नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ५७ प्रभुं भक्तपराधीनं नित्यमालोकयेद्धरिम् । विमानमथ वा तस्य दूराद् गोपुरमेव वा ॥४६॥ सर्वेश्वर श्री हरि का जो कि भक्ति के कारण भक्तों के अधीन रहते हैं तथा जो उन पर कृपा करते हैं अतः उनका नित्य दर्शन करे (क्योंकि भगवद्दर्शन भक्ति का आधार तथा आपादक है) अथवा परिस्थितिवश दूर स्थित रहकर उनके विमान अथवा गोपुर का ही दर्शन नित्य कर लें॥४६॥ स्वरूप-रूप-विभव-गुण-कर्माणि शार्ङ्गिणः । आचक्षीत निबध्नीयाच्छृणुयाद्विलिखेत् पठेत् ॥४७॥ श्रीविष्णु का स्वरूप, उनके रूप या विग्रहों, उनकी विभूतियों उनके ज्ञानादि गुणों, उनके गजेन्द्ररक्षण रूप कार्य, अर्जुन का सारथि बनने जैसे कार्यों या दिव्यचेष्टितों का विचार कर, इनकी व्याख्या करे। वह इन दिव्यचरितों का श्रवण करें, इनका लेखन तथा पठन भी करे॥४७॥ चतुर्भुजमुदाराङ्गं श्यामं पद्मनिवेक्षणम् । श्रीभूमिलालासहितं चिन्तयेच्च सदा हृदि ॥४८॥ वह सदा ऐसे श्री विष्णु का जो कि चतुर्भुज, उन्नत शरीरवाले, श्यामवर्ण, कमलदल के समान विशाल नेत्रों वाले तथा श्रीभूमि लीलादि के साथ हों तो ऐसे उनके स्वरूप का हृदय से चिन्तन करता रहे॥४८॥ उपेत्यायतनं विष्णोः प्रणिपत्य ततस्ततः । परीत्य देवदेवेशं प्रणम्यात्मानमर्पयेत् ॥४९॥ वह श्रीविष्णु के मन्दिर में नित्य पहुँचे तथा वहाँ उन्हें प्रणाम कर प्रदक्षिणा करें तथा अपने प्रपत्तिभाव के स्मरणार्थ आत्मनिवेदन नित्य प्रस्तुत करता रहे॥४९॥ प्रीतिसंहृष्टसर्वाङ्गः स्तुत्वा वापि विलोकयेत् । कृतप्रसादः सेवेत नियतात्मा यथोचितम् ॥५०॥ वह भगवत्प्रीति से रोमांचित भाव में आकर इष्ट श्री अच्युत की स्तुति करते हुए उनका दर्शन करे। भगवान् ने उस पर प्रसाद किया हैं, ऐसी भावना रखे फिर वह नियतचित्त से अपने पारिवारिक व्यक्तिगत कार्यों का आचरण करे(या ऐसे कार्यों का आचरण तथा सेवन करे॥५०॥ यात्रादिषु च सेवेत तद्दृष्टिस्तद्गुणान् वदन् । तत् कर्माणि च युक्तस्तज्जनसम्बन्धहर्षितः ॥५१॥ वह भगवान् की रथयात्रादि के प्रसंग आने पर उनकी ओर अपनी दृष्टि लगाते हुए तथा उनके गुणानुवाद नामादि को उच्चारित करते हुए उनके द्वारा किये गये दिव्य