भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित ४५ (भगवत्परक्) कर्मों के द्वारा उन सभी पातकों को (वह वृत्ति) क्षीण या नष्ट कर देती है तथा पातकों को शान्त कर देती है॥९०-९१॥ एकान्ती शक्तितः कुर्वन् विहितानि समुत्सुकः । तथैव प्रतिषिद्धानि त्यक्त्वा याति परां गतिम् ॥९२॥ अतएव इष्ट के प्रति उत्सुकभाव रखते हुए साधक या मन्त्र एकांत की स्थिति (वाला बनकर) में विहित कर्मों का शक्ति भर आचरण करें तथा इसी प्रकार प्रतिषिद्ध कर्मों का परित्याग करते हुए जीवन यापन कर अन्त में परमगति (मोक्ष) को प्राप्त करे॥९२॥ पाखण्ड-शैवशाक्तादि-तन्त्राचारलोकनादिकम् । स्वतो ब्रह्मशिवादीनां बद्धानामर्च Strad...नादिकम् ॥९३॥ ऊनधीः समताशङ्का विष्णोर्विस्मृतिरेव च । अनादरश्च तन्मन्त्रलक्षणार्चाक्रियादिषु ॥९४॥ तस्यैवात्यन्तिके दास्ये विमतिः कामकामिता । अविश्वासः प्रपदने साधनान्तरसंश्रयः ॥९५॥ साधनत्वाभिमत्या च निजधर्मस्य वर्जनम् । असच्छास्त्रेष्वभिरतिर्दिव्यशास्त्रावधीरणम् ॥९६॥ अभागवतसंसर्गो रीढा भागवतेषु च । मर्त्यसामान्यभावेन गुरौ चानतिगौरवम् ॥९७॥ दृष्टि विरुद्ध तत्वों में पाखण्डों (जैन तथा बौद्धागर्मों), शैव, शाक्त आदि तन्त्रों के अनुसार देवतार्चन आदि का करना तथा स्वयं ही गुणों से बद्ध ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवताओं का दृष्ट या इष्टभाव में अर्चनादि करना यह सभी 'भक्ति' के विरुद्ध कार्य माना जाता है।१ इसके अतिरिक्त अपने इष्ट की सामर्थ्य (या स्वरूपादि) में न्यूनताबुद्धि रखना, उनके समान दूसरे इष्ट की समता की मन में आशंका रखना, इष्टदेव विष्णु को विस्मरण कर देना तथा उनके मन्त्रों, लक्षणों तथा अर्चादि आस्था में उपेक्षा भाव का रखना दृष्टि तथा भक्ति के विरुद्ध कर्म माना गया है। अथवा प्रपत्ति से किये गये आत्यन्तिक दास्यभाव से विरुद्ध बुद्धि की स्थिति रखने लगना, किसी काम्य या इष्टभाव की इच्छा करना, प्रपत्ति के विषय में दृढ़ विश्वास में शिथिलता लाना या विधानों के अतिरिक्त दूसरे साधनों को (आश्रय) ग्रहण करना १. पाखण्ड जो वेद के प्रतिकूल है उनके साधनापथ का अनुशीलन या अनुमोदन करना भक्ति के मार्ग में बाधक होता है क्योंकि इससे दृष्टिभेद उत्पन्न होता है। अनेक गुणाश्रित देवगण का अर्चन भक्ति विरुद्ध कार्य है। ३