नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
हिन्दीटीकासहित ३९ इनमें से कुछ तो समस्त दुरित के अपहर्त्ता, सभी के प्रभु श्री विष्णु की शरण में किसी कामनाके अभिभूत होकर जाते हैं। ऐसे जन भी श्री विष्णु का दास्यभाव या भक्त की स्थिति प्राप्त नहीं करते हैं।१।।६४।। बहुजन्मकृतैः पुण्यैरात्मनः क्षीणकल्मषाः । हरिं सन्तः प्रपद्यन्ते तद्दास्यैकफलार्थिनः ॥६५॥ किन्तु अनेक जन्मों में पुण्य का आचरण करने के कारण उनसे अपने कल्मष या पापों को दूर कर लेने वाले सन्तजन ही उन श्रीविष्णुरूप के दास्यभाव की फलरूप में इच्छा रखने पर उन्हें प्राप्त करते हैं, क्योंकि वे उनके परब्रह्मरूप से अभिज्ञ हो जाते हैं।।६५।। कृतिनां वीतमोहानां केशवे निहितात्मनाम् । स्वदते केवलं दास्यं स्वधर्मकरणादिकम् ॥६६॥ परन्तु श्री विष्णु में अपनी आत्मा को निहित या समर्पित करने वाले तथा विगत-मोहादि-भाव वाले (अर्थपञ्चक विषयक अज्ञान से रहित) तथा अपने नियत धर्मों का आचरण करनेपर पवित्रभाव के कारण वे श्रीविष्णु के दास्यभाव का फलास्वादन करने में समर्थ होते हैं।।६६।। वासुदेवं प्रपन्नानां तद्दास्यैकरसात्मनाम् । भेदो वीतभयानां हि नात्र कश्चित् परत्र वा ।।६७।। अतएव जब अपने नियत धर्मों में स्थित रहने वाले होकर जो श्री वासुदेव की प्रपन्नता या शरणरूप समर्पण भाव को रखते हैं, जिसमें उनकी दास्यभावना की प्राप्ति के कारण आत्मानन्द का अनुभव हो जाता है तो ऐसे वीतभय या कहीं से प्राप्त किसी भी भय से मुक्त होकर इस लोक तथा परलोक में भेद भावना से रहित हो जाते हैं तथा प्रायः मुक्तिभाव की प्राप्ति करने वाले होते हैं।।६७।। इह श्रुत्यादिनियता वृत्तिरेव स्वयं फलम् । परत्र च परेशस्य कामात् कामप्रवृत्तयः ॥६८॥ ऐसे धर्मनिष्ठजन को इस लोक में श्रुति आदि से विहित वृत्ति वाली जीविका १ अर्थात् जिन श्रीविष्णु की समस्त पातकों के नाश करने की सामर्थ्य है उनकी क्षुद्र लौकिक अपेक्षावाली कामनाओं के वशीभूत होकर शरण ग्रहण करनेवाले एकान्तीभाव या उनके दास्य या प्रपत्ति के न्यासयोग को प्राप्त करने का अधिकार नहीं रखते है। २ कारिका में स्थित 'सन्त' पद का अर्थ है परमेश्वर श्रीविष्णु के स्वरूप से परिचितजन। 'अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदुः' से जिनका स्वरूप श्रुति भी बतलाती है। ३ वीतभय-जिसे कहीं से भय न आवे। यहाँ भी 'न बिभेति कुतश्चन' इस वचन को ध्यान में रखकर यह कहा गया है जो श्रुति अनुमोदित है।
४० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता (उन्हें) मिल जाना ही पूर्वपुण्यों का फल होता है तथा उस लोक में भी परेश श्रीविष्णु की कामना के संकल्प रहने से स्वच्छन्दरूप में उन्हें श्रीभगवद्विष्णु के प्रसाद से स्वाभिमत मोक्ष की (उनके किंकर भाव से युक्त) प्राप्ति भी हो जाती है।१॥६८॥ निक्षिप्यात्मानमात्मीयमशेषमखिलात्मनि । क्रियाश्च सकलास्तत्र वर्तन्ते वीतकल्मषाः ॥६९॥ मन्यते च स्वकीयान्नः स्वप्रीतयै स्वोचितां स्वयम् । नाथः स्वकीयसेवां तां वृत्तिं कारयतीति वै ॥७०॥ जो अखिलभुवनों के अधिपति श्रीभगवान् विष्णु में स्वयं की आत्मा को अर्पित या स्थापित कर भगवदनुसन्धान में अपना समय बिताते हैं तथा सभी क्रियाएं भी भगवदर्पित कर देते हैं वे निष्पाप होकर ऐसे किसी भी वस्तु पर अपना अधिपत्य नहीं मानते तथा अपनी प्रीति के लिये किसी अन्य देव को अपने अर्चन के योग्य नहीं मानते हैं किन्तु ईश सेवा के आचरण में लगी हुई वृत्ति या जीविका को भी परमेश्वर के द्वारा करवाने वाली क्रिया के रूप में जो मानता है वह प्रपन्न या शरणागत भक्त “न्यासयोग” वाला है तथा उसे ही श्रीविष्णु का दास्यभाव प्राप्त रहता है॥६९-७०॥ (प्रपत्यधिकार समाप्त) यथा प्रपत्तिर्विहिता भगवच्चरणाम्बजयोः । तथैव तत्र वृत्तिश्च कार्या गुरुनिदेशतः ॥७१॥ उपासक या भक्त की वृत्ति की आगे व्याख्या करते हैं, जब उसने अपने मन तथा बुद्धि के द्वारा जिस शाश्वत वर्णानुक्रमागत वृत्ति को प्राप्त किया तथा भगवान् श्री विष्णु के चरणों में प्रपत्ति या न्यासदीक्षा प्राप्त कर ली हो तो उसे गुरु के निर्देश से उसी ‘वृत्ति’ का आचरण तथा तदनुरूप अर्चनादि अनुष्ठान करना चाहिये॥७१॥ वृत्तिश्च विहिताचारः प्रतिषिद्धविवर्जनम् । दृष्टिर्भक्तिस्तथा लक्ष्म सतां सेवेति षड्विधा ॥७२॥ यह वृत्ति छः प्रकार की है यथा - १ विहित कर्मों का आचरण करना, २-प्रतिषिद्ध कर्म हिंसादि का निषेध या आचरण न करना, ३-अपने इष्ट की ओर दृष्टि या १ यहाँ शास्त्र के अनुसार कथन का आशय यह है कि श्रीहरि के किङ्कर भाव में स्थित रहने या उस स्थिति का अनुभव करनेवाले मुमुक्षुजन तथा उसका फल प्राप्त करने वाले मुक्तजन में स्थितिभेद हट जाता है।
हिन्दीटीकासहित ४१ उसका ज्ञान तथा ४-उसी की भक्ति ५-उसी इष्टदेव भगवान् श्री विष्णु के शंखादि चिन्ह (लाञ्छनादि) का धारण करना तथा ६-सन्तों की या पूज्य आचार्यों की सेवा करना॥७२॥ अनन्यरतिरत्यन्तं विहितानि समाचरन् । वर्जयन् प्रतिषिद्धानि वेदवेदान्ततत्ववित् ॥७३॥ अपने इष्ट के प्रति अनन्य या अत्यन्त निष्ठा या भक्ति रखना तथा इष्ट देव के अतिरिक्त अन्यों के प्रति निवर्तन का भाव रखना ही दृष्टि या 'ज्ञान' है। यही उस वेद और वेदान्त के तत्ववेत्ता के द्वारा किया जाए और इसी प्रकार की वृत्ति वह रखे॥७३॥ अर्च्चादिष्वर्चयन् विष्णुमङ्कितो हरिलाञ्छनैः । सेवते यद् गुरून् भक्त्या सेयं वृत्तिः परा मता ॥७४॥ इस वृत्ति में स्थित रहते हुए इष्टदेव श्रीविष्णु की अर्चनादि के द्वारा पूजन करते हुए तथा अपने शरीर को श्रीहरि के लांछनों से अंकित रखकर वह जब पूज्य गुरुजन की भक्तिपूर्वक सेवा करता है तो यह श्रेष्ठ वृत्ति मानी गयी है॥७४॥ स्वाभाविकोऽस्य सम्बन्धः पुंसो यः परमात्मना । तस्यैव बोधो न्यासाख्यः प्रथमं यात्युपायताम् ॥७५॥ इस प्रकार इस उपासक या भक्त (जीव) का परमेश्वर श्रीविष्णु के साथ जो स्वाभाविक भाव से स्वामी तथा सेवकरूप में जो सम्बन्ध हो जाता है इसका बोध रहना ही 'न्यास' (नामक रूप) होकर प्राथमिकरूप से श्रीभगवान् की अनुग्रह प्राप्ति में साधनभूत उपाय बनता है॥७५॥ स एवोपर्य्युपर्य्यस्य परां प्रीतिमुपावहन् । वृत्त्याख्यां फलतां याति तदेवामृतमुच्यते ॥७६॥ यही सम्बन्ध धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए श्री भगवान् की परम प्रीति को उत्पन्न करते हुए वृत्तिरूप फल का आकार धारणकर लेता है जो 'अमृत रूप' कहा जाता है (अर्थात् इस वृत्ति का फल ही 'अमृतत्व' है)॥७६॥ या स्वधर्मेष्वभिरतिः सा भवत्यनुकूलता । वर्जनं प्रतिषिद्धानां तथैषा प्रतिकूलता ॥७७॥ १ अमृतरूप अर्थात् मोक्ष जो कि वृत्ति का फल है। इसमें जीव परमात्म सम्बन्ध का ज्ञान प्रथम उपाय तथा बाद में वृत्ति के फलरूप मोक्ष की स्वरूप प्राप्ति होती है क्योंकि मोक्ष के स्वरूप का आविर्भूत होना मोक्ष माना गया है।
४२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता वेद-वेदान्त-विज्ञानं विश्वासो गोप्तरि स्वयम् । गोप्तृत्ववरणादन्यन्न विष्णोरर्चनादिकम् ॥७८॥ प्रपत्तेहर्यात्मनि क्षेपो दास्यचिह्नैकलक्षणः । सतां देशिकमुख्यानां सेवा कार्पण्यमुच्यते ॥७९॥ १अपने धर्म में जो विहित आचरण के कारण अभिरति का हो जाना है वही प्रपत्ति में अनुकूलता की प्राप्त करता है और यही प्रतिषिद्ध कर्मों के प्रति वर्जन या निषेधभाव को प्राप्त कर ऐसे कर्मों से प्रतिकूलता भी प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार आगे इसी वृत्ति से वेद तथा वेदान्त के विशेष ज्ञान में यह वृत्ति प्रविष्ट होकर ज्ञान प्राप्त कर लेती है जो स्वयं अपने संरक्षक इष्टदेव के द्वारा रक्षा की भावना को उत्पन्न कर विश्वास को उत्पन्न कर देती है तथा इस प्रकार अपने इष्टदेव श्रीभगवद्विष्णु को संरक्षण के रूप में वरण से अन्य कार्य बन जाता है (क्योंकि यही 'भक्ति' बन जाती है) तब इस कार्य के द्वारा अपने आत्मा को प्रपन्नभाव से इष्ट के प्रति अर्पण करने पर 'न्यासयोग' सम्पन्न हो जाता है। जिसमें इष्ट की दास्यता के चिह्नों का धारण करना एक लक्षण होकर यही वृत्ति आगे अपने उपदेश या मन्त्र-प्रदाता मुख्य गुरु (देशिक मुख्य आचार्य) की सेवा वृत्ति के भाव से प्रपत्ति की करुणामयी स्थिति में जाकर अवस्थित हो जाती है॥७७-७९॥ अतः प्रपत्तिरेवेह वृत्तिर्भवति शाश्वती । तस्यैवास्मीति बोधात्मा प्रवृत्तिर्वृत्तिरेव वा ॥८०॥ अतएव प्रपत्तिभाव को ही शाश्वत स्थितिवाली 'वृत्ति' समझना चाहिए (या यही शाश्वत 'वृत्ति' कहलाती है) इसी का 'अस्मीति' भाव में होने वाला विबोध होता है। अतः प्रपत्ति ही शाश्वत वृत्ति है॥८०॥ तदेवं भगवान् प्रीतः प्रपत्या साधनं परम् । तयैव वृत्तिवपुषा प्रीतः फलमपि स्वयम् ॥८१॥ इस प्रकार इस प्रपत्ति के द्वारा प्रीत श्रीमद्भगवान् ही फलरूप या प्राप्तव्य होकर फल भी हो जाते हैं। जिसमें पर-साधन है प्रपत्ति तथा इसी प्रपत्तिवृत्ति से प्रसन्न हो जाने वाले श्रीविष्णु ही तब स्वयं फलरूप हो जाते हैं॥८१॥ १ यहाँ 'या स्वधर्मेषु' इत्यादि से मुनि ने प्रपत्ति तथा वृत्ति की समभेद रूप दशा दिखलाई है। २ यहाँ प्रपत्ति के उपायोपेयभाव का श्रीभगवदुपायोपेय भाव निबन्धन रूप रहने के कारण श्रीभगवद् का ही साक्षात् उपायोपेयभाव है यह तथ्य स्पष्ट होता है।
हिन्दीटीकासहित ४३ विहितान्तर्गतान्येव दृष्ट्यादीनि तथापि तु । तेषां विशेषमान्यत्वात् पृथक् चाङ्गतया विधिः ॥८२॥ वृत्ति आदि से होने वाले ज्ञान या ‘दृष्टि’ आदि यद्यपि विहितकर्मों के अन्तर्गत ही है फिर भी इनकी विशेषरूप में मान्यता रहने के कारण इनकी अंगरूप विधि पार्थक्य रूप में स्थित मानी गई है॥८२॥ निषिद्धान्तर्गतान्येव विरुद्धान्यखिलान्यपि । हानं सर्वस्य चैकाङ्गं पृथग्व्याचक्षते परे ॥८३॥ इस प्रकार दृष्टि, लक्ष्म या चिह्नधारणादि तथा सत्सेवा जैसे कर्मों के आचरण के विपरीत रहनेवाले सभी कार्य विरुद्ध होने के कारण निषिद्ध कर्मों के अन्तर्गत आ जाते हैं। अतः ये सभी वर्ज्य है तथा इनकी प्रत्येक अंगके रूप में पृथक् से आगे व्याख्या की गयी है¹॥८३॥ आनुकूल्यस्य सङ्कल्पात् प्रातिकूल्यस्य वर्जनात् । प्राप्ते समस्तेऽपि तथा विश्वासादेः पृथग्विधिः ॥८४॥ इस प्रकार अनुकूल संकल्प को लेने के तथा प्रतिकूल आचारादि के निषेध के कारण समस्त विश्वासादि के सिद्ध हो जाने पर भी जैसे इन विश्वासादि की पृथक्रूप में विधि होती है, इसी प्रकार यहां समझना चाहिए॥८४॥ न कर्म हीनं ज्ञानेन न तत्तेन न ते अपि । भक्त्या ताभ्यां न सां तानि न वैराग्येण तन्न तैः ॥८५॥ क्योंकि ज्ञान की दृष्टि से रहित कर्म विहित नहीं होता है तथा यह ज्ञान भी कर्म से हीन या उसके बिना नहीं रहता और ये कर्म तथा ज्ञान दोनों ही भक्ति के बिना श्रीभगवान् की प्राप्ति में हेतु नहीं हो सकते हैं। ये कर्मादि भी वैराग्य के बिना नहीं और इन भक्त्यादि से रहित या प्रतिकूल निषेधादि भी भगवन् की प्रीति में हेतु नहीं बन सकते हैं॥८५॥ विहिताचरणं कर्म वैराग्यं निन्यवर्जनम् । ज्ञानं सुदृष्टिर्भक्तिस्तु हरिचिह्नसमाश्रया ॥८६॥ विहित आचार में स्थित रहना ‘कर्म’ है तथा निन्य या निषिद्ध कर्मों का परिवर्जन ही ‘वैराग्य’ कहलाता है। सम्यक् ‘दृष्टि’ है इष्ट का ध्रुव ज्ञान तथा यही हरि के १ इस पंक्ति का आशय है कि जैसे विहिताचार के अन्तर्गत दृष्टि आदि की पृथक् अङ्गरूप में विधि रखी जाती है इसी तरह प्रतिषिद्ध के वर्जन के अन्तर्गत दृष्ट्यादि के विरुद्ध वर्ज्य या हानि की पृथक् अंगके रूपमें स्थिति होगी। इस व्याख्या के कारण वृत्ति की षड्विधता के साथ एक अंग की और वृद्धि होती है।
४४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता चिन्हों का आश्रय लेकर रहने वाली 'भक्ति' कहलाती हैं॥८६॥ एवं चतुर्विधासेनां प्रीतिरूपां हरेः स्वयम् । यो वृत्तिमवमन्येत न हि तस्याऽस्ति निष्कृतिः ॥८७॥ इस प्रकार इस चार प्रभेदों वाली तथा श्रीहरि के प्रीतिभाव रखने वाले साधकभक्त की इन चारों वृत्तियों यथा-१ विहिताचार, २ दृष्टि, ३ भक्ति तथा ४ विरुद्धाचाररूप वर्जनात्मक वैराग्यरूप की जो अवमानना करता हैं उसका कोई भी प्रायश्चित नहीं हैं (अर्थात् वह महापातकी हैं)॥८७॥ न देवतान्तरपरा न च कस्यापि साधनम् । परं प्रसाद एवैषा वृत्तिर्विश्वात्मनो हरेः ॥८८॥ विश्वात्मा श्रीहरि की यह 'वृत्ति' परमप्रसाद स्वरूप ही समझना चाहिए क्योंकि इसमें न तो किसी अन्य देवता से सम्बन्ध हैं और न ही ये किसी काम्यकर्म में साधनरूप हैं क्योंकि ये तो केवल भगवत् प्रसन्नता की कारणीभूत स्थितिवाली होती हैं॥८८॥ देहस्यान्तिकलये मोक्षाख्ये सति सा पुनः । निःश्रेयसं परं ब्रह्म निर्वाणमिति चोच्यते ॥८९॥ भौतिक शरीर की आत्यन्तिक लीनभाव की दशा वाली मोक्ष नामक स्थिति के प्राप्त हो जाने पर तब यही वृत्ति निरवधि श्रेयरूप परब्रह्म विषयक बनकर 'निर्वाण' कहलाती हैं॥८९॥ प्रपन्नस्यापि हि पुनर्देहे कर्मकृते स्थिते । दुरितानि परां वृत्तिं दूषयन्ति मुहुर्बलात् ॥९०॥ तानि सर्वाण्यशेषाणि पापानि प्रशमं नयेत् । पुनः प्रपदनेनाशु कर्मभिर्वापि तत्परैः ॥९१॥ न्यासयोग में साधक के प्रपत्ति भाव में स्थित रहने पर तथा कर्मों के परिणामवश देह के विद्यमान रहने पर प्रपत्ति के सामर्थ्य से यह वृत्ति परम दूषणों का भी विनाश कर देती हैं (पातक इन परम वृत्तियों को दूषित कर देते हैं क्योंकि दूषणों का ऐसा सामर्थ्य होता है)। तब यही फिर से श्री विष्णु के प्रति प्रपत्तिपरक १ मुक्ति की दशा में भी कैङ्कर्य के पुरुषार्थरूप कारण से वृत्ति की भी कैङ्कर्य रूप स्थिति होती है इसलिये पुरुषार्थभूत तथा स्वाधीन इस वृत्ति के विषय में सदा सन्नद्धभाव रखना आवश्यक है। क्योंकि यही निरवधिश्रेय को मुक्तिरूप में परिणत करवाती है तथा निरवधिदुरितबन्धन की निवृत्ति करने के अनन्तर भी मोक्षरूप में फलती है अतः मोक्षफलरूपा यह वृत्ति अवधान के योग्य केन्द्रीभूत महत्व रखती है।
हिन्दीटीकासहित ४५ (भगवत्परक्) कर्मों के द्वारा उन सभी पातकों को (वह वृत्ति) क्षीण या नष्ट कर देती है तथा पातकों को शान्त कर देती है॥९०-९१॥ एकान्ती शक्तितः कुर्वन् विहितानि समुत्सुकः । तथैव प्रतिषिद्धानि त्यक्त्वा याति परां गतिम् ॥९२॥ अतएव इष्ट के प्रति उत्सुकभाव रखते हुए साधक या मन्त्र एकांत की स्थिति (वाला बनकर) में विहित कर्मों का शक्ति भर आचरण करें तथा इसी प्रकार प्रतिषिद्ध कर्मों का परित्याग करते हुए जीवन यापन कर अन्त में परमगति (मोक्ष) को प्राप्त करे॥९२॥ पाखण्ड-शैवशाक्तादि-तन्त्राचारलोकनादिकम् । स्वतो ब्रह्मशिवादीनां बद्धानामर्च Strad...नादिकम् ॥९३॥ ऊनधीः समताशङ्का विष्णोर्विस्मृतिरेव च । अनादरश्च तन्मन्त्रलक्षणार्चाक्रियादिषु ॥९४॥ तस्यैवात्यन्तिके दास्ये विमतिः कामकामिता । अविश्वासः प्रपदने साधनान्तरसंश्रयः ॥९५॥ साधनत्वाभिमत्या च निजधर्मस्य वर्जनम् । असच्छास्त्रेष्वभिरतिर्दिव्यशास्त्रावधीरणम् ॥९६॥ अभागवतसंसर्गो रीढा भागवतेषु च । मर्त्यसामान्यभावेन गुरौ चानतिगौरवम् ॥९७॥ दृष्टि विरुद्ध तत्वों में पाखण्डों (जैन तथा बौद्धागर्मों), शैव, शाक्त आदि तन्त्रों के अनुसार देवतार्चन आदि का करना तथा स्वयं ही गुणों से बद्ध ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवताओं का दृष्ट या इष्टभाव में अर्चनादि करना यह सभी 'भक्ति' के विरुद्ध कार्य माना जाता है।१ इसके अतिरिक्त अपने इष्ट की सामर्थ्य (या स्वरूपादि) में न्यूनताबुद्धि रखना, उनके समान दूसरे इष्ट की समता की मन में आशंका रखना, इष्टदेव विष्णु को विस्मरण कर देना तथा उनके मन्त्रों, लक्षणों तथा अर्चादि आस्था में उपेक्षा भाव का रखना दृष्टि तथा भक्ति के विरुद्ध कर्म माना गया है। अथवा प्रपत्ति से किये गये आत्यन्तिक दास्यभाव से विरुद्ध बुद्धि की स्थिति रखने लगना, किसी काम्य या इष्टभाव की इच्छा करना, प्रपत्ति के विषय में दृढ़ विश्वास में शिथिलता लाना या विधानों के अतिरिक्त दूसरे साधनों को (आश्रय) ग्रहण करना १. पाखण्ड जो वेद के प्रतिकूल है उनके साधनापथ का अनुशीलन या अनुमोदन करना भक्ति के मार्ग में बाधक होता है क्योंकि इससे दृष्टिभेद उत्पन्न होता है। अनेक गुणाश्रित देवगण का अर्चन भक्ति विरुद्ध कार्य है। ३
४६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता भी भक्ति के विरुद्ध माना जाता है। स्वयं के प्रपत्तिरूप धर्माचरण होने से अपने कु तथा वर्णाश्रम के उपयुक्त धर्मों से बाधा रहने के कारण प्रपत्ति का वर्जन करना त असच्छास्त्रों में रुचि ग्रहण करते हुए विष्णु देवता के अंकभूत शंखचक्रादि की उपे करना, भागवत-जन से संसर्ग न रखना¹, भागवतजन का तिरस्कार करना, अप दीक्षा तथा मन्त्रादि के प्रदाता गुरुजन को मानवरूप में सामान्य भाव से देखना त उन्हें अधिक गौरव प्रदान नहीं करना, ये सभी सत्सेवा के विपरीत कार्य क गये हैं॥९३-९७॥ इति भागवतस्योक्ताः प्रपन्नस्य विशेषतः । अपाया दुस्त्यजा ह्येते देह-बन्ध-निबन्धनाः ॥९८॥ इस प्रकार पूर्व में कही गयी ये सभी बातें विशेषकर दीक्षित तथा प्रपत्ति भाव न्यासयोग के आचरणकर्ता को भगवत् प्राप्ति के उपाय में संलग्न रहनेवाले त तन्निष्ठभाववालों के लिये वर्जित हैं। ये सभी यद्यपि देह धारण के कारण एक छोड़े नहीं जा सकते हैं परन्तु ये विषभूत हैं तथा इन्हें छोड़ना आवश्य है॥९८॥ एतानन्याँश्च विविधानपचारान् विशेषतः । सर्वानप्यनपाकृत्य नाप्नोति मधुसूदनम् ॥९९॥ इस प्रकार ऐसे अपचारों (विघ्नों) को तथा आगे कहे जाने वाले अपायों को भी ज तक हटाया नहीं जाएगा तब तक मधुसूदन श्रीविष्णु की अनुग्रह प्राप्ति सम्भव न होगी॥९९॥ अतो देहस्य कालुष्यान्मन्त्रमर्थेन केवलम् । आवर्त्तयन् सदा वृत्तिङ्कुर्वन् कालं नयेत् सुधीः ॥१००॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां न्यासोपदेशो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ इसलिये शरीर की कलुषता के कारण दीक्षा प्राप्त मन्त्र के अर्थादि चिन्तन बार-बा आवृत्ति करते हुए तथा विहित तथा आचारानुगत करते हुए जीवन के शेष समय बिताया जाए॥१००॥ नारदपंचरात्र आगम में 'भारद्वाज-संहिता' के न्यासोपदेश की 'तत्वप्रकाशिका' हिन्दी व्याख्या का प्रथम अध्याय सम्पूर्ण १ यहाँ विहिताचार विरुद्धता को ग्रन्थकार ने दिखलाया है तथा अगले अध्यायों में सत्सेवा के विरुद्ध का का विवरण दिया गया है। ये सभी अपायरूप हैं जिनकी हेयता अभीष्ट हैं।
हिन्दीटीकासहित ४७ अथ द्वितीयोऽध्यायः अथानानुकूल्यमुख्यानि प्रपत्त्यङ्गानि विस्तरात् । धर्माणां तद्विरुद्धानां स्वरूपञ्च निबोधत ॥१॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ अपने आराध्य इष्ट देव की अनुकूलता के लिये मुख्यरूप या स्थिति धारण करने वाले प्रपत्ति के अङ्गों का उसकें धर्मों का तथा प्रपत्ति के विरुद्ध धर्मों का अब विस्तार से स्वरूप तथा विवरण बतलाता हूं जिसे ध्यान देकर सुनिये।।१।। (इस द्वितीयाध्याय के आगे का विवरण देने वाला मूल भाग उपलब्ध नहीं हैं। ऐसा लगता है कि यह विच्छिन्न हो चुका है।) इति प्रपत्ति धर्मादिनिरूपणात्मकों द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
४८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अथ तृतीयोऽध्यायः अथ स्वकर्मनिरतः प्राज्ञो भक्तः सुलक्षणः । सत्सेवाभिरतो ह्येव प्रपन्नः सिद्धिमाप्नुयात् ॥१॥ (सत्सेवनाधिकारः) वृत्ति के अंगों के निदर्शन के साथ अब प्रपत्ति का विवेचन करते हैं:- तब दृष्टि सम्पन्न बुद्धिमान् एवं भगवत् लांछन से मण्डित भक्त अपने पूज्य सन्त की सेवा में निरत रहते हुए “प्रपत्ति” भाव में स्थित रहने पर सिद्धि की प्राप्ति करता है। (या निःश्रेयस को प्राप्त करता है)॥१॥ यथार्हं विहितैस्तैस्तैः संस्कारैः संस्कृतः क्रमात् । नयेदात्मगुणोपेतस्तानि तानि व्रतानि च ॥२॥ यह साधक या भक्त सर्वप्रथम उन विहित गर्भाधानादि संस्कारों से क्रमशः संस्कृ होकर सर्वभूतों के प्रति करुणादि आठ आत्मगुणों से युक्त रहकर तथा वेदव्रत जै नियत कर्मों को पूर्ण करे या उनका आचरण करे²॥२॥ ध्यात्वा नारायणं देवमादौ कर्म्माण्यशेषतः । तस्यैवाराधनया कुर्यात् सङ्कल्पपूर्वकम् ॥३॥ फिर सर्वप्रथम श्रीनारायण देव का ध्यान कर सभी कर्मों को उन्हीं के आराधन पर मानकर उसी देव की ही आराधना में अपने समस्त कर्मों का संकल्प पूर्वक आचर करें³॥३॥ समाप्तानि च कर्माणि तस्मिन्नेव समर्पयेत् । आदावन्ते च मन्त्राणां योजयेद् व्यापकान्तरम् ॥४॥ १ इस अध्याय में विहिताचार, दृष्टि, भक्ति, लक्ष्म तथा सत्सेवन का विवरण रहने से य संग्रहरूप श्लोक विषय प्रवर्तनरूप है। पूर्व में विहिताचार तथा दृष्टि आदि का कथन हुआ था औ निषिष्ठ विवर्जन की इस क्रम में चर्चा भी रहेगी। यह सभी इस एक श्लोक से संकेतित क है। २ प्रकृत कारिका से विहित आचारों का विवरण आरंभ किया गया है। ३ कारिका में प्रयुक्त तस्यैव पद से श्रीविष्णु की अर्चना की मुख्यता तथा प्रथम सम्पादन का संके है अतः अग्नि, इन्द्रादि का अर्चन करने में इस बात का ध्यान रखा जाना आवश्यक है।
हिन्दीटीकासहित ४९ अपने आराधनादि कर्मों की (प्रतिदिन की) समाप्ति पर उन्हें श्री भगवदर्पित करें। मन्त्रों के आदि में तथा अन्त में व्यापक का अन्तर योजित करें॥४॥ प्रातरुत्थाय विधिवत् स्नात्वा नित्यं समाहितः । यजेत कर्मभिस्तैस्तैर्विष्णुं देवादिसंज्ञितम् ॥५॥ फिर वह ब्राह्म मुहूर्त में (प्रातःकाल) उठे तथा विधिपूर्वक स्नान कर आगे विहित सन्ध्यावन्दनादि कर्म सम्पन्न कर एकाग्रभाव से विविध देव नामों वाले व्यापक श्रीविष्णु की उन उन विहित विधियों के साथ अर्चना करें॥५॥ ततश्च देवदेवेशं भोगैरभ्यर्चयेद् हरिम् । अशुद्धवर्जं सकलैः परिचारैः समन्वितम् ॥६॥ फिर देवों के अधिपति श्रीविष्णु की गन्ध-पुष्प नैवेद्यादि भोग्य पदार्थों के द्वारा परिचर्या कर अर्चना करें। इनमें अशुद्ध देवादि परिवारों को हटाते हुए सभी परिचर्या रखी जावे¹॥६॥ पूर्वमेव यथान्यायमभिगम्य जगद्गुरुम् । उपादाय च योगार्थान् सम्भारान्नियतः स्वयम् ॥७॥ यजेत पुरुषं साक्षाद् यथेच्छं प्रतिमादिषु । पञ्चरात्रेण विधिना गुर्वधीनोऽपरेण च ॥८॥ इस क्रम में सर्वप्रथम आचारादि का अनुसरण कर यथाविधान जगद्गुरु के समीप जाकर योग साधनों को ग्रहण करने के संकल्पों से नियत चित्त होते हुए उन सामग्री को रखकर फिर यथेच्छ भाव से साक्षात् शिला में या प्रतिमादि मे स्थित श्री हरि की अपने पूज्य गुरु के अधीन पञ्चरात्र प्रोक्त आगम के विधानानुसार अथवा श्रुति, स्मृति या पुराणादि में कथित विधि का अनुसरण करते हुए स्वयं अर्चना करे॥७-८॥ ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैः स्त्रीभिस्तथा परैः । यथार्हमर्च्यः सेव्यश्च नित्यं सर्वेश्वरो हरिः ॥९॥ प्रतिदिन अपनी स्थिति तथा भावना के अनुरूप ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों, स्त्रियों तथा अन्य अनुलोमादि सभी जातियों के द्वारा नित्य सर्वजगदधिपति श्री हरि की पूजा की जानी चाहिए²॥९॥ १ आशय यही कि अन्य देव परिवार या पंचायतन में स्थित श्रीविष्णु की सम्मिलितरूप में अर्चना के बजाय केवल श्रीविष्णु की केन्द्रीभूत अर्चना का विधान यथाशक्य सम्पन्न करना चाहिए। २ श्रीहरि की अर्चना नित्य क्रिया है। कहा भी है कि—'नित्यं सदा यावदायुर्र्न कदाचिदतिक्रमेत्' । अर्चन श्रीविष्णु का या पादुकादि का जैसी भी स्थिति हो करना चाहिए।
५० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अधिकप्रीतिरर्चायामेकान्ती हरिमर्चयेत् । तद्भावेऽग्निवत्सूर्यभूम्यम्बुगगनादिषु ॥१०॥ श्री विष्णु के प्रति अधिक अभिरति या भक्ति रखकर भक्त एकान्तिक या अनन्य भा की स्थिति में उनकी अर्चना प्रतिमारूप में ही करे। अर्चना के बाद श्रीहरि की स्थिति अग्नि सूर्य, पृथ्वी, जल, आकाश तथा पादुकादि में भावित रखे (तथा इनमें भी हरिभाव रखकर इन्हें भी पूजित करे)॥१०॥ भोजयेद् वैष्णवान्नित्यं पित्रर्थानितिथीँस्तथा । वैष्णवानेव बिभृयात् पुत्रदारादिकान् निजान् ॥११॥ सामर्थ्यानुसार नित्य वैष्णवों को भोजन करवावे तथा पितरों के निमित्त रखे गये श्राद्धादि में वैष्णवजन को अतिथि बनाकर इनको भोजन करवावे। वह अपने पुत्र पत्नी आदि परिवार जन को भी वैष्णव दीक्षा दिलवाकर 'वैष्णव' बना दे॥११॥ नातिसङ्गः परिचरेत् पुत्रादीनप्यवैष्णवान् । भिक्षेत वैष्णवेष्वेव ब्रह्मचारी यतिस्तथा ॥१२॥ पुत्रादि के अवैष्णव रहने पर स्वयं इन पुत्रादि के साथ रहने की या संगति भावना न रहने से उन्हें भी वैष्णव दीक्षा दिलवानी चाहिए। वैष्णव ब्रह्मचारी और यति भी वैष्णवों के यहाँ से ही यथासंभव भिक्षा तथा भोजनादि प्रसाद प्राप्त करें॥१२॥ असद्दृष्टिं परिहरेदच्युतस्य निवेदिते । दद्यादाचार्यमुख्येभ्यः स्वार्थञ्चात्र प्रकल्पयेत् ॥१३॥ श्रीभगवान् को अर्पित प्रसादान्न को भी अवैष्णवों की दृष्टि से देख लिये जाने पर अपवित्र हो जाने के कारण ग्रहण नहीं किया जावे। ऐसा द्रव्य आचार्यादि प्रमुख को प्रथम अर्पित कर दे तथा उनसे लौटा दिये गये शेष बचे हुए कुछ अंश को अपने लिए रख ले॥१३॥ निवेद्य यदि तद्भूयः परिषेकादिपूर्वकम् । जुहुयादाहुतीः पञ्च विष्णौ प्राणादिसंज्ञके ॥१४॥ तब फिर ईश्वरार्पण किये गये उस प्रसादादि को जल से परिसिंचन या प्रक्षेप पूर्वक पुनः श्रीहरि को अर्पित करे और श्रीविष्णु को प्राणादि पंच आहुति को 'प्राणाय स्वाहा' इत्यादि मन्त्रों से प्रदान करे॥१४॥ निवेदयेच्च भुञ्जानो मनसानागतं पुरः । मनो हि पूतमन्यत्र सूतोदक्याशवस्पृशः ॥१५॥
हिन्दीटीकासहित ५१ भोजन के बीच में पहिले अर्पित पदार्थों से भिन्न आनेवाले पदार्थों का निवेदन मन से प्रभु श्री वैष्णव को करे। मन केवल सूतक से युक्त, रजस्वला तथा शव के स्पर्श से शरीर की तरह अशुद्ध होता है और इनसे भिन्न स्थिति में मन शुद्ध माना जाता है॥१५॥ प्रशस्तं भगवद्भुक्तं पितृदेवाद्कर्मसु । लब्धेन चान्यतस्तेन पुनर्यागोऽपि चोदितः ॥१६॥ पितृ देवादि कर्मों में भगवदर्पित अन्नादि भोग्य पदार्थ प्रशस्त माने जाते हैं। यति आदि के द्वारा भिक्षादि में इनसे भिन्न स्थान और स्थिति में प्राप्त करने पर उनके द्वारा बाद में ऐसे पदार्थों के ग्रहण करने पर याग करने का विधान कहा गया है॥१६॥ कृत्वानुयागं कुर्वीत स्वाध्यायं वैष्णवं परम् । ततो युञ्जीत चात्मानं पुरुषे पुष्करेक्षणे ॥१७॥ इस प्रकार होने पर वह विहित याग के सम्पादन करने के बाद होने वाले भगवन्मन्त्रादि के स्वाध्याय तथा जपादि के रूपवाले ‘अनुयाग’ का भी सम्पादन करे और फिर कमलनेत्र श्रीविष्णु में आत्मा (मन) को अविच्छिन्नभाव से लगाये॥१७॥ ये च भागवता मन्त्रा ये च दिव्याश्च विग्रहाः । यथोपदेशं नियतस्तांश्च सेवेत नित्यशः ॥१८॥ वह प्रतिदिन सदा ही गुरुदीक्षा में प्राप्त भगवन्मन्त्रों को तथा आचार्य कृपा से प्राप्त श्रीविष्णु के मन्त्रों तथा प्रतिमाओं के रूप वाले विग्रहों का पवित्रभाव से नियतचित्त होकर अपने उपदेशानुरूप ध्यान करे (या उनका सेवन करे)॥१८॥ कृत्वाभिगमनं पूर्वमुपादाय च सम्पदः । इष्ट्वाधीत्य च युञ्जानो भोगैः कालं नयेद् यतिः ॥१९॥ इस प्रकार वह पांच विभागों में किये जाने वाले कृत्यों में सर्वप्रथम अभिगमन कर फिर याग की सामग्री का उपादान करें फिर याग का सम्पादन करे फिर स्वाध्याय का अध्ययन (पाठादि) करे फिर ध्यानादि भक्तियोग का सम्पादन करते हुए अपने समय को व्यतीत करे॥१९॥ तमेव मत्वा भोक्तारमिज्यं यष्टारमेव च । यजेत सकलैर्यज्ञैः सर्वयज्ञमयं हरिम् ॥२०॥ याग से उत्पन्न प्रीति के आधारभूत कर्त्तारूप श्रीविष्णु को ही भोक्ता के रूप में मानकर तथा उन्हें ही याग का विषय तथा यज्ञकर्ता भी मानते हुए सभी
५२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता नामरूपवाले (ज्योतिष्टोमादि) यज्ञों से उनका ही यजन करे, क्योंकि श्रीहरि सभी यज्ञों में अधिष्ठित हैं अतः उन्हें 'सर्वयज्ञमय' समझना चाहिए॥२०॥ विष्णोः सेवेत तीर्थानि तथैवायतनानि च । दद्यादर्थांश्च विप्रेभ्यश्चरेच्च विविधं तपः ॥२१॥ दीक्षित एवं साधक भक्त श्री विष्णु सम्बन्धी तीर्थों की यात्रा कर उनका सेवन करें इसी प्रकार श्रीविष्णु के आयतन भूत श्रीरङ्गादि स्थित मन्दिरों का सेवन भी करें वह 'सुपात्र' वैष्णव ब्राह्मणों को दान दे तथा विविध प्रकार के उपवास प्रधान तपचान्द्रयणादि व्रतों का भी आचरण करे॥२१॥ प्रायश्चित्तं तु परमं प्रपत्तिस्तस्य केवलम् । कुर्यात् कर्मात्मकं वापि वासुदेवमनुस्मरन् ॥२२॥ विशुद्ध्येद्विष्णुभक्तस्य दृष्ट्या स्पर्शन सेवया । स्मरणेनान्नपानाद्यैर्गिरा पादरजोऽम्बुभिः ॥२३॥ अभागवत दृष्ट्यादि के लिये सर्वोत्तम प्रायश्चित्त केवल श्री विष्णु की प्रपत्ति होती तथा शक्ति के होने पर भी श्रीवासुदेव का स्मरण करते हुए कुछ कर्म या अनुष्ठान रूप प्रायश्चित करना चाहिए। (निमित्त के थोड़े या अल्प मात्रा में होने पर तदनुरूप लघु तथा गुरु होने पर क्रियारूप वैष्णवेष्टि याग रूप प्रायश्चित रहता है। (अवैष्णव दृष्टि के लिये वैष्णव दृष्टि ही प्रायश्चित है, अवैष्णव स्पर्श का वैष्णवस्पर्श अवैष्णवजन की सेवा का वैष्णवसेवा अवैष्णव स्मरण का वैष्णव स्मरण तथा अवैष्णव अन्न पानादि का वैष्णव अन्नपानादि करना प्रायश्चित्त है। वाणी से अवैष्णवजन के साथ सम्भाषण का प्रायश्चित पुनः वैष्णवजन के साथ सम्भाषण कर तथा अवैष्णवजन के चरणरजों का वैष्णवजन की चरण धूलि से अवैष्णव जलपान का वैष्णवजन के जलपान से प्रायश्चित्त हो जाता है॥२२-२३॥ विष्णोर्निवेदितान्नाद्यैस्तथा तत्कीर्तनादिभिः । अभागवतदृष्टादेः शुचिरेषा विशेषतः ॥२४॥ विशेषकर अभागवत दृष्टि आदि की श्रीविष्णु को निवेदित प्रसादान्न आदि के ग्रहण तथा उनके कीर्तनादि कर्मों से शुद्धि होती है॥२४॥ कृता यज्ञाः समस्ताश्च दानानि च तपांसि च । प्रायश्चित्तमशेषेण नित्यमर्चयतां हरिम् ॥२५॥ बिना किसी विच्छेद के नित्य श्री विष्णु का अर्चन करने वाले प्रपन्न भक्त को सभी प्रायश्चित्त स्पर्श नहीं करते हैं, क्योंकि उसके इस अर्चना के कार्य मात्र से सभी यज्ञ किये गये, सभी दान दिये गये तथा सभी तप किये गये माने जाते हैं। (अतः
हिन्दीटीकासहित ५३ नैमित्तिक अनुष्ठानादि की भी उसे अपेक्षा नहीं होती)¹॥२५॥ एवं नित्यानि कर्माणि तथा नैमित्तिकानि च । भर्तुः प्रियकराणीति कुर्यात् प्रीत्यैव केवलम् ॥२६॥ अपने इष्टभूत सर्वान्तर्यामी स्वामी श्री विष्णु के निमित्त कहे हुए नित्य और नैमित्तिक कर्मों का आचरण उनके प्रिय भाव के कारण केवल प्रीतिमात्र के भाव से सम्पन्न करे॥२६॥ अथैवं ब्राह्मणो विद्वानेकान्ती धर्ममाचरन् । सरहस्यमिदं सम्यक् साधुभ्यश्चोपपादयेत् ॥२७॥ अतः विद्वान् ब्राह्मण वेदों का अध्ययन तथा उस पर विचार कर परमेकान्त भाव से इन कथित धर्म तथा विहित आचारों का पालन करते हुए वृत्ति के रहस्यों के साथ इन्हें उपदेश के पात्र साधुजन को पाने पर उन्हें भी इनका उपदेश दें॥२७॥ प्रजापालनरूपञ्च धर्मं भागवतं चरन् । प्राप्यापि महदैश्वर्यं मृतः स्यादेव निर्भरः ॥२८॥ इसी प्रकार क्षत्रिय अपने वर्ण के अनुरूप विहित आचारों के अनुरूप प्रजापालनरूप धर्म के साथ भागवत् धर्म का आचरण करते हुए अतिशय ऐश्वर्य सम्पन्न होकर भी उस ऐश्वर्य से बद्ध न होकर मुक्तिभाव को मृत्यु के बाद प्राप्त करता है॥२८॥ तथा वैश्यः स्वधर्मस्थो वैष्णवानभितर्पयन् । धनेष्वसक्त एकान्ती परं प्राप्नोति तत्पदम् ॥२९॥ इसी प्रकार वैश्य भी अपने वर्ण धर्म के अनुरूप वैष्णवजन को भोजनादि से तृप्त करते हुए अपनी विस्तीर्ण सम्पत्ति में अनुसक्त भाव से रहते हुए एकान्तभाव से भी श्रीविष्णु का सेवक बनकर उनके परमपद को प्राप्त करता है॥२९॥ शुश्रूषमाणः शूद्रोऽपि वैष्णवानग्रजन्मनः । स्वधर्मरत एकान्ती मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥३०॥ इसी प्रकार सेवा में लगा हुए शूद्र भी वैष्णव ब्राह्मण तथा क्षत्रियादि की सेवा करते हुए अपने वर्णधर्म का पालन कर भगवन्निष्ठ हो वैष्णव धर्म का पालन करते हुए सभी पातकों से मुक्त होता है॥३०॥ १ इस कथन से यज्ञ, दान, आदि सकल धर्मचरण की अपेक्षा नित्य श्रीविष्णु के आराधन तथा अर्चन की प्रधानधर्म के रूप मे प्रशंसा तथा महत्व दिखलाया गया है। इसका आशय यह कि वेदाभिहित यज्ञादि के कारणवश न करने के प्रायश्चित की नित्यकर्म के कारण उसके अनुरूप स्थिति तो बनी रहेगी। २ इस विहिताचरणरूप वृत्ति तथा इसके व्यवहार आदि विधियों का अनुकूल तथा अधिकारी पात्र को ही उपदेश दिया जावे।
२. द्वितीय परिच्छेद: पञ्च-संस्कार विधि एवं वैष्णव आचार-धर्म
५४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः । एकान्तिनः स्वधर्मस्थाः सर्वे यान्ति परां गतिम् ॥३१॥ इसी प्रकार ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षुक भी श्री विष्णु के प्रति प्रपत्ति रख एकान्तभाव से अपने अपने धर्मों के व्रतों में स्थित रहते हुए परम गति को प्राप्त करते हैं॥३१॥ नित्योप्तकेशा निभृतास्त्यक्तसर्वपरिग्रहाः । स्त्रीशूद्राद्याः स्वधर्मेण वर्तेरञ्जगतीपतौ ॥३२॥ ऐसे स्त्री, शूद्र आदि जो कि धन दारा आदि के परिग्रह से रहित होकर सदा ही अपने केशों का मुण्डन करवाकर निश्छल भाव से जगद्गुरु श्री विष्णु के प्रति अपने दीक्षादि से विहित आचारों का पालन करते हुए स्वधर्म का पालन करते रहें॥३२॥ वर्णाश्रमपराश्चैव परेऽपि हरिसंश्रिताः । अपायैर्नावसीदन्ति स्वेषु धर्मेष्ववस्थिताः ॥३३॥ चारों वर्ण तथा चारों आश्रमों से भिन्न जो अनुलोम प्रतिलोमादि जातियां हैं वे भी श्रीहरि की प्रपत्ति ग्रहण कर अपने विहित धर्मों में स्थित रहते हुए किसी अभाव या कष्ट से नष्ट नहीं होते हैं॥३३॥ समाश्रितो दास्यरतिं पतिं विश्वस्य माधवम् । यथार्हमाचरन् धर्मान् भूयो दृष्ट्यादि संश्रयेत् ॥३४॥ विश्व के अधिपति श्रीपति विष्णु के प्रति दास्यभाव की अभिरति रखते हुए उनका आश्रय लेकर अपने योग्य वर्णाश्रम धर्म का आचरण करते हुए साधक को बार बार इष्ट के ज्ञान तथा दृष्टि के साथ सभी चिन्ह, भक्ति तथा सत्सेवा आदि सभी आश्रय लेकर स्थित रहना चाहिए॥३४॥ प्रतिष्ठां सर्वधर्माणां प्रसादैकात्मनां हरेः । तदाज्ञारूपमनघं शास्त्रश्रुत्यादि मानयेत् ॥३५॥ श्रीविष्णु के प्रसाद मात्र फलवाले सभी धर्म प्रतिष्ठा से युक्त स्थित माने गये हैं अतएव भगवदाज्ञारूप तथा निष्पापरूपी अपौरुषेयरूप नित्य रूप वाले वेदादि तथा शास्त्रादि को भी पुरुषार्थ में अनुगत प्रमाणभूतरूप में श्रद्धा से मान्य करे॥३५॥ साङ्गान् वेदानधीयीत न्यायैश्चार्थं विचारयेत् । विद्यात् कर्मादिकं यत्र विष्णोराराधनात्मकम् ॥३६॥ अतएव साङ्गवेदों का अध्ययन कर स्वाध्याय संस्कार किया जावें, न्यायादि
हिन्दीटीकासहित ५५ (जैमिनि आदि के वस्तु परीक्षणादिरूप मीमांसा) शास्त्रों से वेदों के अर्थों का विचार कर तथा वहाँ श्रीविष्णु की आराधनारूप कर्मों को ध्यान देकर समझें॥३६॥ व्यवस्थां पदवर्णादिश्चन्दः कालक्रियाविधिम् । ज्ञात्वाऽङ्गैर्गमयेदर्थान् न्यायैः सर्वत्र साधुभिः ॥३७॥ वेद मन्त्रों की पद वर्णादि की व्यवस्था, प्रमाणादि व्यवस्था, छन्दों की गायत्री आदि में व्यवस्था, काल स्वरूप तथा स्थिति, यज्ञादि की क्रिया विधि आदि को अङ्गों के द्वारा (अर्थात् पद व्यवस्था को व्याकरण शास्त्र से वर्णव्यवस्था को शिक्षा के द्वारा) प्रमाणादि व्यवस्था को मीमांसादि शास्त्रों के न्यायों के द्वारा, छन्द की व्यवस्था, छन्दोविचितिसे, काल की ज्योतिषशास्त्र से क्रियाविधि को कल्पसूत्र से जानकर सम्यक्रूप से अर्थों का विचार सम्पन्न करें॥३७॥ शिष्टैर्वर्णाश्रमादीनामच्युताराधनात्मकान् । स्मृतांश्च विविधान् धर्मान् विद्याद्वैदिकसम्मतान् ॥३८॥ मनु आदि शिष्ट धर्मशास्त्र वेत्ताओं के द्वारा मान्य वर्ण आश्रम आदि धर्मों को तथा अच्युत की आराधना के लिये स्मृत्युपदिष्ट (पुराणाद्युपदिष्ट वैदिक धर्म के समस्त विविध धर्मों का ज्ञान प्राप्त करे।) मनु आदि के धर्मशास्त्रों से कर्मभाग का उपबृंहणं सम्पन्न करें या उनका ज्ञानार्जन करें॥३८॥ अथौपनिषदञ्चार्थं शृणुयान्न्यायतः सुधीः । येनाराध्यं परं ब्रह्म जानीयात् पुरुषोत्तमम् ॥३९॥ इस प्रकार कर्म-विचार के बाद 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इत्यादि ब्रह्म-विद्या उपनिषदों के गूढ़ अर्थों का न्यायादि के साथ परिशीलन करें (स्वाध्याय करे) और इस प्रकार वह सुधी 'पुरुषोत्तमं परं ब्रह्म' का जो कि आराध्य है, ज्ञान प्राप्त करे॥३९॥ पञ्चरात्रं महद्दिव्यं शास्त्रं श्रुतिविभावनम् । विशेषेणाधिगन्तव्यं गीतं भगवता स्वयम् ॥४०॥ वह उपनिषदों के इन अर्थों का पंचरात्र, इतिहास तथा पुराणादि के साथ वेदान्त परिव्रह्मण के सम्पन्न करने के क्रम में तब भगवान् के द्वारा स्वयं उपदिष्ट महत् 'पञ्चरात्र शास्त्र' का जो दिव्य तथा वेदों के गुह्यार्थ को दिखलाने वाला है, उसे विशेषरूप में जाने (इसे महत् कहने का आशय यह है कि इस आगम में एक सौ आठ संहिताएँ आती हैं) अतः यह विशालरूप वाला है॥४०॥ १ इसका कारण यह है कि वेद तथा वेदान्त के अनुमत तत्वों को विस्तीर्ण मीमांसा के कारण अंतरंग भूत शास्त्र होने के कारण इनका अनुशीलन विशेषरूप में करना आवश्यक है।
५६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता वेदवेद्यः स भगवान् कृपया परयाच्युतः । चतुर्विधमिदं प्राह सर्वेषां हितकारणात् ॥४१॥ वेदादि के द्वारा जो भगवान् श्रीविष्णु जाने जाते हैं उन अच्युतभगवान् ने अतिशय कृपा के द्वारा इस आगम-सिद्धान्त पञ्चरात्र को सभी प्राणिजन के हितों को ध्यान में रखकर चार भागों में विभक्त कर १-आगम सिद्धान्त २-मन्त्र सिद्धान्त ३-तन्त्र सिद्धान्त तथा ४-तन्त्रान्तर सिद्धान्त के रूपों में प्रतिपादित किया॥४१॥ परस्य ब्रह्मणस्तस्य विद्याद्व्यूहादिसंस्थितीः । ज्ञानं क्रिया समस्ताश्च योगश्चात्र फलानि च ॥४२॥ इसमें उस परब्रह्म की कही गयी चतुर्व्यूह स्थिति का ज्ञान प्राप्त करें। ये हैं- १ ज्ञान, २ सत्क्रिया, ३ योग तथा ४ चर्या (जिनमें परब्रह्म का ज्ञानस्वरूप, समस्त कर्षणादि प्रतिष्ठान्त क्रियाएं तथा उत्सवादि प्रायश्चित्तान्त क्रियाओं का, योग स्वरूप तथा चर्यादि का जो कि इसके चारों पाद हैं) अतएव शास्त्रों से इनका ज्ञान सम्पादन करना चाहिए॥४२॥ पुराणान्यवगाहेत सेतिहासानि यत्र च । केशवस्य जगत्-सर्गस्थिति-भङ्गादि कीर्त्यते ॥४३॥ इस क्रम में पुराण तथा इतिहासों का अनुशीलन किया जाए जिनमें श्रीभगवान् केशव के द्वारा जगत् की सृष्टि, जगत् का संरक्षण तथा प्रलयादि का कीर्तन किया जाता है। (तथा इनमें अच्युत के दिव्यावतारों तथा उनके कार्यों का भी वर्णन किया जाता है)॥४३॥ स्तोत्राणि कल्पनामानि कथाश्च विविधा हरेः । सद्भिः प्रणिहितांश्चान्यान् प्रबन्धान् परिशीलयेत् ॥४४॥ इसी प्रकार कल्पादिमन्त्रप्रतिपादक तथा व्रतादि के प्रतिपादक स्तोत्रों तथा श्री- विष्णुसहस्रनामादि नामों, श्री अच्युत की विविध पुराणस्थित कथाओं का तथा महात्माओं के द्वारा रचित इसी प्रकार के प्रबन्धों आदि का भी वह परिशीलन करे॥४४॥ मूलस्कन्धमया वेदाः पञ्चरात्रञ्च यत्परम् । अन्यच्च तत्परं ग्राह्यं शास्त्रं नान्यादृशं पुनः ॥४५॥ वेदमूलके स्कन्धरूप जो अनुवाद हैं उनका तथा जो उपनिषदरूपवाले हैं उनका और जिनके गूढ़ अर्थों का प्रतिपादक आगम पञ्चरात्र माना जाता है उनका अनुशीलन करें इसी के समान ज्ञानादि प्रतिपादक अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया जाए परन्तु इनके विरुद्ध जो नास्तिक शास्त्रादि आते हैं उनका अनुशीलन न करें॥४५॥ इति दृष्टाधिकारः
हिन्दीटीकासहित ५७ प्रभुं भक्तपराधीनं नित्यमालोकयेद्धरिम् । विमानमथ वा तस्य दूराद् गोपुरमेव वा ॥४६॥ सर्वेश्वर श्री हरि का जो कि भक्ति के कारण भक्तों के अधीन रहते हैं तथा जो उन पर कृपा करते हैं अतः उनका नित्य दर्शन करे (क्योंकि भगवद्दर्शन भक्ति का आधार तथा आपादक है) अथवा परिस्थितिवश दूर स्थित रहकर उनके विमान अथवा गोपुर का ही दर्शन नित्य कर लें॥४६॥ स्वरूप-रूप-विभव-गुण-कर्माणि शार्ङ्गिणः । आचक्षीत निबध्नीयाच्छृणुयाद्विलिखेत् पठेत् ॥४७॥ श्रीविष्णु का स्वरूप, उनके रूप या विग्रहों, उनकी विभूतियों उनके ज्ञानादि गुणों, उनके गजेन्द्ररक्षण रूप कार्य, अर्जुन का सारथि बनने जैसे कार्यों या दिव्यचेष्टितों का विचार कर, इनकी व्याख्या करे। वह इन दिव्यचरितों का श्रवण करें, इनका लेखन तथा पठन भी करे॥४७॥ चतुर्भुजमुदाराङ्गं श्यामं पद्मनिवेक्षणम् । श्रीभूमिलालासहितं चिन्तयेच्च सदा हृदि ॥४८॥ वह सदा ऐसे श्री विष्णु का जो कि चतुर्भुज, उन्नत शरीरवाले, श्यामवर्ण, कमलदल के समान विशाल नेत्रों वाले तथा श्रीभूमि लीलादि के साथ हों तो ऐसे उनके स्वरूप का हृदय से चिन्तन करता रहे॥४८॥ उपेत्यायतनं विष्णोः प्रणिपत्य ततस्ततः । परीत्य देवदेवेशं प्रणम्यात्मानमर्पयेत् ॥४९॥ वह श्रीविष्णु के मन्दिर में नित्य पहुँचे तथा वहाँ उन्हें प्रणाम कर प्रदक्षिणा करें तथा अपने प्रपत्तिभाव के स्मरणार्थ आत्मनिवेदन नित्य प्रस्तुत करता रहे॥४९॥ प्रीतिसंहृष्टसर्वाङ्गः स्तुत्वा वापि विलोकयेत् । कृतप्रसादः सेवेत नियतात्मा यथोचितम् ॥५०॥ वह भगवत्प्रीति से रोमांचित भाव में आकर इष्ट श्री अच्युत की स्तुति करते हुए उनका दर्शन करे। भगवान् ने उस पर प्रसाद किया हैं, ऐसी भावना रखे फिर वह नियतचित्त से अपने पारिवारिक व्यक्तिगत कार्यों का आचरण करे(या ऐसे कार्यों का आचरण तथा सेवन करे॥५०॥ यात्रादिषु च सेवेत तद्दृष्टिस्तद्गुणान् वदन् । तत् कर्माणि च युक्तस्तज्जनसम्बन्धहर्षितः ॥५१॥ वह भगवान् की रथयात्रादि के प्रसंग आने पर उनकी ओर अपनी दृष्टि लगाते हुए तथा उनके गुणानुवाद नामादि को उच्चारित करते हुए उनके द्वारा किये गये दिव्य
५८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता कर्मों का कथन करते हुए रथयात्रा में एकत्रित अन्य वैष्णवों से युक्त होकर प्रसन्नभाव से इष्टदेव का सेवन करे॥५१॥ गायेदास्फोटयेन्नृत्येदुत्पतेन्निपतेत् स्खलेत् । क्रोशेद्दिषीदेद्धृष्येच्च विष्णोः प्रेमवशानुगः ॥५२॥ वह श्रीविष्णु के ऐसे उत्सवादि प्रसंग में सम्मिलित होकर भक्ति के भावावेश में प्रेमवश उनका गुणगान कर गायन करे, भुजास्फोटन करे, करताल बजावे, नृत्य करे, उत्पतन करे, निपतन करे, स्खलद्गति में चेष्टारत रहे, आक्रोश भाव में स्थित होकर विषाद करे तथा प्रसन्नभाव दिखलावे॥५२॥ कुर्वाणश्च सदा वृत्तिं विष्णोरायतने वसेत् । दद्याच्च विविधान् भोगाननुरूपान् मनोरमान् ॥५३॥ वह श्रीविष्णु के मन्दिरादि स्थानों में सेवाभाव से सम्मार्जन आदि वृत्ति कर स्थित रहे तथा चन्दन, अगरू, कस्तूरी आदि देशकाल के अनुरूप शास्त्रानुमोदित सुन्दर भोग्य पदार्थों को श्री भगवान् को अर्पित करे॥५३॥ परीवारांश्च सेवेत भक्त्या परमया हरेः । तत्तदर्चागतान् भक्तान् गुर्वादींश्च विशेषतः ॥५४॥ श्रीहरि के परिवारभूत श्रीदेवी के भूषण स्वयं के आयुध, परिजन आदि संवाहन परिच्छद सेनाधिप चण्डादि द्वारपाल, कुमुदादिगणाधिप रूप भगवान् की उन उन अर्चाओं में प्रतिष्ठापित परिवारों का तथा श्रीहरि के भक्तों उनका मन्त्र देने वाले गुरुजन का विशेषरूप में सेवन करे॥५४॥ हरेराश्रितवात्सल्यात् तत्तत्स्थानाभिनन्दिनः । असाधारणभावेन तत्र तत्रैव वा वसेत् ॥५५॥ वात्सल्य तथा अनुरागवश श्रीहरि के द्वारा आश्रित तीर्थादि स्थानों का जैसे श्रीरंग हस्तिगिरि, यदुगिरि जैसे दिव्य प्रदेशों का वह असाधारणभाव से अभिनन्दन करते हुए यात्रादि के प्रसंग में सेवन करे अथवा अतिशय भक्तिवश उन्हीं प्रदेशों में अपना निवास भी रखे॥५५॥ ये च भुक्तोज्झिता भोगाः श्रीपतेः शिरसा नतः । अभ्येत्य प्रतिपद्येत भक्त्या परमया स्वयम् ॥५६॥ जो श्रीहरि से भुक्त होकर निर्माल्यभूत माल्यादि भोग हों, उन्हें परमभक्ति के साथ विनत मस्तक कर प्रणाम के साथ अभिमुख होकर ग्रहण करे॥५६॥ पादोदकं भगवतो लब्ध्वा भागवतस्य वा । तिष्ठन्नेवाथयासीनः पिबेच्छुद्धिश्च नापरा ॥५७॥