नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अधिकप्रीतिरर्चायामेकान्ती हरिमर्चयेत् । तद्भावेऽग्निवत्सूर्यभूम्यम्बुगगनादिषु ॥१०॥ श्री विष्णु के प्रति अधिक अभिरति या भक्ति रखकर भक्त एकान्तिक या अनन्य भा की स्थिति में उनकी अर्चना प्रतिमारूप में ही करे। अर्चना के बाद श्रीहरि की स्थिति अग्नि सूर्य, पृथ्वी, जल, आकाश तथा पादुकादि में भावित रखे (तथा इनमें भी हरिभाव रखकर इन्हें भी पूजित करे)॥१०॥ भोजयेद् वैष्णवान्नित्यं पित्रर्थानितिथीँस्तथा । वैष्णवानेव बिभृयात् पुत्रदारादिकान् निजान् ॥११॥ सामर्थ्यानुसार नित्य वैष्णवों को भोजन करवावे तथा पितरों के निमित्त रखे गये श्राद्धादि में वैष्णवजन को अतिथि बनाकर इनको भोजन करवावे। वह अपने पुत्र पत्नी आदि परिवार जन को भी वैष्णव दीक्षा दिलवाकर 'वैष्णव' बना दे॥११॥ नातिसङ्गः परिचरेत् पुत्रादीनप्यवैष्णवान् । भिक्षेत वैष्णवेष्वेव ब्रह्मचारी यतिस्तथा ॥१२॥ पुत्रादि के अवैष्णव रहने पर स्वयं इन पुत्रादि के साथ रहने की या संगति भावना न रहने से उन्हें भी वैष्णव दीक्षा दिलवानी चाहिए। वैष्णव ब्रह्मचारी और यति भी वैष्णवों के यहाँ से ही यथासंभव भिक्षा तथा भोजनादि प्रसाद प्राप्त करें॥१२॥ असद्दृष्टिं परिहरेदच्युतस्य निवेदिते । दद्यादाचार्यमुख्येभ्यः स्वार्थञ्चात्र प्रकल्पयेत् ॥१३॥ श्रीभगवान् को अर्पित प्रसादान्न को भी अवैष्णवों की दृष्टि से देख लिये जाने पर अपवित्र हो जाने के कारण ग्रहण नहीं किया जावे। ऐसा द्रव्य आचार्यादि प्रमुख को प्रथम अर्पित कर दे तथा उनसे लौटा दिये गये शेष बचे हुए कुछ अंश को अपने लिए रख ले॥१३॥ निवेद्य यदि तद्भूयः परिषेकादिपूर्वकम् । जुहुयादाहुतीः पञ्च विष्णौ प्राणादिसंज्ञके ॥१४॥ तब फिर ईश्वरार्पण किये गये उस प्रसादादि को जल से परिसिंचन या प्रक्षेप पूर्वक पुनः श्रीहरि को अर्पित करे और श्रीविष्णु को प्राणादि पंच आहुति को 'प्राणाय स्वाहा' इत्यादि मन्त्रों से प्रदान करे॥१४॥ निवेदयेच्च भुञ्जानो मनसानागतं पुरः । मनो हि पूतमन्यत्र सूतोदक्याशवस्पृशः ॥१५॥