नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ६५ जैसे कोई राजसेवक अपने स्वामी राजा का अथवा जैसे कोई भक्त अपने इष्टदेव की विनयपूर्वक सेवा करता रहता है उसी प्रकार वह शिष्य अपने देशिक (गुरु) की सेवा करे॥८८॥ स्नातञ्च गुरुणा यत्र तीर्थं नान्यत्ततोऽधिकम् । यच्च कर्म तदर्थन्तद्विष्णोराराधनात् परम् ॥८९॥ अपने गुरु ने जिस जलाशय (नदी, सरोवर या कूप) में स्नान किये उससे अधिक अन्य श्रेष्ठ तीर्थ नहीं है१ तथा जो भी कार्य उनके लिये किया जाता है वह स्वयं श्रीविष्णु की आराधना के समान श्रेष्ठ कार्य है॥८९॥ अपदिश्य पितॄन् देवान् गुरौ यत् प्रतिपाद्यते । देश-काल-क्रिया-मन्त्र-निरपेक्षं तदक्षयम् ॥९०॥ अपने पितरों तथा देवताओं को भी न देते हुए जो हव्य कव्य पदार्थ आचार्य को प्रदान किया जाता है वह देश, काल, क्रिया तथा मन्त्रों की बिना अपेक्षा किये हुए भी अक्षय होता है॥९०॥ आत्मनो ह्यतिनीचस्य योगिध्येयपदार्हताम् । कृपयैवोपकर्त्तारमाचार्यं संस्मरेत् सदा ॥९१॥ अतिशय हीनात्मा को भी योगिजन से ध्यान करने (प्राप्तव्य) योग्य पद की योग्यता को जो अपनी करुणामयी कृपा के द्वारा उपदेशों के उपकार से शक्य बनाता है, अतः ऐसे उपदेष्टा आचार्य का सदैव स्मरण करना चाहिए॥९१॥ स्वयं देहानुकूलानि धर्मार्थोपयिकानि च । कुर्यादप्रतिषिद्धानि गुरोः कर्म्माण्यशेषतः ॥९२॥ वह सदां आचार्य के शरीर के अनुकूल पादसंवाहन आदि सेवा तथा धर्म और अर्थ के उपयुक्त अग्नि परिचर्या देवपूजन आदि शास्त्र के अनुगत तथा अप्रतिषिद्ध कर्मों को स्वयं सम्पन्न करे॥९२॥ योऽसौ मन्त्रवरं प्रादात् संसारोच्छेदसाधनम् । प्रतीच्छेद् गुरुवर्यस्य तस्योच्छिष्टं सुपावनम् ॥९३॥ जो आचार्य मोक्ष के हेतुभूत श्रेष्ठ मन्त्र को प्रदान करता है उस आचार्य का पवित्रभूत उच्छिष्ट प्रासादं पवित्र भगवत्प्रसादवत् आचार्यके वदनसे स्पृष्ट अन्नादि को स्वीकार करे॥९३॥ १ गुरु के स्नान से पवित्र तीर्थ का भागवत् में इस प्रकार माहात्म्य दिखलाया है- 'भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो । तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तस्थेन गदाभृता ॥' अतएव ऐसे पवित्रभूत जल से स्नान करना आचार तथा विनयाचार भी शास्त्रसम्मत है।