्राप्त कर ली हो तो उसे गुरु के निर्देश से उसी ‘वृत्ति’ का आचरण तथा तदनुरूप अर्चनादि अनुष्ठान करना चाहिये॥७१॥ वृत्तिश्च विहिताचारः प्रतिषिद्धविवर्जनम् । दृष्टिर्भक्तिस्तथा लक्ष्म सतां सेवेति षड्विधा ॥७२॥ यह वृत्ति छः प्रकार की है यथा - १ विहित कर्मों का आचरण करना, २-प्रतिषिद्ध कर्म हिंसादि का निषेध या आचरण न करना, ३-अपने इष्ट की ओर दृष्टि या १ यहाँ शास्त्र के अनुसार कथन का आशय यह है कि श्रीहरि के किङ्कर भाव में स्थित रहने या उस स्थिति का अनुभव करनेवाले मुमुक्षुजन तथा उसका फल प्राप्त करने वाले मुक्तजन में स्थितिभेद हट जाता है।