नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
DevanagariHindipublished176 पृष्ठ
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हिन्दीटीकासहित ६७ एवं स्वकर्मणि ज्ञाने भक्तौ च परिनिष्ठितः । वैराग्येण च संयुक्तो न चेह जायते पुनः ॥१००॥ इस प्रकार वह अपने विहित आचारों में इष्ट के दृष्टज्ञान तथा भक्ति वैराग्यादि में परिपक्व या दृढ़ धारणा रखकर वर्तत करने पर पुनः इस लोक में जन्म ग्रहण नहीं करता है॥१००॥ (इति सत्सेवनाधिकारः) इति श्रीभारद्वाजसंहितायां न्यासोपदेशो तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ (भारद्वाज संहिता के न्यासोपदेश का तृतीय अध्याय समाप्त)