नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अथ तृतीयोऽध्यायः अथ स्वकर्मनिरतः प्राज्ञो भक्तः सुलक्षणः । सत्सेवाभिरतो ह्येव प्रपन्नः सिद्धिमाप्नुयात् ॥१॥ (सत्सेवनाधिकारः) वृत्ति के अंगों के निदर्शन के साथ अब प्रपत्ति का विवेचन करते हैं:- तब दृष्टि सम्पन्न बुद्धिमान् एवं भगवत् लांछन से मण्डित भक्त अपने पूज्य सन्त की सेवा में निरत रहते हुए “प्रपत्ति” भाव में स्थित रहने पर सिद्धि की प्राप्ति करता है। (या निःश्रेयस को प्राप्त करता है)॥१॥ यथार्हं विहितैस्तैस्तैः संस्कारैः संस्कृतः क्रमात् । नयेदात्मगुणोपेतस्तानि तानि व्रतानि च ॥२॥ यह साधक या भक्त सर्वप्रथम उन विहित गर्भाधानादि संस्कारों से क्रमशः संस्कृ होकर सर्वभूतों के प्रति करुणादि आठ आत्मगुणों से युक्त रहकर तथा वेदव्रत जै नियत कर्मों को पूर्ण करे या उनका आचरण करे²॥२॥ ध्यात्वा नारायणं देवमादौ कर्म्माण्यशेषतः । तस्यैवाराधनया कुर्यात् सङ्कल्पपूर्वकम् ॥३॥ फिर सर्वप्रथम श्रीनारायण देव का ध्यान कर सभी कर्मों को उन्हीं के आराधन पर मानकर उसी देव की ही आराधना में अपने समस्त कर्मों का संकल्प पूर्वक आचर करें³॥३॥ समाप्तानि च कर्माणि तस्मिन्नेव समर्पयेत् । आदावन्ते च मन्त्राणां योजयेद् व्यापकान्तरम् ॥४॥ १ इस अध्याय में विहिताचार, दृष्टि, भक्ति, लक्ष्म तथा सत्सेवन का विवरण रहने से य संग्रहरूप श्लोक विषय प्रवर्तनरूप है। पूर्व में विहिताचार तथा दृष्टि आदि का कथन हुआ था औ निषिष्ठ विवर्जन की इस क्रम में चर्चा भी रहेगी। यह सभी इस एक श्लोक से संकेतित क है। २ प्रकृत कारिका से विहित आचारों का विवरण आरंभ किया गया है। ३ कारिका में प्रयुक्त तस्यैव पद से श्रीविष्णु की अर्चना की मुख्यता तथा प्रथम सम्पादन का संके है अतः अग्नि, इन्द्रादि का अर्चन करने में इस बात का ध्यान रखा जाना आवश्यक है।