नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 53, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ५१ भोजन के बीच में पहिले अर्पित पदार्थों से भिन्न आनेवाले पदार्थों का निवेदन मन से प्रभु श्री वैष्णव को करे। मन केवल सूतक से युक्त, रजस्वला तथा शव के स्पर्श से शरीर की तरह अशुद्ध होता है और इनसे भिन्न स्थिति में मन शुद्ध माना जाता है॥१५॥ प्रशस्तं भगवद्भुक्तं पितृदेवाद्कर्मसु । लब्धेन चान्यतस्तेन पुनर्यागोऽपि चोदितः ॥१६॥ पितृ देवादि कर्मों में भगवदर्पित अन्नादि भोग्य पदार्थ प्रशस्त माने जाते हैं। यति आदि के द्वारा भिक्षादि में इनसे भिन्न स्थान और स्थिति में प्राप्त करने पर उनके द्वारा बाद में ऐसे पदार्थों के ग्रहण करने पर याग करने का विधान कहा गया है॥१६॥ कृत्वानुयागं कुर्वीत स्वाध्यायं वैष्णवं परम् । ततो युञ्जीत चात्मानं पुरुषे पुष्करेक्षणे ॥१७॥ इस प्रकार होने पर वह विहित याग के सम्पादन करने के बाद होने वाले भगवन्मन्त्रादि के स्वाध्याय तथा जपादि के रूपवाले ‘अनुयाग’ का भी सम्पादन करे और फिर कमलनेत्र श्रीविष्णु में आत्मा (मन) को अविच्छिन्नभाव से लगाये॥१७॥ ये च भागवता मन्त्रा ये च दिव्याश्च विग्रहाः । यथोपदेशं नियतस्तांश्च सेवेत नित्यशः ॥१८॥ वह प्रतिदिन सदा ही गुरुदीक्षा में प्राप्त भगवन्मन्त्रों को तथा आचार्य कृपा से प्राप्त श्रीविष्णु के मन्त्रों तथा प्रतिमाओं के रूप वाले विग्रहों का पवित्रभाव से नियतचित्त होकर अपने उपदेशानुरूप ध्यान करे (या उनका सेवन करे)॥१८॥ कृत्वाभिगमनं पूर्वमुपादाय च सम्पदः । इष्ट्वाधीत्य च युञ्जानो भोगैः कालं नयेद् यतिः ॥१९॥ इस प्रकार वह पांच विभागों में किये जाने वाले कृत्यों में सर्वप्रथम अभिगमन कर फिर याग की सामग्री का उपादान करें फिर याग का सम्पादन करे फिर स्वाध्याय का अध्ययन (पाठादि) करे फिर ध्यानादि भक्तियोग का सम्पादन करते हुए अपने समय को व्यतीत करे॥१९॥ तमेव मत्वा भोक्तारमिज्यं यष्टारमेव च । यजेत सकलैर्यज्ञैः सर्वयज्ञमयं हरिम् ॥२०॥ याग से उत्पन्न प्रीति के आधारभूत कर्त्तारूप श्रीविष्णु को ही भोक्ता के रूप में मानकर तथा उन्हें ही याग का विषय तथा यज्ञकर्ता भी मानते हुए सभी