नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 62, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ें६० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विष्णोरायतनाग्नौ वा गुरोरात्मन एव वा । हुते हेमादिभिस्तप्तैः सुरूपैरर्चितैः क्रमात् ॥६२॥ श्रीविष्णु के मन्दिर में स्थित अग्नि में अथवा श्रीविष्णु के नैवेद्यार्थ निर्मित पाकादिक अग्नि में, गुरु की अग्निहोत्रादि हवन कार्य की हुई अग्नि में या स्वयं के घर की पवित्र अग्नि में इन चक्रादि मुद्राको सन्तप्त करे जो हेम रजत, ताम्र आदि से निर्मित हो तथा जिनकी विधिवत् अर्चना पूर्व में की जाए फिर उभरते अंगों को अग्नि से तप्त कर, उनसे अंकित करे॥६२॥ दासभूतं यदात्मानं बुद्धचेत परमात्मनः । तदैव गात्रं कुर्वीत शङ्खचक्रादिलाञ्छितम् ॥६३॥ जब साधक या शिष्य परमेश्वर श्रीविष्णु की दासभावना का स्वयं अन्तरात्मा से बोध अनुभव करे तभी उसके शरीर को शंख, चक्रादि से यथास्थान लांछित करना चाहिए॥६३॥ अङ्कितं क्वचिदप्येवं चक्रेणैकेन केवलम् । अनिष्टानान्तु भूतानां न तावद्वशगो भवेत् ॥६४॥ भागवतत्व की स्थिति इन चक्रादि के लांछन से होती है अतः किसी को केवल एक चक्र मात्र के लांछन के द्वारा भी अंकित किया जा सकता है (पूरे शरीर के निर्धारित स्थानों के विकल्प में अथवा शंख तथा चक्र की मुद्राओं के द्वारा अथवा सभी श्रीहरि के आयुधों की मुद्राओं से शरीर को अंकित किया जाना चाहिए।) ऐसा करने से अनिष्टकारी भूतादि तथा यमकिङ्करों पिशाचादि के वश में वह नहीं आ सकता है॥६४॥ अग्निषोमौ हि चक्राब्जौ सर्व एव तदात्मकाः । यदि वा मानयन्नेकं पूर्णो हि परमश्नुते ॥६५॥ चक्र तथा शंख अग्निषोमीय स्वरूप वाले माने गये हैं (अर्थात् चक्र अग्नि तथा अब्ज (शंख) सोमरूप है तथा सभी देवगण इन्हीं रूपों वाले माने जाते हैं। अतएव चक्र का धारण (ही) मुख्य है। या इन दोनों में से किसी एक को ही मुख्य मानते हुए धारण करे तो भी वह पूर्ण होकर परमफल का दाता होता है॥६५॥ शङ्खचक्रप्रधानं हि सर्वमन्यद् गदादिकम् । अङ्कितः शङ्खचक्राभ्यां सर्वैरङ्कित एव वा ॥६६॥ क्योंकि श्रीनारायण के सभी आयुधों में शङ्ख तथा चक्र की प्रमुखता है। अतः शङ्ख और चक्र के द्वारा अंकित होने पर वह सभी आयुधों से अङ्कित होकर (पूर्ण भागवत के रूप में) मान्य हो जाता है॥६६॥