भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 176 में से

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३८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता दीक्षा लेते हैं तो उनकी यह प्रपत्ति इस प्रकार होने पर भी न किये के समान निष्फल है (अतः किसी पाञ्चरात्र आगम के वेत्ता तथा पारम्परिक विद्वान् को ही आचार्य मानकर उनके द्वारा ही मन्त्र से दीक्षित होना उत्तम है)॥५९॥ अतोऽन्यत्राशु विधिवत् कर्तव्या शरणागतिः । उपदेष्टा तु मन्त्रस्य मूढः प्रच्यवते ह्यधः ॥६०॥ अतएव स्त्री, शूद्रादि से भिन्न आचार्य के प्राप्त होने पर ही उनके द्वारा ही विधिवत् श्री हरि की शरणागति की दीक्षारूप प्रपत्ति से न्यासयोग को मन्त्रउपदेशपूर्वक ग्रहण करना चाहिए। मन्त्रों के स्त्रीशूद्रादि को उपदेश करते रहने पर आचार्य भी मूढ होकर पतन को प्राप्त करते हैं¹॥६०॥ अनादेर्वासनायोगाद् विपरीतादिहात्मनः । स्मृतिर्न जायते विष्णौ कुत एवार्पणे मतिः ॥६१॥ और जो अनादिदुर्वासनाओं से कलुषित अन्तरात्मावाले हैं उनमें स्थित अनादि वासनाओं के कारण आत्मस्वभाव से विपरीतस्थिति बन जाने से उनमें स्वयं मे श्रीविष्णु को समर्पित करने की शरणागति भाव की स्मृति तक नहीं आती हो तो फिर उनको 'न्यास' की भावना कहाँ से आ सकती है॥६१॥ स्वपापसम्भवादेव कुलात् संसर्गतो ऽन्यतः । देशात् कालात् स्वभावाच्च प्रपद्यन्ते न केशवम् ॥६२॥ वे अपने पापों के उदय के बने रहने के कारण तथा कुल तथा अन्य निषिद्ध कर्मों तथ उनके कर्ताजन के संसर्ग में रहने के कारण, दूसरे भगवद्विमुख जन से युक्त रहने के कारण, देश, काल तथा स्वभाव के वातावरण में स्थित होकर श्रीमद्विष्णु की शरण प्राप्त करने के अवसरों से स्वतः ही वञ्चित रहते हैं॥६२॥ अविज्ञाय सदा शुद्धं नराः नारायणं प्रभुम् । अशुद्धानामहो ऽन्येषां दास्यमिच्छन्त्यबुद्धयः ॥६३॥ ऐसे नर स्वतः की पापमूलक दुर्बुद्धि के कारण शुद्ध-स्वरूप वाले श्रीनारायण को ठीक से न जानकर अन्य इष्ट देवता की शरण ग्रहण करने लगते है और वे अपनी अल्पबुद्धि के कारण कार्यवश राजस तथा तामस गुणों के अधिपति ब्रह्मादि अन्य देवगणों की शरण या उपासना की दीक्षा ग्रहण कर लेते हैं॥६३॥ केचित् सर्वेश्वरं विष्णुमशेषदुरितापहम् । कामकामाः प्रपद्यन्ते न ते दास्यं परं विदुः ॥६४॥ १ यहाँ 'मूढः प्रच्यवते ऽधमः' पाठ भी मिलता है जिसका अर्थ है कि अधम या शूद्र अपनी अहंबुद्धि से यदि मन्त्र का उपदेश देता है तो उसका पतन हो जाता है।

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