भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 176 में से

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५८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता कर्मों का कथन करते हुए रथयात्रा में एकत्रित अन्य वैष्णवों से युक्त होकर प्रसन्नभाव से इष्टदेव का सेवन करे॥५१॥ गायेदास्फोटयेन्नृत्येदुत्पतेन्निपतेत् स्खलेत् । क्रोशेद्दिषीदेद्धृष्येच्च विष्णोः प्रेमवशानुगः ॥५२॥ वह श्रीविष्णु के ऐसे उत्सवादि प्रसंग में सम्मिलित होकर भक्ति के भावावेश में प्रेमवश उनका गुणगान कर गायन करे, भुजास्फोटन करे, करताल बजावे, नृत्य करे, उत्पतन करे, निपतन करे, स्खलद्गति में चेष्टारत रहे, आक्रोश भाव में स्थित होकर विषाद करे तथा प्रसन्नभाव दिखलावे॥५२॥ कुर्वाणश्च सदा वृत्तिं विष्णोरायतने वसेत् । दद्याच्च विविधान् भोगाननुरूपान् मनोरमान् ॥५३॥ वह श्रीविष्णु के मन्दिरादि स्थानों में सेवाभाव से सम्मार्जन आदि वृत्ति कर स्थित रहे तथा चन्दन, अगरू, कस्तूरी आदि देशकाल के अनुरूप शास्त्रानुमोदित सुन्दर भोग्य पदार्थों को श्री भगवान् को अर्पित करे॥५३॥ परीवारांश्च सेवेत भक्त्या परमया हरेः । तत्तदर्चागतान् भक्तान् गुर्वादींश्च विशेषतः ॥५४॥ श्रीहरि के परिवारभूत श्रीदेवी के भूषण स्वयं के आयुध, परिजन आदि संवाहन परिच्छद सेनाधिप चण्डादि द्वारपाल, कुमुदादिगणाधिप रूप भगवान् की उन उन अर्चाओं में प्रतिष्ठापित परिवारों का तथा श्रीहरि के भक्तों उनका मन्त्र देने वाले गुरुजन का विशेषरूप में सेवन करे॥५४॥ हरेराश्रितवात्सल्यात् तत्तत्स्थानाभिनन्दिनः । असाधारणभावेन तत्र तत्रैव वा वसेत् ॥५५॥ वात्सल्य तथा अनुरागवश श्रीहरि के द्वारा आश्रित तीर्थादि स्थानों का जैसे श्रीरंग हस्तिगिरि, यदुगिरि जैसे दिव्य प्रदेशों का वह असाधारणभाव से अभिनन्दन करते हुए यात्रादि के प्रसंग में सेवन करे अथवा अतिशय भक्तिवश उन्हीं प्रदेशों में अपना निवास भी रखे॥५५॥ ये च भुक्तोज्झिता भोगाः श्रीपतेः शिरसा नतः । अभ्येत्य प्रतिपद्येत भक्त्या परमया स्वयम् ॥५६॥ जो श्रीहरि से भुक्त होकर निर्माल्यभूत माल्यादि भोग हों, उन्हें परमभक्ति के साथ विनत मस्तक कर प्रणाम के साथ अभिमुख होकर ग्रहण करे॥५६॥ पादोदकं भगवतो लब्ध्वा भागवतस्य वा । तिष्ठन्नेवाथयासीनः पिबेच्छुद्धिश्च नापरा ॥५७॥

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