नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता वेदवेद्यः स भगवान् कृपया परयाच्युतः । चतुर्विधमिदं प्राह सर्वेषां हितकारणात् ॥४१॥ वेदादि के द्वारा जो भगवान् श्रीविष्णु जाने जाते हैं उन अच्युतभगवान् ने अतिशय कृपा के द्वारा इस आगम-सिद्धान्त पञ्चरात्र को सभी प्राणिजन के हितों को ध्यान में रखकर चार भागों में विभक्त कर १-आगम सिद्धान्त २-मन्त्र सिद्धान्त ३-तन्त्र सिद्धान्त तथा ४-तन्त्रान्तर सिद्धान्त के रूपों में प्रतिपादित किया॥४१॥ परस्य ब्रह्मणस्तस्य विद्याद्व्यूहादिसंस्थितीः । ज्ञानं क्रिया समस्ताश्च योगश्चात्र फलानि च ॥४२॥ इसमें उस परब्रह्म की कही गयी चतुर्व्यूह स्थिति का ज्ञान प्राप्त करें। ये हैं- १ ज्ञान, २ सत्क्रिया, ३ योग तथा ४ चर्या (जिनमें परब्रह्म का ज्ञानस्वरूप, समस्त कर्षणादि प्रतिष्ठान्त क्रियाएं तथा उत्सवादि प्रायश्चित्तान्त क्रियाओं का, योग स्वरूप तथा चर्यादि का जो कि इसके चारों पाद हैं) अतएव शास्त्रों से इनका ज्ञान सम्पादन करना चाहिए॥४२॥ पुराणान्यवगाहेत सेतिहासानि यत्र च । केशवस्य जगत्-सर्गस्थिति-भङ्गादि कीर्त्यते ॥४३॥ इस क्रम में पुराण तथा इतिहासों का अनुशीलन किया जाए जिनमें श्रीभगवान् केशव के द्वारा जगत् की सृष्टि, जगत् का संरक्षण तथा प्रलयादि का कीर्तन किया जाता है। (तथा इनमें अच्युत के दिव्यावतारों तथा उनके कार्यों का भी वर्णन किया जाता है)॥४३॥ स्तोत्राणि कल्पनामानि कथाश्च विविधा हरेः । सद्भिः प्रणिहितांश्चान्यान् प्रबन्धान् परिशीलयेत् ॥४४॥ इसी प्रकार कल्पादिमन्त्रप्रतिपादक तथा व्रतादि के प्रतिपादक स्तोत्रों तथा श्री- विष्णुसहस्रनामादि नामों, श्री अच्युत की विविध पुराणस्थित कथाओं का तथा महात्माओं के द्वारा रचित इसी प्रकार के प्रबन्धों आदि का भी वह परिशीलन करे॥४४॥ मूलस्कन्धमया वेदाः पञ्चरात्रञ्च यत्परम् । अन्यच्च तत्परं ग्राह्यं शास्त्रं नान्यादृशं पुनः ॥४५॥ वेदमूलके स्कन्धरूप जो अनुवाद हैं उनका तथा जो उपनिषदरूपवाले हैं उनका और जिनके गूढ़ अर्थों का प्रतिपादक आगम पञ्चरात्र माना जाता है उनका अनुशीलन करें इसी के समान ज्ञानादि प्रतिपादक अन्य शास्त्रों का अध्ययन किया जाए परन्तु इनके विरुद्ध जो नास्तिक शास्त्रादि आते हैं उनका अनुशीलन न करें॥४५॥ इति दृष्टाधिकारः