भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 176 में से

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हिन्दीटीकासहित ६३ ततो दिव्यञ्च हारिद्रं सहेम-तुलसीदलम् । मन्त्रेण धारयेच्चूर्णं ललाटे मस्तके तथा ॥७८॥ इसके उपरान्त श्री भगवदर्पित सुवर्ण तुलसीदल चूर्ण मिश्रित हरिद्रा चूर्ण को ललाट तथा मस्तक पर मन्त्र के साथ (अधिकारानुसारी ‘श्रियो जात’ इत्यादि मन्त्रादि के साथ) धारण करना चाहिए॥७८॥ पवित्राण्यब्जबीजानि शङ्खचक्राङ्कभूषणम् । धारयेद् वैष्णवं नाम वैष्णवाश्रयमेव वा ॥७९॥ पवित्रारोपणादि उत्सव के अवसर पर श्रीभगवान् विष्णु के द्वारा धारण किये गये तन्तुमय पद्माक्ष बीज के वलयों (तुलसी काष्ठ निर्मित अक्ष वलय और अन्य वैष्णवों के इष्ट कण्ठी आदि को) तथा शंख चक्रादि से अङ्कित मुद्रिकादिभूषणों को जो वैष्णवाश्रय होकर नाम से भी वैष्णव भूषण हो गये हों तथा भगवत्सम्बन्धित भूषणों को धारण करना चाहिए॥७९॥ अयुक्सूत्रैर्व्यतिस्यूतं धारयेत् कटिबन्धनम् । कौपीनं वस्त्रयुग्मञ्च यथार्हमितराणि च ॥८०॥ उसे अयुग्म या तीन सूत्रों से बट कर बनाया हुआ कटिसूत्र का धारण करना चाहिए, कौपीन के दो वस्त्रखण्डों को रखना चाहिए तथा यथायोग्य आवश्यकतानुरूप अन्य वस्त्रों (उष्णीष आदि) को शरीर पर धारण करना चाहिए॥८०॥ लक्षणानि स्फुटान्येव क्रियासिद्धिकराणि तु । धारयेन्नोपहन्येत कदाचित् किङ्करादिभिः ॥८१॥ शंख, चक्र, ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि लक्षणों को स्पष्ट रूप में प्रकट होने वाले आकारों में धारण करने से ये क्रियाओं के सिद्धि-कारक भगवान् श्रीविष्णु के किंकरभाव की योग्यता के सम्पादक होकर भी रहने से इनका धारण करना इष्ट है जिससे कभी भी यम देवता के किङ्कर दूतादि से बाधा नहीं होती है॥८१॥ सत्सेवाधिकार- दण्डवत्प्रणमेद् भूमावुपैत्य गुरुमन्वहम् । दिशे वाऽपि नमस्कुर्याद् यत्रासौ वसति स्वयम् ॥८२॥ आचार्यायाहरेदर्थानात्मानञ्च निवेदयेत् । तदधीनश्च वर्तेत साक्षान्नारायणो हि सः ॥८३॥ अपने अहंकार को हटाकर प्रतिदिन अपने उपदेष्टा पूज्य गुरु को दण्डवत् प्रणाम पृथ्वी पर झुककर करना चाहिए अथवा जिस स्थान पर वह निवास करता हो उसी दिशा को गुरु का आवास स्थान मानकर (गुरु के न मिलने पर) प्रणाम कर लेना

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