नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता भी भक्ति के विरुद्ध माना जाता है। स्वयं के प्रपत्तिरूप धर्माचरण होने से अपने कु तथा वर्णाश्रम के उपयुक्त धर्मों से बाधा रहने के कारण प्रपत्ति का वर्जन करना त असच्छास्त्रों में रुचि ग्रहण करते हुए विष्णु देवता के अंकभूत शंखचक्रादि की उपे करना, भागवत-जन से संसर्ग न रखना¹, भागवतजन का तिरस्कार करना, अप दीक्षा तथा मन्त्रादि के प्रदाता गुरुजन को मानवरूप में सामान्य भाव से देखना त उन्हें अधिक गौरव प्रदान नहीं करना, ये सभी सत्सेवा के विपरीत कार्य क गये हैं॥९३-९७॥ इति भागवतस्योक्ताः प्रपन्नस्य विशेषतः । अपाया दुस्त्यजा ह्येते देह-बन्ध-निबन्धनाः ॥९८॥ इस प्रकार पूर्व में कही गयी ये सभी बातें विशेषकर दीक्षित तथा प्रपत्ति भाव न्यासयोग के आचरणकर्ता को भगवत् प्राप्ति के उपाय में संलग्न रहनेवाले त तन्निष्ठभाववालों के लिये वर्जित हैं। ये सभी यद्यपि देह धारण के कारण एक छोड़े नहीं जा सकते हैं परन्तु ये विषभूत हैं तथा इन्हें छोड़ना आवश्य है॥९८॥ एतानन्याँश्च विविधानपचारान् विशेषतः । सर्वानप्यनपाकृत्य नाप्नोति मधुसूदनम् ॥९९॥ इस प्रकार ऐसे अपचारों (विघ्नों) को तथा आगे कहे जाने वाले अपायों को भी ज तक हटाया नहीं जाएगा तब तक मधुसूदन श्रीविष्णु की अनुग्रह प्राप्ति सम्भव न होगी॥९९॥ अतो देहस्य कालुष्यान्मन्त्रमर्थेन केवलम् । आवर्त्तयन् सदा वृत्तिङ्कुर्वन् कालं नयेत् सुधीः ॥१००॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां न्यासोपदेशो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ इसलिये शरीर की कलुषता के कारण दीक्षा प्राप्त मन्त्र के अर्थादि चिन्तन बार-बा आवृत्ति करते हुए तथा विहित तथा आचारानुगत करते हुए जीवन के शेष समय बिताया जाए॥१००॥ नारदपंचरात्र आगम में 'भारद्वाज-संहिता' के न्यासोपदेश की 'तत्वप्रकाशिका' हिन्दी व्याख्या का प्रथम अध्याय सम्पूर्ण १ यहाँ विहिताचार विरुद्धता को ग्रन्थकार ने दिखलाया है तथा अगले अध्यायों में सत्सेवा के विरुद्ध का का विवरण दिया गया है। ये सभी अपायरूप हैं जिनकी हेयता अभीष्ट हैं।