नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता नामरूपवाले (ज्योतिष्टोमादि) यज्ञों से उनका ही यजन करे, क्योंकि श्रीहरि सभी यज्ञों में अधिष्ठित हैं अतः उन्हें 'सर्वयज्ञमय' समझना चाहिए॥२०॥ विष्णोः सेवेत तीर्थानि तथैवायतनानि च । दद्यादर्थांश्च विप्रेभ्यश्चरेच्च विविधं तपः ॥२१॥ दीक्षित एवं साधक भक्त श्री विष्णु सम्बन्धी तीर्थों की यात्रा कर उनका सेवन करें इसी प्रकार श्रीविष्णु के आयतन भूत श्रीरङ्गादि स्थित मन्दिरों का सेवन भी करें वह 'सुपात्र' वैष्णव ब्राह्मणों को दान दे तथा विविध प्रकार के उपवास प्रधान तपचान्द्रयणादि व्रतों का भी आचरण करे॥२१॥ प्रायश्चित्तं तु परमं प्रपत्तिस्तस्य केवलम् । कुर्यात् कर्मात्मकं वापि वासुदेवमनुस्मरन् ॥२२॥ विशुद्ध्येद्विष्णुभक्तस्य दृष्ट्या स्पर्शन सेवया । स्मरणेनान्नपानाद्यैर्गिरा पादरजोऽम्बुभिः ॥२३॥ अभागवत दृष्ट्यादि के लिये सर्वोत्तम प्रायश्चित्त केवल श्री विष्णु की प्रपत्ति होती तथा शक्ति के होने पर भी श्रीवासुदेव का स्मरण करते हुए कुछ कर्म या अनुष्ठान रूप प्रायश्चित करना चाहिए। (निमित्त के थोड़े या अल्प मात्रा में होने पर तदनुरूप लघु तथा गुरु होने पर क्रियारूप वैष्णवेष्टि याग रूप प्रायश्चित रहता है। (अवैष्णव दृष्टि के लिये वैष्णव दृष्टि ही प्रायश्चित है, अवैष्णव स्पर्श का वैष्णवस्पर्श अवैष्णवजन की सेवा का वैष्णवसेवा अवैष्णव स्मरण का वैष्णव स्मरण तथा अवैष्णव अन्न पानादि का वैष्णव अन्नपानादि करना प्रायश्चित्त है। वाणी से अवैष्णवजन के साथ सम्भाषण का प्रायश्चित पुनः वैष्णवजन के साथ सम्भाषण कर तथा अवैष्णवजन के चरणरजों का वैष्णवजन की चरण धूलि से अवैष्णव जलपान का वैष्णवजन के जलपान से प्रायश्चित्त हो जाता है॥२२-२३॥ विष्णोर्निवेदितान्नाद्यैस्तथा तत्कीर्तनादिभिः । अभागवतदृष्टादेः शुचिरेषा विशेषतः ॥२४॥ विशेषकर अभागवत दृष्टि आदि की श्रीविष्णु को निवेदित प्रसादान्न आदि के ग्रहण तथा उनके कीर्तनादि कर्मों से शुद्धि होती है॥२४॥ कृता यज्ञाः समस्ताश्च दानानि च तपांसि च । प्रायश्चित्तमशेषेण नित्यमर्चयतां हरिम् ॥२५॥ बिना किसी विच्छेद के नित्य श्री विष्णु का अर्चन करने वाले प्रपन्न भक्त को सभी प्रायश्चित्त स्पर्श नहीं करते हैं, क्योंकि उसके इस अर्चना के कार्य मात्र से सभी यज्ञ किये गये, सभी दान दिये गये तथा सभी तप किये गये माने जाते हैं। (अतः