नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता चाहिए। अपने आचार्य के लिये धनादि देने को लावे तथा अपना परिचय निवेदन क उनकी आज्ञा का अनुसरण कर स्थित रहे, क्योंकि आचार्य स्वयं नारायण स्वरूप होता है (आशय यह कि भगवद्विषयक सारी वृत्तियां तथा श्रद्धा को गुरु के लिये भी किय जाना चाहिये)॥८२-८३॥ कुर्वीत परमां भक्तिं गुरौ तत्प्रियवत्सलः । तदनिष्टापवादी च तन्नामगुणहर्षितः ॥८४॥ आचार्य का भक्तवत्सल होकर अपने पूज्य गुरु के प्रति परम भक्ति रखे तथा अपनी ओर से गुरु के अनिष्ट का विरोध करे तथा उनके वचन, नाम तथा गुणों का अनुवाद सुनकर प्रसन्नता दिखलाए॥८४॥ नित्यं गुरुमुपासीत तद्वचःश्रवणोत्सुकः । विग्रहालोकनपरस्तस्यैवाज्ञाप्रतीक्षकः ॥८५॥ नित्य ही वह अपने आचार्य या उपदेष्टा गुरु की उपासना करता रहे तथा उनके कथन (उपदेश वचन) को सुनने को उत्सुक रहे। उनके शरीर की सेवा में सदैव तत्पर रहे तथा उनके द्वारा दी जाने वाली आज्ञाओं की सदा प्रतीक्षा करत रहे॥८५॥ प्रक्षाल्य चरणौ पात्रे प्रणिपत्योपयुज्य च । नित्यं विधिवदर्घ्याद्यैरादृतोऽभ्यर्चयेद् गुरुम् ॥८६॥ वह अपने आचार्य के चरणों को पात्र में स्थापित कर उन्हें प्रक्षालित करे तथ दण्डवत् प्रणाम कर पादप्रक्षालन के जल का आचमन कर ग्रहण करे तथा प्रतिदिन अर्घ्यादि लेकर आदर करते हुए आचार्य का अर्चन करे॥८६॥ इच्छाप्रकृत्यनुगुणैरुपचारैः सदोचितैः । भजन्नवहितश्चात्र हितमावेदयेद् रहः ॥८७॥ वह सदा उनकी इच्छा तथा प्रकृति के अनुरूप उपचारों से सेवा करे तथ सावधानीपूर्वक रहते हुए आचार्य के हितों को अलग एकान्त होने पर उन बतलावे॥८७॥ यथानुजीवी नृपतिं यथा भक्तस्तु दैवतम् । तथैव देशिकं शिष्यः सेवेत विनयान्वितः ॥८८॥ १ आचार्य भगवद्रूप है। यह पारम्परिक वचन है-'साक्षात्नारायणो देवः कृत्वा मर्त्यमयीं तनुम् मग्नानुद्धरते लोकान् कारुण्याच्छास्त्रपाणिना।।' अतएव भगवद्विषयक वृत्ति के समान उस आचार्य के प्रति भी आचरण प्रमाण सम्मत है।