नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अथ चतुर्थोऽध्यायः प्रीतिरूपाँस्तथा विष्णोः स्वधर्मानाचरेद् यथा । तथैवाप्रीतिरूपाणि प्रतिषिद्धानि वर्जयेत् ॥१॥ प्रपत्ति या न्यास-योग में स्थित साधक भक्त को अपने इष्टभूत श्रीविष्णु के प्रीतिरूप या प्रीतिकारक स्वधर्म का आचरण जैसे इष्ट होता है उनका अनुगमन करे वैसे ही उन्हें अप्रीतिरूप जो प्रतिषिद्ध धर्म है उनको निषिद्ध मान कर वह उनका परित्याग भी करे॥१॥ विष्णोर्ध्यानप्रणाभार्चास्तुतिचिह्नादिवर्जितम् । समारब्धन्तु यत् कर्म तत्कर्म विफलं भवेत् ॥२॥ जिस धर्माचरणभूत कर्म में श्रीविष्णु के ध्यान, प्रणाम, अर्चन, स्तुति तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र जैसे चिह्न का विधान न रहे और यदि ऐसा कोई कर्म आरम्भ किया गया हो तो वह कर्म निष्फल होता है॥२॥ विष्वक्सेनः स्मृतो नेता भगवांच्छुद्धकर्मणाम् । तस्मान्नान्यमुपासीत कर्मणां विघ्नशान्तये ॥३॥ आरब्ध एवं अनुष्ठित सभी शुद्धकर्मों के भगवान् विष्वक्-सेन (श्रीविष्णु) ही प्रभु या पूर्णकर्ता माने गये हैं। अतएव विघ्नादि की शान्ति हेतु भी अन्य देवता की उपासना नहीं करना चाहिए॥३॥ ब्रह्मारुद्रदिगीशार्कतच्छक्तिप्रसवादयः । नित्यसम्पर्चने वर्ज्याः काम्योऽपि स्यान्न तन्मुखः ॥४॥ ब्रह्मा, रुद्र, दिक्पाल, सूर्य, इन ब्रह्मादि की शक्तियां (मातृकाएं) तथा इन देवगणों के पुत्रादि देवगणों की नित्य अर्चा (कर्मविशेष में कभी अपेक्षित होने पर भी) वर्जित मानी गयी है। अतएव काम्य कर्म के रहने की अपेक्षा पर भी इनकी अर्चा में अभिमुख न रहे॥४॥ न जातु परमां वृत्तिं कुर्वीत विरसाशयः । प्रमादालस्यनास्तिक्यकामाद्यैर्न च हापयेत् ॥५॥ उस निष्पार्कन की निष्ठा गयी वृत्ति को भक्तिहीन भाव से कभी न रखे तथा उसे