भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 176 में से

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पृष्ठ 68

६६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता ये चोपकुर्वते ज्ञानं किमप्यच्युतसंशयम् । विनोच्छिष्टाशनं कुर्याद् वृत्तिं तेष्वपि गौरवात् ॥९४॥ श्रीमद्भगवान् अच्युत विषयक मोक्ष साधक ज्ञान का जिस गुरु के उच्छिष्टाशन कर्म से उपकार होता है या ऐसे ज्ञान को जो प्रदान करता है, ऐसे अन्य गुरुजन उच्छिष्टाशन से वर्जित अपने गुरु के समान ही वृत्ति का आचरण करे॥९४॥ गुरोश्च पत्नीपुत्रादिष्वन्येष्वप्यमलात्मसु । कुर्यादाचार्यवद्वृत्तिं तत्र तत्र व्यवस्थया ॥९५॥ अपने पूज्य गुरु की पत्नी तथा पुत्रादि भ्राता आदि तथा उनके अंतरंग ऐसे शिष्टजन सहृदयादि निर्मल स्वभाव वाले हों तो उन सभी में यथा पर्या उच्छिष्टाशनादिवर्ज्य पादोपसंग्रहणादि आचार का पालन करे॥९५॥ आचार्योऽपि तथा शिष्यं स्निग्धो हितपरः सदा । प्रबोध्य बोधनीयानि वृत्तिमाचारयेत् स्वयम् ॥९६॥ गुरु भी विनयादि सम्पन्न शिष्य के प्रति कृपापूर्ण तथा सदैव शिष्यहित की चिन्ता रहकर उन्हें बतलाने योग्य सभी विषयों का उपदेश देते हुए सदा प्रबुद्ध करे तथा स्व अपनी वृत्ति का यापन करे॥९६॥ निजधर्मानुरोधेन वैष्णवैरेव वैष्णवः । कुर्यात् सर्वाणि कार्याणि न कदाचिदवैष्णवैः ॥९७॥ अधिकैः सदृशैर्वाऽपि कुर्यादेव तु सङ्गमम् । हीनांश्च नावमन्येत न च दोषं विभावयेत् ॥९८॥ वह शिष्य अपने से अधिक योग्य अथवा अपने समान बुद्धिवाले अन्य शिष्यों क संगति रखे। वह अपने से कम योग्यता या स्थिति वालों की अवहेलना न करे और ही उनमें दोषों की चिन्ता या निदर्शन करे॥९८॥ वृद्धानाचारसम्पन्नान् विष्णुभक्तान् दृढव्रतान् । सतः सत्सेवनपरान्नित्यं सेवेत सन्नतः ॥९९॥ वह सदा विनम्र भाव से ऐसे सन्तजन की जो श्रीहरि के भक्त तथा इष्ट के प्रति दृ आस्था एवं व्रतशील रहते हो आचार सम्पन्न हों तथा सज्जनों के सेवी हों तो उनक सदा सेवन (सेवा) करना चाहिए॥९९॥ १ इस विषय में विहगेन्द्रसंहिता का यह वचन-‘आचार्यपत्नीं पुत्रं वा मातापितरौ सोदरम् आचार्यमेव मन्येत अन्यथा नाशमाप्नुयात् ॥”

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