भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित ३९ इनमें से कुछ तो समस्त दुरित के अपहर्त्ता, सभी के प्रभु श्री विष्णु की शरण में किसी कामनाके अभिभूत होकर जाते हैं। ऐसे जन भी श्री विष्णु का दास्यभाव या भक्त की स्थिति प्राप्त नहीं करते हैं।१।।६४।। बहुजन्मकृतैः पुण्यैरात्मनः क्षीणकल्मषाः । हरिं सन्तः प्रपद्यन्ते तद्दास्यैकफलार्थिनः ॥६५॥ किन्तु अनेक जन्मों में पुण्य का आचरण करने के कारण उनसे अपने कल्मष या पापों को दूर कर लेने वाले सन्तजन ही उन श्रीविष्णुरूप के दास्यभाव की फलरूप में इच्छा रखने पर उन्हें प्राप्त करते हैं, क्योंकि वे उनके परब्रह्मरूप से अभिज्ञ हो जाते हैं।।६५।। कृतिनां वीतमोहानां केशवे निहितात्मनाम् । स्वदते केवलं दास्यं स्वधर्मकरणादिकम् ॥६६॥ परन्तु श्री विष्णु में अपनी आत्मा को निहित या समर्पित करने वाले तथा विगत-मोहादि-भाव वाले (अर्थपञ्चक विषयक अज्ञान से रहित) तथा अपने नियत धर्मों का आचरण करनेपर पवित्रभाव के कारण वे श्रीविष्णु के दास्यभाव का फलास्वादन करने में समर्थ होते हैं।।६६।। वासुदेवं प्रपन्नानां तद्दास्यैकरसात्मनाम् । भेदो वीतभयानां हि नात्र कश्चित् परत्र वा ।।६७।। अतएव जब अपने नियत धर्मों में स्थित रहने वाले होकर जो श्री वासुदेव की प्रपन्नता या शरणरूप समर्पण भाव को रखते हैं, जिसमें उनकी दास्यभावना की प्राप्ति के कारण आत्मानन्द का अनुभव हो जाता है तो ऐसे वीतभय या कहीं से प्राप्त किसी भी भय से मुक्त होकर इस लोक तथा परलोक में भेद भावना से रहित हो जाते हैं तथा प्रायः मुक्तिभाव की प्राप्ति करने वाले होते हैं।।६७।। इह श्रुत्यादिनियता वृत्तिरेव स्वयं फलम् । परत्र च परेशस्य कामात् कामप्रवृत्तयः ॥६८॥ ऐसे धर्मनिष्ठजन को इस लोक में श्रुति आदि से विहित वृत्ति वाली जीविका १ अर्थात् जिन श्रीविष्णु की समस्त पातकों के नाश करने की सामर्थ्य है उनकी क्षुद्र लौकिक अपेक्षावाली कामनाओं के वशीभूत होकर शरण ग्रहण करनेवाले एकान्तीभाव या उनके दास्य या प्रपत्ति के न्यासयोग को प्राप्त करने का अधिकार नहीं रखते है। २ कारिका में स्थित 'सन्त' पद का अर्थ है परमेश्वर श्रीविष्णु के स्वरूप से परिचितजन। 'अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदुः' से जिनका स्वरूप श्रुति भी बतलाती है। ३ वीतभय-जिसे कहीं से भय न आवे। यहाँ भी 'न बिभेति कुतश्चन' इस वचन को ध्यान में रखकर यह कहा गया है जो श्रुति अनुमोदित है।