नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ७३ इष्ट प्रभुनारायण से मन को हटानेवाले हो तो उनका भी परित्याग करे॥२४॥ बाह्यं दुष्टं तमोनिष्ठं विपरीतमनर्थकम् । मतं न सौगतादीनां मनसाऽपि विचिन्तयेत् ॥२५॥ तथा इसी प्रकार वेदबाह्य तथा वेदादि के विपरीत रहने वाले कुतर्ककारी तमोनिष्ठ तथा व्यर्थ के विषयों का विवेचन करनेवाले सौगतादि (बौद्धादि) धर्म तथा दर्शनादि के मत हैं उनका अतःकरण को लगाकर चिन्तन नहीं करना चाहिए॥२५॥ कामं मतानि चान्येषां पश्येत् प्राज्ञोऽपनुत्तये । न च तेषु प्रसज्येत नानुमन्येत नाभ्यसेत् ॥२६॥ चाहे बुद्धिमान् पण्डित वेद बाह्य मत के प्रतिपादक धर्मग्रन्थों तथा दर्शनों को उनके खण्डन के लिये ही देखें तथा उनका अध्ययन करे किन्तु वह उन उन मतों में मन को न लगाये और न उनके तर्कों का अनुमोदन मन में लाये और उनका आदरपूर्वक अध्ययन ही करे॥२६॥ इति दृष्ट-विरोधाधिकार भक्तिविरुद्धवर्जन अपचारांश्च विविधान् हरेर्यत्नेन वर्जयेत् । महानपायो माध्यस्थ्यं किम्पुनर्विपरीतता ॥२७॥ श्रीहरि के विषय में अन्य मतों के द्वारा आक्षेपों से पूर्ण विविध चिन्तनों तथा तर्कों का प्रयत्नपूर्वक निराकरण करना चाहिए। इस कार्य में मध्यस्थता या तटस्थता और भी अनर्थकारी होती है फिर विपरीत भाव रखना तो और भी अनर्थकारी होगा॥२७॥ विष्ण्वर्चारहिते ग्रामे विष्ण्वर्चारहिते गृहे । न कुर्यादन्नपानादि न तत्र दिवसं वसेत् ॥२८॥ ऐसे ग्राम में जहाँ श्रीविष्णु का अर्चन न होता हो (जहाँ श्रीविष्णु का कोई स्थान या मन्दिर न हो), जिस घर में श्रीविष्णु की उपासना तथा नित्य अर्चन न होता हो वहां अन्न तथा जल ग्रहण नहीं करना चाहिए तथा ऐसे स्थान पर एक दिन भी निवास या विश्राम न किया जावे॥२८॥ न च मन्त्रोपजीवी स्यान्नचाप्यर्थोपजीविकः । नानिवेदितभोगश्च न च निन्द्यनिवेदकः ॥२९॥