नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता मृत्तिका का सव्यहस्त के द्वारा निघर्षण कर उससे ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाकर धारण करे। यह कार्य वह आसीन होकर स्वयं की अंगुलि में मृत्तिका से ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे॥७२॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रं ललाटे तु कुर्वीत चतुरङ्गुलम् । उदरे हृदि कण्ठे च दशाष्टचतुरङ्गुलान् ॥७३॥ ललाट पर यह ऊर्ध्वपुण्ड्र चार अंगुल के प्रमाण का उन्नत रखना चाहिए तथा उदर, हृदय तथा कण्ठ देश पर क्रमशः दस, आठ तथा चतुरंगुल प्रमाण का रखना चाहिए॥७३॥ दक्षिणोदरबाह्वंसेष्वेवं त्रीणीतरस्य च । आद्यवत् पृष्ठतो द्वे च मूर्ध्नि चैवं त्रयोदश ॥७४॥ उदर के दक्षिण भाग पर, दक्षिण बाहु तथा स्कन्ध पर तथा उदर के वामभाग, बाहु तथा स्कन्ध पर इसी क्रम से दस, आठ तथा चार अंगुलों वाले ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे। ललाट के ऊर्ध्वपुण्ड्र की तरह ही पृष्ट देश में दो तथा मूर्धा पर एक ऊर्ध्वपुण्ड्र रखें। इसी प्रकार शरीर पर इनकी संख्या तेरह रहती है॥७४॥ त्रिधा सर्वत्र विस्तारश्चतुस्त्रिद्व्यङ्गुलं क्रमात् । उत्तमो मध्यमो हीनः पार्श्वद्व्यङ्गुलिकौ स्मृतौ ॥७५॥ इन सभी ऊर्ध्वपुण्ड्रों में चार, तीन तथा दो अंगुलों की लम्बाई का विस्तार क्रमशः उत्तम, मध्यम तथा हीन माना जाता है। अतएव इनके अतिरिक्त मध्यम तथा हीन बाजुओं में ये अंगुलि मात्र प्रमाण के रहते हैं॥७५॥ तत्र तत्र स्मरन् मन्त्रैः केशवादीन्न्यसेत् क्रमात् । पाणिना दक्षिणेनैव वासुदेवं त्रयोदशे ॥७६॥ इनमें जहाँ तहाँ ललाटादि प्रदेश में रहनेवाले ऊर्ध्वपुण्ड्रों में केशवादिरूपों का ध्यान करते हुए उनके मन्त्रों से क्रमशः केशवादि का वहाँ न्यास करे। इन शिर आदि त्रयोदश ऊर्ध्वपुण्ड्रों में वासुदेव मन्त्र से दक्षिण हस्त के द्वारा ही वासुदेव का न्यास करें॥७६॥ प्रणवेन तथा व्यूहैः षडष्टद्वादशाक्षरैः । मन्त्रैरन्यैश्च ताँस्तान् वै धारयेदूर्ध्वपुण्ड्रकान् ॥७७॥ प्रणव के द्वारा तथा केशव के षड् आठ तथा द्वादशाक्षर वाले अपने उपदिष्ट मन्त्रों से या उनके व्यूह चतुष्टय के त्रिगुण होकर द्वादश मन्त्रों से उन उन ऊर्ध्वपुण्ड्रों को धारण करना चाहिए॥७७॥