भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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७२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता दिखलाने वाले समझ कर उनकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिए (परन्तु तात्त्विक¹ न्यायपरिशुद्ध ऐसी वस्तु की सहमति रखे जो कुदृष्टि से रहित हो।।२०।। प्रकृतिं पुरुषं योगं परं पाप्यञ्च माधवम् । अन्यथा मन्यमानानां स्मृतीश्च परिवर्जयेत् ॥२१॥ त्रिगुणात्मक स्वरूप वाली प्रकृति तथा चिद्विशिष्ट पुरुष के सम्बन्ध अथवा जीवात्मा परमात्म सम्बन्ध को मुक्त्युपाय से प्राप्य माधव से अन्यथा या दूसरे कार्यादि में² प्राप्य मोक्ष को बतलाने वाले सांख्य, योग दर्शन, स्मृति आदि को भी (श्रीहरि की भक्ति के तथा सिद्धान्त के प्रतिकूल समझते हुए) अनन्यभाव के प्रति बाधक समझना चाहिए॥२१॥ नाद्रियेत् पुराणादीन् राजसाँस्तामसाँस्तथा । अनीशानां परेशत्वं वृथा यत्रोपवर्ण्यते ॥२२॥ इसी तरह रजोगुण की प्रधानता तथा तमोगुण की प्रमुखता के प्रतिपादक ऐसे पुराणों को भी जिनमें ईश श्रीमन्नारायण की परमप्रभुता से भिन्न अन्य देवेश ब्रह्मादि की प्रमुखता वर्णित हो॥२२॥ तथा रुद्रेण कथितं मोहनं क्षुद्रकामदम् । तन्त्रं बहुविरुद्धञ्च तामसं परिवर्जयेत् ॥२३॥ इसी प्रकार तामस तत्व से अनुप्राणित श्रीरुद्र द्वारा कथित सामान्य एवं लौकिक इच्छाओं की पूर्ति करने तथा उन्हें प्रदान कर देने में समर्थ पाशुपतादि तन्त्रों को भी भगवन्निष्ठा में बाधक मानकर परिहार्य माने॥२३॥ अन्येषां त्रिदशादीनां स्तुतीर्मन्त्राँश्च वर्जयेत् । निबन्धनं गुणादीनां निबन्धाँश्चान्यचेतसाम् ॥२४॥ अन्य उपास्य देवगणों की स्तुति तथा उनके मन्त्रादि का भी काम्य पाठ नहीं किया जावे जिनमें उन उन देवगणों के आपदादि उद्धारक गुणों का विवरण दिया जावे तो १ यद्यपि अष्टादश स्थानों में प्रमाण से वस्तु परीक्षण हेतु न्याय का स्थान महत्वपूर्ण हैं फिर भी ऐसे न्याय का कुदृष्टि को छोड़कर ग्रहण करना निरापद है। ऐसा न्याय परिशुद्ध तथा परमेश की ऐकान्त्यभावना में सहायक ही होता है अतः इसे स्वीकार करना उचित है। २ इसका समर्थन-'या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फला ज्ञेया तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ।।' यह मनूक्तवचन भी करता है कि राजस तथा तामस मूलक स्मृतियों के विधानों का ग्रहण उपादेय नहीं। कपिलादि की प्रणीत सांख्यदर्शन की तथा योग का भी बादरायण ने-अतएव 'एतेन योगः प्रत्युक्त' जैसे सूत्र से प्रत्याख्यान किया था। इसी तथ्य को यहाँ उपर्युक्त कारिका में दिखलाया गया है।