भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित ५९ श्री हरि के चरणामृत स्वरूप जल को हाथों में ग्रहण कर स्थित होकर अथवा बैठकर पान करे। इसी प्रकार पूज्य भागवतजन का पादोदक भी ग्रहण कर उसे भी पान करे। इसके अतिरिक्त अन्य शुद्धि-आचमन हस्तप्रक्षालनादि स्वरूप नहीं मानी जाती है। (कहीं कहीं विष्णुपादोदक को पान न कर मस्तक पर सिंचन करने तथा उसे अज्ञानवश पृथ्वी पर न गिराने का भी उल्लेख मिलता है क्योंकि यदि मोहवश यह जल पृथ्वी पर गिर जाए तो गृहीता का पतन होता है॥५७॥ पुरराष्ट्राभिवृद्ध्यर्थमर्चितस्य जगत्पतेः । शेषभाजोऽर्थिनः सर्वे सन्त एव सतां गृहे ॥५८॥ अर्चना के बाद भी श्री हरि के भुक्त प्रसादरूप चरणामृतादि पदार्थ पुर तथा राष्ट्र की अभिवृद्धि के कारण हैं। अतः इस प्रसाद के अपेक्षी सभी सन्तजन होते हैं तथा गृह में अर्चित श्रीहरि के दर्शन तथा उनका प्रसाद ग्रहण करने हेतु स्थित सन्त तथा भक्तजन ही अधिकारी होते हैं (अन्य नहीं)॥५८॥ (इति भक्त्यधिकार) ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो नारी तथेतरः । चक्राद्यैरङ्कयेद् गात्रमात्मीयस्याखिलस्य च ॥५९॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, नारी तथा अन्य सभी जन श्रीहरि के चक्रादि आयुध या लक्ष्म से अपने अपने तथा परिवार के सभी के शरीरों के अंकित करें॥५९॥ अनिष्टानां निवृत्त्यर्थमैकान्त्याय जगत्पतेः । सिद्ध्यर्थं कर्मणांश्चैव धार्यं चक्रादिलाञ्छनम् ॥६०॥ इन चक्रादि लांछनों को धारण करने का प्रयोजन यह है कि इससे अनिष्टों की निवृत्ति होती है तथा जगदीश श्रीनारायण की परमैकान्तिकता की पुष्टि होकर आरब्ध कर्मों में सिद्धि प्राप्त होती है। अतः श्रीहरि के इन चक्रादि लांछनों का धारण आवश्यक है॥६०॥ बाह्वोर्ललाटे शिरसि हृदये चाग्रजन्मनाम् । शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गैः मन्त्रेण दाहयेत् ॥६१॥ इन्हें दोनों बाहुओं पर, ललाट देश में, मस्तक पर, शरीर में, हृदय स्थान पर मन्त्रपूर्वक ब्राह्मणादि के शरीर पर दाहन के साथ अंकित करना चाहिए॥६१॥