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नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

हिन्दीटीकासहित ७३ इष्ट प्रभुनारायण से मन को हटानेवाले हो तो उनका भी परित्याग करे॥२४॥ बाह्यं दुष्टं तमोनिष्ठं विपरीतमनर्थकम् । मतं न सौगतादीनां मनसाऽपि विचिन्तयेत् ॥२५॥ तथा इसी प्रकार वेदबाह्य तथा वेदादि के विपरीत रहने वाले कुतर्ककारी तमोनिष्ठ तथा व्यर्थ के विषयों का विवेचन करनेवाले सौगतादि (बौद्धादि) धर्म तथा दर्शनादि के मत हैं उनका अतःकरण को लगाकर चिन्तन नहीं करना चाहिए॥२५॥ कामं मतानि चान्येषां पश्येत् प्राज्ञोऽपनुत्तये । न च तेषु प्रसज्येत नानुमन्येत नाभ्यसेत् ॥२६॥ चाहे बुद्धिमान् पण्डित वेद बाह्य मत के प्रतिपादक धर्मग्रन्थों तथा दर्शनों को उनके खण्डन के लिये ही देखें तथा उनका अध्ययन करे किन्तु वह उन उन मतों में मन को न लगाये और न उनके तर्कों का अनुमोदन मन में लाये और उनका आदरपूर्वक अध्ययन ही करे॥२६॥ इति दृष्ट-विरोधाधिकार भक्तिविरुद्धवर्जन अपचारांश्च विविधान् हरेर्यत्नेन वर्जयेत् । महानपायो माध्यस्थ्यं किम्पुनर्विपरीतता ॥२७॥ श्रीहरि के विषय में अन्य मतों के द्वारा आक्षेपों से पूर्ण विविध चिन्तनों तथा तर्कों का प्रयत्नपूर्वक निराकरण करना चाहिए। इस कार्य में मध्यस्थता या तटस्थता और भी अनर्थकारी होती है फिर विपरीत भाव रखना तो और भी अनर्थकारी होगा॥२७॥ विष्ण्वर्चारहिते ग्रामे विष्ण्वर्चारहिते गृहे । न कुर्यादन्नपानादि न तत्र दिवसं वसेत् ॥२८॥ ऐसे ग्राम में जहाँ श्रीविष्णु का अर्चन न होता हो (जहाँ श्रीविष्णु का कोई स्थान या मन्दिर न हो), जिस घर में श्रीविष्णु की उपासना तथा नित्य अर्चन न होता हो वहां अन्न तथा जल ग्रहण नहीं करना चाहिए तथा ऐसे स्थान पर एक दिन भी निवास या विश्राम न किया जावे॥२८॥ न च मन्त्रोपजीवी स्यान्नचाप्यर्थोपजीविकः । नानिवेदितभोगश्च न च निन्द्यनिवेदकः ॥२९॥

७४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता श्रीहरि का प्रपत्तिशील भक्त अपनी जीविका मन्त्रों के पाठ तथा जप करके न चलावे और न ही देवपूजक होकर रहे। वह श्रीहरि को बिना अर्पण किये भोजन करनेवाला और भगवान् को प्रसादरूप में नित्यवर्ज्य खाद्यादि को अर्पण करनेवाला भी नहीं होना चाहिए॥२९॥ वर्ज्याः पाखण्डशैवाद्यैः स्थापिताश्च तथार्चिताः । अन्यत्र च स्वतो बद्धा नियमात् सर्वदेवताः ॥३०॥ ऐसी भगवत् प्रतिमाएं जिन्हें वैदिक ब्राह्मण पाखण्डजन तथा अन्य शैवादि ने स्थापित तथा पूजित की हो उनकी भी पूजनादि से दूर रहना चाहिए। नियमतः तु कर्मवश सभी देवता भगवत् शरीरभाव के बिना उपासना के योग्य नहीं माने जाते हैं॥३०॥ गृहे यस्यान्यदेवार्चा व्यक्तो न च जनार्दनः । न तस्य किञ्चिदश्नीयादपि वेदान्तवेदिनः ॥३१॥ जिस पुरुष के घर में अन्य देवगण की पूजन में श्रीविष्णु का पूजन व्यक्त रूप में नहीं होता हो तो यदि वह वेद या वेदान्तवेत्ता विद्वान् भी (अनेक यज्ञादिं का कर्त्ता विद्वान् ब्राह्मण भी) हो तो उसके यहाँ पर (कुछ भी) अन्नादि ग्रहण नहीं करना चाहिए॥३१॥ वर्जयेदन्यदेवानामाल्याद्युपसर्पणम् । तथा गोपुरहर्म्यार्चयानास्त्राद्यवलोकनम् ॥३२॥ इसी प्रकार श्रीविष्णु के अतिरिक्त अन्य देवताओं के मन्दिरों में दर्शनार्थ भक्ति से न तो जाना ही चाहिए और न उनके गोपुर, निवास भवन तथा रथोत्सवादि का अवलोकन या उनके त्रिशूलादि अस्त्रों की अर्चना ही करना चाहिए॥३२॥ गीतवादित्रघण्टादिशब्दानां श्रवणं तथा । कर्माणि च समस्तानि बाह्यान्याभ्यन्तराणि च ॥३३॥ उनके मन्दिर में होनेवाले गीत, वादन तथा घण्टादि शब्दों का श्रवण तथा वहाँ सम्पन्न होनेवाले अर्चनादि समस्त कर्म जो मन्दिर के अन्दर किये जाएं या जो मन्दिरों के बाहर हो रहे हों तो उनको भी नहीं देखना या कार्यों में सम्मिलित होना ही उचित है॥३३॥ द्रव्याणां भुक्तभोगानां स्वीकारं स्पर्शनन्तथा । भोगादीनां तदर्थञ्चाप्यर्थनां प्रतिपादनम् ॥३४॥ उन अन्य देवताओं के द्वारा भुक्त या अर्पित (प्रसादादि) अन्यान्य अन्नादि का स्वीकार करना उनका स्पर्श करते हुए या उनके वन्दनादि में झुक कर पृथ्वी को

हिन्दीटीकासहित ७५ स्पर्श करना या उनके देवताओं को अर्पित किये जानेवाले भोग्य पदार्थों (अन्नादि पक्व या अपक्व पदार्थों) को समर्पित करना भी उचित नहीं है॥३४॥ प्रणामं स्पर्शनं सेवां स्मरणं कीर्तनं तथा । निन्दाञ्च तद्भक्तिपराण्यप्येतानि विवर्जयेत् ॥३५॥ इसी प्रकार उन सभी अन्य देवताओं को प्रणाम करने, उनका श्रद्धा से स्पर्श करने, उनके मन्दिरों में सम्मार्जन या सफाई के लिये उनके स्थानों को लीपने पोतने की सेवा करने, उनके स्वरूप का स्मरण या स्तुति आदि करने या अन्य देवगण को भक्ति के साथ मन से प्रणाम करने जैसी क्रियाएं भी उचित नहीं है॥३५॥ इति भक्तिविरुद्धाधिकारः अथ लक्ष्म विरुद्धाधिकार शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्राद्यैश्चिह्नैः प्रियतमैर्हरेः । रहितः सर्वधर्मेभ्यः प्रच्युतो नैनमाप्नुयात् ॥३६॥ जो श्रीनारायण के अतिशय प्रिय शङ्ख, चक्र तथा उर्ध्वपुण्ड्र आदि लक्ष्म कहे गये हैं उनसे यदि कोई दीक्षित भक्त रहित है तो वह सभी धर्मों के अधिकारों से पतित होकर अन्त में श्रीनारायण को प्राप्त करने के योग्य नहीं रह जाता है॥३६॥ चक्राम्बुजगदाशार्ङ्ग- खड्गेभ्योऽन्यैर्हरेरपि । न लक्षणैर्दहेच्चाङ्गानान्यदग्धोऽर्हति क्रियाम् ॥३७॥ श्रीनारायण के लक्ष्मभूत जो शंख, चक्र, गदा तथा शार्ङ्ग और खड्ग है, इन पांचो के अतिरिक्त उनके अन्य किसी लक्ष्म से दग्ध पुरुष उनकी अर्चानादि क्रिया के योग्य किङ्करभाव भी प्राप्त करने के योग्य नहीं है॥३७॥ धारयेन्नान्यचिह्नानि विशेषेणाङ्कनं क्वचित् । धारणादन्यचिह्नानां महदाप्नोति किल्विषम् ॥३८॥ अन्य देवगण के चिन्हों का तथा विशेषकर शरीर पर तप्त मुद्रा के दाह चिन्हों को धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इन अन्य देवताओं के चिन्हों को धारण करने (या श्रीविष्णु के ही इन चिन्हों से भिन्न किसी लक्ष्मकी धारण करने) पर अतिशय किल्विष (ऐकान्त्यभंगरुपदोष या उसके कारण आपराधिकता) को प्राप्त करता है॥३८॥

७६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अन्यचिह्नाङ्कितान् मर्त्यान् दूरतः परिवर्जयेत् । पयोऽस्थिचर्ममांसादि पशूनाञ्चातिगर्हितम् ॥३९॥ जो मनुष्य या प्राणी श्रीनारायण के शंखचक्रादि चिह्नों से अंकित नहीं हो तो उसका परित्याग करना चाहिए तथा ऐसे पशुओं का दूध अस्थि, चर्म तथा मांसादि की भी (जो अतिशय अपवित्र हैं उन्हें भी) दूर से ही परित्याग करे॥३९॥ वृक्षादीनाञ्च सर्वेषामकर्मण्यं फलादिकम् । अन्यचिह्नाङ्कितञ्चैव गृहक्षेत्रादिकं त्यजेत् ॥४०॥ ऐसे वृक्षादि जो अन्य चिह्नों से अंकित वृक्ष तथा लता आदि हों तो उनके फल तथा पत्रादि को भी ग्रहण नहीं करना चाहिए तथा इसी प्रकार अन्य चिह्नांकित गृह तथा क्षेत्रादि के रहने पर उनका भी परित्याग करना योग्य है॥४०॥ वर्तुलं तिर्यगच्छिद्रं ह्रस्वं दीर्घन्ततं तनुम् । वक्रं स्वरूपं बद्धाग्रं छिन्नमूलं पदच्युतम् ॥४१॥ अशुभं रूक्षमासक्तं तथानङ्गुलिकल्पितम् । विगन्धमपसंख्यञ्च पुण्ड्रमाहुरनर्थकम् ॥४२॥ त्रिपुण्ड्र- स्वरूपादि विचार- इसी प्रकार जो पुण्ड्र (तिलक) केवल मालाकार हो, तिरछे आकार में हो, छिद्र हीन हो, छोटे आकार का हो या बहुत बड़े आकार का हो, अपने विस्तार से न्यून या अधिक परिमाण वाला हो, अपने टेढ़े आकार में हो, असुन्दर या सीधे आकार में न हो, दोनों भौहों के मूलभाग में न मिलता हो, अपने निर्धारित स्थान से हट गया हो, जो श्वेतवर्ण के हल्केपन से युक्त होकर शुभकारी न हो, जिसके हृदय स्थान से हट गया हो, जो श्वेतवर्ण के हल्केपन से युक्त होकर शुभकारी न हो, जिसके हृदय स्थान पर धारण करने का स्थान फोड़े आदि के कारण सूखा सा रहता हो, अन्य पुण्ड्र से लगा हुआ हो, जो स्वयं की (हस्त की) अंगुलियों के द्वारा किया हुआ न हो, जो किसी गन्ध से रहित हो, निर्धारित संख्या के अनुरूप धारण किया हुआ न हो तो ऐसा 'पण्ड्र' धारण करने पर भी अनर्थकारी या व्यर्थ समझना चाहिए॥४१-४२॥ न चन्दनादिभिर्गन्धैः कर्तव्यं न च भस्मना । न मृद्भिश्वाप्रशस्ताभिरूर्ध्वपुण्ड्रं कदाचन ॥४३॥ इसे चन्दन अगर आदि गन्धों से युक्त वस्तुओं से तथा भस्म आदि के द्वारा नहीं किया जाता है तथा इसी प्रकार साधारण मिट्टी जो कि प्रशस्त न हो तो उससे भी ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण न करने (क्षेत्र या पर्वतादि की प्रशस्त मृत्तिका से ही ऊर्ध्वपुण्ड्र

हिन्दीटीकासहित ७७ किया जावे।)॥४३॥ तमसो भस्म रजसो गन्धः सत्वस्य मृत्तिका । तस्माद् भस्मादिभिर्नेच्छेदेकान्ती शुद्धिमात्मनः ॥४४॥ भस्म आदि पदार्थ तामसिक, गन्धयुक्त पदार्थ राजस तथा मृत्तिका सात्विक कारण वाली होती है, अतः नैष्ठिक वैष्णव (एकान्ती) आत्मशुद्धि के कारणभूत तिलक को स्वयं करने में भस्मादि पदार्थों की इच्छा न करे या उनका उपयोग न करे (किन्तु सात्विक मृत्तिका से ही ऊर्ध्वपुण्ड्र स्वयं सम्पादित करे)॥४४॥ रौद्रव्रतादिनियतैस्तथा मोहनतान्त्रिकैः । शवेन्धनकरीषादिभस्मभिः कर्म साध्यते ॥४५॥ क्योंकि रुद्रादि के उपासनादि व्रतों में उपयोग की जाने वाली तथा मोहनादि कर्मों में तान्त्रिकादिजन के उपयोग में रहनेवाली भस्म जो कि शव, ईन्धन तथा करीषादि (सूखे गोवरों) से प्राप्त होती है तथा जिससे तन्त्रादि कर्मों की साधना की जाती है। अतः ऐसी निषिद्ध भस्म से कभी ऊर्ध्वपुण्ड्र नहीं किया जावे॥४५॥ मूलजं गन्धसारादि मृगनाभ्यादि जीवजम् । मनःशिलादि धातूत्थं त्रयं पुण्ड्रेषु कामिनाम् ॥४६॥ किसी वृक्ष की जड़ से प्राप्त सुगन्धित द्रव्य, किसी प्राणी के शरीर से प्राप्त होने वाले कस्तूरी आदि द्रव्य तथा धातु या पत्थर से निकलने वाले मनःशिला (मैनसिल) जैसे सुगन्धित द्रव्य इन तीनों से पुण्ड्र किसी पदार्थादि के कामीजन तिलकरूप में लगाते हैं। (अतः इनसे भी ऊर्ध्वपुण्ड्र नहीं करना चाहिए)॥४६॥ कुर्याद् रक्षाविधानञ्च नान्यैः पञ्च विना मृदः । गोरजो गोकरीषञ्च चूर्णं हारिद्रमेव च ॥४७॥ विहित तथा ग्राह्य पांच मृदा (मिट्टियों) को छोड़कर तथा गोरज, गोबर की राख, हरिद्रा के चूर्ण तथा पांच प्रकार की मृत्तिका को छोड़कर अन्य भस्मादि से रक्षाविधान कर्म नहीं करना चाहिए॥४७॥ न च भागवतः कुर्यादूर्ध्वपुण्ड्रममृत्तिकम् । धारणादेव मृत्स्नायाः प्रीयते धरणीधरः ॥४८॥ बिना विहित सात्विक मृत्तिका के अन्य किसी वस्तु से भागवत वैष्णव ऊर्ध्वपुण्ड्र न करे क्योंकि मृत्तिका के तिलक मात्र के धारण से धरणीधर श्रीविष्णु तुष्ट हो जाते हैं॥४८॥ यः प्रपन्नोऽपि लक्ष्मीशं न चक्रादिभिरङ्कितः । न वहत्यूर्ध्वपुण्ड्रं वा नैकान्त्यन्तस्य विद्यते ॥४९॥ ४

७८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता जो वैष्णव श्रीविष्णु के प्रति प्रपत्ति अर्पित करने के पश्चात् चक्रादि से अंकित न तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण न करता हो तो उसकी श्रीहरि के प्रति एकान्तिक निष्ठा रहेगी (अतः उसे ऊर्ध्वपुण्ड्रादि अवश्य धारण करना चाहिए) ॥४९॥ राजसाँस्तामसाँश्चैव व्यपदेशान् विवर्जयेत् । ध्रुवं व्यपेति भक्तोऽपि व्यपदेशैरसात्विकैः ॥५०॥ अतएव प्रपन्न वैष्णवों को राजस तथा तामस पदार्थों से तिलकादि के धारण कार्यों को नहीं करना चाहिए क्योंकि भक्त होने पर भी सात्विक पदार्थों से र होनेवाला वैष्णव विशेषरूप में पतित हो जाता है॥५०॥ सात्त्विकं नाम शुद्धानामशुद्धानान्तु राजसम् । बाह्यादितन्त्रसिद्धानां देवादीनान्तु तामसम् ॥५१॥ जो अनन्यभाव से इष्ट की अर्चना करते हो, ऐसे शुद्धजन का सात्विक अशुद्ध अन्यभावादि से इष्ट की अर्चनादि करनेवाले राजस तथा अवैदिक विधियों तान्त्रिक तथा उनके द्वारा इष्ट की अर्चना करनेवालों का 'तामस' नाम कहा है॥५१॥ दास्यं हि नामकरणमपि तद्वाचकैर्विना । गुणकर्मादिभिः स्वैश्च रूढं श्लाघ्यैः सनातनम् ॥५२॥ इसी प्रकार श्रीभगवद्दास के बोधक शब्दों के बिना अशुद्धार्थ बोधक तथा अवै नाम भी न रखें जावें। यहां शुद्ध तथा वैदिक नाम के अतिरिक्त भी अपने शू दास्य कर्म जो गुण तथा कर्मों के बोधक हों तो ऐसे रूढ़ तथा संकेतितार्थ वाले रखे जाने उचित हैं॥५२॥ युग्मैर्विवर्त्तितं रौद्रमयुग्मैर्ब्राह्ममुच्यते । उभयैस्तैर्व्यतिस्यूतमयुग्मैर्वैष्णवं गुणैः ॥५३॥ उपवीतं सदा ब्राह्मं वैष्णवं कटिबन्धनम् । उभयं धारयेद् रौद्रं साधयन् कर्म तामसम् ॥५४॥ जो युग्म भाव (दो तन्तुओं) से पूर्ण हो उसे 'रौद्र' तथा अयुग्म या तीन से पूर्ण तथा इन दोनों को मिलाकर गुणोंसे बँटा हुआ हो वह वैष्णव 'उपवीतक' कहलात इनमें सदा ब्राह्म तथा वैष्णव उपवीत को कटिबन्ध प्रदेश तक धारण करे इन उपवीतों को धारण करना चाहिए तथा तामस कर्मों की साधना करते समय उपवीत धारण करना चाहिए॥५३-५४॥ तामसं नग्नमेकन्तु राजसं वसनद्वयम् । कौपीनसहितं तत्तु सात्विकं मुनिभिः स्मृतम् ॥५५॥

हिन्दीटीकासहित ७९ शरीर पर एक वस्त्र का धारण करना 'तामस' दो वस्त्रों का धारण करना 'राजस' तथा कौपीन सहित दो वस्त्रों का धारण करना 'सात्विक' होने से सात्विक विधान से वस्त्रधारण करना अधिक उचित है॥५५॥ दर्भाक्षसूत्रवस्त्राङ्कनामपुण्ड्रविभूषणम् । अन्यत्तु तामसं सर्वं विशेषेण विवर्जयेत् ॥५६॥ इसी तरह जो तामस क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले दर्भ, रुद्राक्ष, अन्य चिन्हादि से अंकित वस्त्रादि अथवा सूत्रादि या अयुग्म गुण (सूत्रों) से निर्मित कटिबन्धादि तथा त्रिशूलादि से या देवनामादि से अङ्कित अशुद्ध पुण्ड्रादि भूषण या त्रिशूलादि आकार के भूषण तथा इनके अतिरिक्त भी ऐसे तामस उपकरणों को ध्यान देते हुए छोड़ना उचित है॥५६॥ अन्यतन्त्रैकसिद्धानि काम्यानि विविधानि च । द्रव्यनामादिरूपाणि लक्षणानि विवर्जयेत् ॥५७॥ अन्य आगमों के द्वारा विहित काम्य विविध कर्मों को एवं तन्त्रमात्र में व्यवहृत पारिभाषिक द्रव्यादि तन्त्रसिद्धरूप वाले द्रव्य तथा उनके विशेष आकारों (के बोधक चिन्हादि ) का भी व्यवहार न करे॥५७॥ इति लक्ष्म विरुद्धाधिकारः गुरोरपह्नवात् त्यागात् साम्याद्विस्मरणादपि । लोभमोहादिभिश्चान्यैरपचारैर्विनश्यति ॥५८॥ सत्सेवाविरुद्ध अपने गुरु के नामादि को न बतलाते हुए, उनका परित्याग करने उनकी बराबरी या तुलना करने या उन्हें विस्मृत कर देने के कारण लोभ, मोह आदि गुरु के वैभव का ज्ञान न रखकर उनके प्रति उपचार या उपेक्षाभूत तिरस्कार के भाव रखने पर शिष्य का पतन होता है॥५८॥ विशेषाद् विष्णुभक्तेषु दम्भं लोभं नृशंसताम् । क्रोधमीर्ष्यां मदं मानं साम्यञ्च परिवर्जयेत् ॥५९॥ विशेषरूप में जो विष्णुभक्त हैं उन्हें ही बिना धर्म का आचरण किये हुए उनको बतलानेकी मिथ्या घोषणा के दम्भों, लोभ करना, किसी दीन के प्रति करुणा न रखना, क्रोध करना तथा दूसरों से समानता को देखने का भाव भी नहीं रखना चाहिए॥५९॥

८० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता वैष्णव के दो प्रभेद— स एकान्त्यन्यविमुखो हरिं सर्वेश्वरं प्रभुम् । यः समाश्रयते किञ्चित्फलमभ्यर्थयन्नरः ॥६०॥ जो भक्त मनुष्य दूसरे देवताओं से हटकर श्रीविष्णु के पाद सेवन भक्ति या उन ज्ञान के प्राप्त करने की अभिलाषा रखते हुए सर्व जगत के अधिपति श्रीहरि प्रपत्ति या आश्रय को ग्रहण करता हो तो वह 'एकान्ती' वैष्णव कहला है॥६०॥ न्यस्ताशेषभरः श्रीशे यस्तु दास्यैकजीवितः । स एष परमैकान्ती द्वावेतौ वैष्णवौ स्मृतौ ॥६१॥ तथा जो भक्त नर अपने आत्मा के समस्त भर को श्रीहरि के प्रति अर्पित कर न्यस्त करता हो और उनके दासभाव के अतिरिक्त अन्य सत्तामय स्थिति की काम नहीं रखता हो तो ऐसा पुरुष 'परमैकान्ती' वैष्णव कहलाता है॥६१॥ अन्ये त्ववैष्णवाः सर्वे मनुष्या जिह्मदृष्टयः । असतस्तन् विदुर्दैवास्तैः सतां नास्ति सङ्गमः ॥६२॥ इन दो प्रकार के वैष्णवो को छोड़कर शेष सभी कुटिल बुद्धि के कारण अवैष्णव म गये हैं, जिन्हें देवगण असन्त भूत मानकर उनके साथ सन्तों के समागम को स्वीक नहीं करते हैं॥६२॥ अवैष्णवात् स्वधर्मस्थाद् वैष्णवः स्खलितोऽपि सन् । श्रेयानेव हि मन्तव्यो मूलात् स न परिच्युतः ॥६३॥ जो अपने वर्ण तथा आश्रम धर्मों मे अवस्थित होने वाले किन्तु अवैष्णव हों उन अपेक्षा अपने धर्म तथा कर्त्तव्यों से किञ्चित् स्खलित हो जानेवाला भी यदि वैष्णव तो भी वह श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि वह अपनी मूलस्थिति से पतित न है॥६३॥ स्वेशसम्बन्धविज्ञानं मूलमन्याः क्रियाः पुनः । तस्य शाखाः प्रशाखाश्च काश्च ता मूलवर्जिताः ॥६४॥ इसका कारण अपने इष्ट देव आराध्य श्रीविष्णु तथा उनके साथ अपने दास्यभ का उसे ज्ञान है जो मूल माना जाता है तथा अन्य कार्य इसी मूल की शाखा, प्रशा तथा उपशाखाएं होती हैं ये अपने मूल से रहित होने से अर्थ नहीं (होत रखती है॥६४॥ बाह्यानां जिह्मदृष्टीनामज्ञानां संशयात्मनाम् । नालोकमपि कुर्वीत न च तैः किञ्चिदाचरेत् ॥६५॥

हिन्दीटीकासहित ८१ जो अपनी विरुद्ध बुद्धि तथा दृष्टि रखने के कारण बाह्य हैं तथा जिनकी अन्यथा दृष्टि हों ऐसे अज्ञानयुक्त संशयात्मा पुरुषों को अपने वैष्णवशास्त्र का दर्शन भी बतलाना इष्ट नहीं। अतः ऐसे पुरुषों के साथ लोक व्यवहार का आदान प्रदान न रखा जावे तथा शास्त्रीय यज्ञ दानादि का व्यवहार तो बिल्कुल ही नहीं रखना चाहिए॥६५॥ प्रपन्नैश्चान्यभजनाद् युक्तापायसमन्वितैः । वैष्णवो वर्जयेत् सङ्गं प्रच्युतास्ते ह्यवैष्णवाः ॥६६॥ और जो शास्त्रोक्त भजनादि उपाय के साथ दूसरे इष्टदेव की प्रपत्ति में स्थित हों तो ऐसे अवैष्णव पुरुषों के साथ भी वैष्णव सङ्गति न रखे। क्योंकि जो अवैष्णव हैं वे सभी दूसरे देवगणों के भजनादि प्रपत्ति कार्यों के करने से स्खलिताचारवाले हो गये हैं॥६६॥ दैवेषु पित्र्येषु तथा धर्मार्थेष्वितरेषु च । अवैष्णवं न गृह्णीयात् पात्रं दानेषु कर्हिचित् ॥६७॥ देवता के उद्देश्य से तथा पितरों के श्राद्धादि प्रयोजन से एवं धर्मादि के अन्य किसी कार्यवश या लौकिक कार्यवश भी अनैकान्ती अवैष्णवजन को दानादि के पात्ररूप में न तो आमन्त्रित करे और न ही देवादि कार्यों में उन्हें सम्मिलित करे॥६७॥ न कञ्चित् प्रतिगृह्णीयाद् विष्णुभक्तिविवर्जितात् । पानीयं पक्वमन्नञ्च विशेषेण विवर्जयेत् ॥६८॥ इसी प्रकार किसी विष्णुभक्ति से रहित पुरुष के द्वारा अर्पित जल, पक्वान्न तथा फलादि को विशेषरूप से ग्रहण नहीं करना चाहिए॥६८॥ विद्यार्थसम्प्रयोगोऽपि प्राकृतैर्न कथञ्चन । विवादोऽपि न कर्तव्यः क्रीडासङ्कथनानि च ॥६९॥ इसी प्रकार ऐसे अवैष्णवजनों के साथ विद्या के आदान-प्रदान या अध्ययनादि या अध्यापनादि का कार्य भी नहीं रखे, क्योंकि ये प्राकृतजन या अलग माने जाने वाले पुरुष होते हैं अतः इनके साथ शास्त्रादि विवाद तथा इष्टआलाप भी न रखा जावे॥६९॥ न चैकस्मिन् भजेत् साम्यं कर्मण्येकान्तवर्जितैः । न चैषां कर्म कुर्वीत न स्वकर्म च कारयेत् ॥७०॥ किसी एक लौकिक अथवा वैदिक-कर्म में इन प्राकृत तथा एकान्त वर्जित जन की समानता नहीं हो सकती है। अतएव इन अवैष्णवजन से अपने लौकिक अथवा वैदिक

८२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता कर्मों को सम्पादन नहीं करवाना चाहिए तथा न ही स्वयं इनके लौकिक अर्थ वैदिक कर्मों का सम्पादन ही करना चाहिए॥७०॥ पङ्क्तौ समाजे ग्रामादौ न त्वभागवतोत्तरे । वसेदेकत्र भवने नैकेनाप्यसता सह ॥७१॥ अवैष्णवजन की अधिक संख्या में स्थिति वाले ग्रामों में, भोजनादि पंक्ति में, समा (समूह) में तथा ऐसे भवनों में जहाँ ऐसे एक अवैष्णव व्यक्ति की भी स्थिति रह पर वहां इनके साथ निवास न करे॥७१॥ प्रीत्यप्रीतिसमायोगं स्पर्शं भुक्तिं सहोषिताम् । स्वैरप्येकान्त्यविमुखैरघवजं विवर्जयेत् ॥७२॥ अपने आत्मीय या पारिवारिक जन के साथ प्रीति या हर्ष के कल्याणादि अवसरों प तथा अप्रीति के शोकादि अवसरों के व्यवहारार्थ उन सभी के साथ मिलने, सा भोजन करने, एक आसन पर एक साथ बैठने आदि समागम के अवसर पर एकान्त्यभाव से रहित अपने जन के होने पर अघ या आशौचादि की स्थिति क छोड़कर उनके साथ अपना व्यवहारादि सम्बन्ध न रखे॥७२॥ अवैष्णवं न वन्देत नार्चयेद् विधिपूर्वकम् । सम्प्रश्नासनदानादि कुर्याद् वाप्यानृशंसतः ॥७३॥ अवैष्णवजन को न तो नमस्कार करे और न ही गुणशाली होने पर भी उनक विधिपूर्वक अर्चना ही करे। उनसे कुशल मंगल के प्रश्न उन्हें आसनादि का दे आदि भी निस्संकोच भाव से न करे॥७३॥ अभक्तमच्युतस्यापि नावमन्येत कञ्चन । हितं वा बोधयेत् साधोर्दद्याद्वा किञ्चिदीप्सितम् ॥७४॥ परन्तु अच्युतविषयक भक्ति से रहित भी किसी भक्त की कभी भी अवहेलना तिरस्कार नहीं करना चाहिए। यदि ऐसे साधु अवैष्णवजन सामने मिल जावें उनसे कुशल मंगलादि हित-संभाषण अवश्य करना चाहिए तथा उन्हें शक्ति अनुसार इष्ट वस्तु को भी देना चाहिए॥७४॥ न च मैत्रीं प्रकुर्वीत वैष्णवः प्राकृतैः सह । क्वायमच्युतसत्तात्मा क्व ते विषयचञ्चलाः ॥७५॥ वैष्णव भक्त अवैष्णव प्राकृतजन के साथ मैत्री न रखे क्योंकि कहाँ तो अच्युत भक्ति में आत्मन्यास करनेवाला वैष्णव तथा कहां वे विषय से भिन्न प्रकृति अस्थिर भाव वाले अवैष्णव जन। (इन दोनों की समानता शक्य ही नहीं है) अ मैत्री कैसे हो सकेगी॥७५॥

हिन्दीटीकासहित ८३ असतां गुणकर्माणि नानुमोदेत किञ्चन । स्मरणादपि यत्तेषां महदाप्नोति किल्बिषम् ॥७६॥ अतएव ऐसे अवैष्णवजन के औदार्यादि गुणों तथा अरि-निरसनादि कर्मों की अशास्त्रविहित स्थिति का अनुमोदन नहीं करना चाहिए, क्योंकि उन उन अशास्त्रीय गुण कर्मों के स्मरणमात्र से महान् किल्विष उत्पन्न होता है। (अतः उनके स्मरणादि तथा अनुमोदन करने की उपेक्षा नहीं रखे।।७६।। विशिष्टः परमैकान्ती ज्ञानवैराग्यभक्तिभिः । तादृशैरेव कुर्वीत सह सङ्कथनादिकम् ॥७७॥ उक्तान्येतानि सर्वाणि योऽवमन्येत मूढधीः ॥ स एष तमसोऽभ्येति पारमैकान्त्यवर्जितः ॥७८॥ अपने ज्ञान, वैराग्य तथा भक्तिभाव के कारण एकान्ती वैष्णव अन्य सभी दूसरों की अपेक्षा विशिष्ट है, अतः ऐसे विशिष्टजन के साथ ही संकथन कुशल प्रश्नादि कार्य रखना चाहिए और जो बुद्धिहीन पुरुष इन कहे गये सभी उपदेशों की अवहेलेना करता है वहीं एकान्तवर्जित होकर तमस् के पार (अतिशय तमस् के घने समुद्र में) चला जाता है।।७७-७८।। अथ वृत्तिमिमां सम्यक् कुर्वाणो विगतव्यथः । विसृज्य देहं प्राप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥७९॥ तथा पूर्व में कथित विहिताचारकी वृत्ति में स्थित रहने वाला एकान्ती अपनी समस्त व्यथाओं से मुक्त होकर तथा अपने देह के छूटने पर श्रीहरि के परमपद की प्राप्ति कर लेता है।।७९।। इति सत्सेवाविरुद्धाधिकार अशक्तमपि च स्मर्तुमन्ते पूर्वकृतं स्मरन् । स्वयमेव परं धाम स्वयं नयति माधवः ॥८०॥ जब शरीर की अवसन्न दशा में परमेश्वर के स्मरण की शक्ति नहीं रहने से (अन्त समय में) ईशस्मरण न होने के कारण वैष्णवजन के भी ईश स्मरण करने में अशक्त हो जाने पर भी श्रीनारायण स्वयं ही आकर उसे अपने वैकुण्ठधाम में ले आते हैं॥८०॥ १ यहाँ इस कथन के समर्थन में निम्नलिखित दो पद्य दिये जा रहे हैं-'ततस्तु म्रियमाणं तं काष्ठपाषाणसन्निभम् । अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम् ।।' तथा 'यदि वातादिदोषेण मद्भक्तो माञ्च विस्मरेत् । तर्हि स्मराम्यहं भक्तं नयामि परमां गतिम् ।" इति ।

८४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता न खल्वपि दशादेशकालहेतुविपर्ययैः । प्रपत्तस्त्यक्तदेहस्य परा यात्रा विहन्यते ॥८१॥ प्रपत्ति को लेने वाले वैष्णव भक्त की दशा, पुण्य-क्षेत्रादि देश, उत्तरायण आदि काल तथा इनके कारण के विपरीत रहने पर भी उसकी जब देह छूट जाए तो भी उसकी परमयात्रा में अर्चिरादिमार्ग में जाने में कोई विघ्न नहीं आता तथा वह मुक्ति को प्राप्त करता ही है॥८१॥ अर्चिरादिकया गत्या तत्र तत्रार्चितः सुरैः । अतीत्य लोकानभ्येति वैकुण्ठं वीतकल्मषः ॥८२॥ और वह उस अर्चिरादि मार्ग में गतिशील रहकर बीच में आनेवाले प्रत्येक विश्राम- स्थल पर देवगण से पूजित अभिनन्दित होता हुआ मध्यवर्ती लोकों को पार कर निष्पापभाव से विशुद्धरूप में वैकुण्ठ पहुँच जाता है॥८२॥ अथैनममरास्तत्र सह दिव्याप्सरोगणैः । सोपहाराः प्रहर्षेण प्रत्युद्गच्छन्त्युपायताम् ॥८३॥ वहाँ पहुँचने पर देवगण दिव्य अप्सराओं के समुदाय के साथ प्रसन्न होकर उसे अपने हाथ में लिये हुए उपहारों को समर्पित कर उसकी अगवानी करते हैं॥८३॥ ततः प्राप्य जगन्नाथं प्रणिपत्य श्रियं पतिम् । आसीनमासने दिव्ये भक्तैर्भागवतैर्वृतम् ॥८४॥ आप्लुतः सस्मितालापमधुरालोकनामृतैः । पादमूलं भजत्यस्य दास्यैकानन्दनिर्भरः ॥८५॥ तब फिर वह जगदीश श्रीपति नारायण को प्राप्त करता है जो कि दिव्य देवगण तथा भागवतों से युक्त सिंहासन पर आसीन है। तब स्मित पूर्वक भाषण करते हुए तथा अपने मधुर विलोकनरूपी अमृत दृष्टियों से भर कर इष्ट के दास्यभाव के आनन्द में भरते हुए वह श्रीपति नारायण के दोनों चरणों के मूल का स्वयं सेवन करता है। (अपना मस्तक उनके चरणों पर टिका देता है)॥८४-८५॥ स च सर्वेषु लोकेषु तमेवाभ्यनुसञ्चरन् । सम्मोदते समगुणः कामान्नी कामरूपधृक् ॥८६॥ वह मुक्त वैष्णव भक्त आगे उन्हीं इष्टदेव के अभिमुखी भाव में रहकर वहां संचार करते हुए भगवद्गुण के समान होकर कामरूप धारी भोगवाला तथा इच्छानुकूल शरीरादि स्वरूपधारी होकर प्रसन्नता पूर्वक स्थित होता है। (उनके साथ समानरूप से भोगादि का अनुभव कर प्रसन्न होता रहता है)॥८६॥

हिन्दीटीकासहित ८५ अथेह बान्धवास्तस्य गतस्य परमां गतिम् । वैष्णवास्त्वभिनन्देयुः पुण्यामवभृथक्रियाम् ॥८७॥ इधर यहां भूलोक में उस प्रपन्नभक्त के बन्धुबांधव जन परमगति प्राप्त करने वाले उस वैष्णव का अभिनन्दन कर पुण्यभूत संस्कारान्त में होने वाले अवभूत स्नान को सम्पन्न करते हैं॥८७॥ क्रियते चास्य पुत्राद्यैर्यत् किमप्यौर्ध्वदैहिकम् । तत् सर्वं प्रियभक्तस्य विष्णोः प्रीतिकरं परम् ॥८८॥ और तब इसके पुत्रादि के द्वारा संस्काररूप में किये गये और्ध्वदेहिक विधान आदि क्रियाएँ भी भक्तिप्रिय श्रीविष्णु की परमप्रीति करनेवाली हो जाती हैं॥८८॥ गुरूणामन्तिमतिथौ जन्मर्क्षे श्रवणेऽपि वा । हरिमभ्यर्चयेद् भक्त्या तद्भक्तांश्च विशेषतः ॥८९॥ ऐसे परम वैष्णव गुरु की अन्तिम या पुण्यतिथि के अवसर पर जन्म नक्षत्र के या सुनी गयी उनकी तिथि के दिन भक्तिपूर्वक श्रीहरि की अर्चना करे तथा उनके शिष्य और भक्तजन इस कार्य पर ध्यान विशेषरूप से रखे॥८९॥ ज्ञानकर्मक्रियामन्त्रध्यानयोगगतिक्रमाः । विस्तरेण मया पूर्वमुक्तास्तत्रापि ते समाः ॥९०॥ श्रीहरि के प्रति प्रपत्तिभाव रखने के बाद जिन कार्यों को मैंने यहां पूर्वमें विस्तारसे कहा था उन सभी ज्ञान, कर्म, क्रिया, मन्त्र, ध्यानयोग, गति तथा क्रमों का अनुसरण करना चाहिए। यहां भी इसी प्रकार इनका अनुगमन समान भाव से किया जाए॥९०॥ उपासनाविधौ धर्मा ये चान्यैः परिकीर्तिताः । न्यस्तात्मानस्तु तान् सर्वान् फलान्येव निबोधत ॥९१॥ और न्यस्त या प्रपत्तिभाव करनेवालों के विषय में अन्य पूज्य मुनिजन के द्वारा उपासना के विधानों में जिन उपायादि का कथन किया गया है उन सभी उपायों को भी जानना उचित है॥९१॥ अभ्यर्थितो जगद्धात्र्या श्रिया नारायणः स्वयम् । उपादिशदिमं योगमिति मे नारदाच्छ्रुतम् ॥९२॥ इस योग का साम्प्रदायिक क्रम पूर्व में स्वयं संसार की विधात्री श्री लक्ष्मी के श्रीमहाविष्णु से प्रार्थना करने पर इस न्यासयोग का उपदेश दिया था जिसे मैंने श्री नारद ऋषि से सुनकर ग्रहण किया है॥९२॥

८६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता इति हस्तपदे साङ्ख्यं शास्त्रं गुह्यतमं परम् । शिरश्चैतन्मयोक्तायाः संहिताया भविष्यति ॥९३॥ इस प्रकार इस देवगण से भी अज्ञात गुह्यतम सांख्य शास्त्र का मैंने शीर्षभूत सिद्धान्त यह न्यासयोग बतलाया जो मेरे द्वारा कही गयी संहिता का रूप लेकर भविष्य में प्रवृत्त होगा॥९३॥ संहितोपनिषदस्मिञ्च्छास्त्रे ज्ञेयान्यनुक्रमात् । आदौ न्यासः फलञ्चास्य तदुपायश्च सङ्ग्रहः ॥९४॥ इस प्रकार इस भारद्वाज संहिता के रूपवाले गुह्यतम उपनिषद्भूत इस शास्त्र में क्रमशः मैंने न्यासयोग, न्यास का फल तथा उसके उपायों को संग्रह कर चार अध्यायों में प्रतिपादित शास्त्र में बतलाया है॥९४॥ ततो न्यासस्य चाङ्गानां निर्णयः सविरोधिनाम् । ततश्च फलरूपाया वृत्तेरङ्गानि विस्तरात् ॥९५॥ और इसमें न्यास तथा उसके अंगों का उनके विपरीत भावों के साथ निर्णय दिखलाया है तथा फलभूत वृत्तियों तथा उनके अंगों का भी विस्तार से निरूपण किया गया है॥९५॥ वृत्त्यङ्गसेवञ्च ततो निन्यहानं गतिस्तथा । एवं चतुर्भिरध्यायैः कथितानि विशेषतः ॥९६॥ इसी क्रम में वृत्ति तथा उसके अंगों का विचार, इसके बाद प्रतिषिद्ध विवर्जन का विवेचन किया गया। इन सभी को विशेषरूप से चार अध्यायों के द्वारा बतलाया गया॥९६॥ इत्थं प्रसादाद् देवर्षेर्नारदस्यामितौजसः । कृतोऽत्र वेद-वेदान्त-पञ्चरात्रार्थनिर्णयः ॥९७॥ इस प्रकार यहां अमितौजाः महर्षि नारद मुनि के प्रसाद से मैंने वेद तथा वेदान्त के अनुगत पञ्चरात्रआगम के अर्थों का (तात्पर्यों का) शास्त्रीय निश्चय दिखलाया है॥९७॥ इत्येतत् परमं गुह्यं श्रुत्वा भागवतोत्तमाः । मुनयः पूजयाञ्चक्रुर्भारद्वाजं तपोनिधिम् ॥९८॥ इस प्रकार वेद ग्रहण के तुल्य परम रहस्यों से पूर्ण पञ्चरात्र के अर्थों को सुनकर परमभागवत मुनिगण ने तपोनिधि भारद्वाज की प्रसन्नता से अर्चना की॥९८॥

हिन्दीटीकासहित ८७ श्रुत्वादौ नारदात् सम्यग्भारद्वाजोऽर्थसङ्ग्रहम् । महतीं संहितामेता चकार मुनिचोदितः ॥९९॥ प्रथम वार श्री देवर्षि नारद से पञ्चरात्र आगम के अर्थों का श्रवण कर बाद में नारदमुनि की (ही) प्रेरणा से इस विस्तीर्ण संहिता की मैंने रचना की॥९९॥ यश्चेमां संहितां पुण्यां शृणुयाच्छ्रावयेत वा । स मुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वकामान् समश्नुते ॥१००॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां न्यासोपदेशो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ अतएव जो इस पुण्यदात्री तथा सभी पातकों को दूर करनेवाली भारद्वाज प्रोक्त संहिता का नियतमन से वह श्रवण करता है, वह सद्यः सभी पातकों से मुक्त होकर सभी इच्छाओं (कामनाओं) की प्राप्ति करेगा॥१००॥ नारदपञ्चरात्र की भारद्वाजसंहिता में न्यासोपदेश नामक चतुर्थाध्याय की तत्वप्रकाशिका नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त

८८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अथ भारद्वाजसंहितायाः परिशिष्टे अथ प्रथमोऽध्यायः भूय एवर्षिभिः पृष्टो भारद्वाजस्तपोनिधिः । अनुक्तानब्रवीद्धर्मान् उक्तांश्चैव प्रसादयन् ॥१॥ न्यासोपदेश को सुनकर ऋषिगणों के द्वारा भरद्वाजमुनि से इन्हीं विषयों पर पूछे गये प्रश्नों को सुनकर पूर्व में कथित न्यासोपदेश को और अधिक स्पष्ट करने के साथ इसी क्रम में अनुक्त तत्वों को भी दिखलाते हुए भरद्वाज मुनि पुनः उनसे कहने लगे।।१।। धर्मो वर्णाश्रमादीनां कार्त्स्न्येन मुनिसत्तमाः । शिष्टो व्याससमासाभ्यामार्षे-र्दिव्यैस्तथागमैः ॥२॥ हे मुनिजन! वर्ण तथा आश्रम आदि के धर्मों को ऋषि प्रोक्त वेदादि, धर्मशास्त्र तथा दिव्यआगमों के द्वारा (पञ्चरात्र संहिता आदि से विस्तार तथा संक्षेप में दिखलाया या उपदिष्ट किया गया है) तथा कहीं विस्तार तथा संक्षेप को मिलाकर अनतिसंकोच तथा विस्तार से भी बतलाया है।।२।। अत्र केचित् परं तत्वं रजोमीलितदृष्टयः । अपश्यन्तोऽभिजानन्ति धर्मस्य न परां गतिम् ॥३॥ परन्तु कुछ रजोगुण से युक्त दृष्टि वाले बनकर आर्षदिव्यादि शास्त्रों को न देखते हुए धर्म की परमगति को नहीं समझ पाते हैं, अतएव वे उपयुक्त न्यायादि से परिशीलित फलभूत निर्णय से वंचित से हैं।।३।। केचित्तु सत्वसम्पन्नाः केशवेनावलोकिताः । सारासारविदः प्राज्ञाः परं धर्मं विजानते ॥४॥ और कुछ जो सत्व सम्पन्न हैं तथा इसी कारण श्रीविष्णु से जन्म के समय से ही सम्बद्ध हैं तथा उनके विलोकन के सौभाग्य से युक्त हो चुके हैं वे अपने सत्वगुण की सम्पत्तिगत विशेषता के कारण सारासार के अभिज्ञ होकर तीक्ष्णबुद्धि के द्वारा परमधर्म मोक्ष को जाननेवाले हो जाते हैं।।४।।

हिन्दीटीकासहित ८९ यदैकान्त्यङ्गता विष्णौ भगवत्यात्मभावने । तद्वैष्णवा भागवताः सन्त इत्यपि ते स्मृताः ॥५॥ जो आत्मभावन श्री भगवान् विष्णु के विषय में प्रपत्ति आदि से एकान्तभाव को प्राप्त कर चुके हैं वे वैष्णव तथा भागवत जन ही सन्त कहे जाते हैं॥५॥ नियोक्ता भगवान् विष्णुनियोगस्तस्य वै श्रुतिः । नियोज्याः सत्वसम्पन्ना मुख्या मोक्षार्थचिन्तकाः ॥६॥ ज्ञानादि षड्गुण सम्पन्न भगवान् श्रीविष्णु इस धर्म के नियोजक देव हैं तथा श्रुति (वेद) उस पुरुष का नियोग (आज्ञारूप) है। इस श्रुति प्रतिपादित धर्म में नियुक्ति के योग्य अधिकारी वे हैं जो सात्विकगुणों से सम्पन्न तथा मोक्षतत्व के विचारक हों, वे ही यहाँ मुख्य अधिकारी माने गये हैं॥६॥ अन्यथैवाभिमन्यन्ते सर्वमेतत् कुदृष्टयः । यतो दूरतरास्ते हि तथा भागवता अपि ॥७॥ परन्तु इस विषय में जिनकी दृष्टि स्पष्ट नहीं है ऐसे जन इस मोक्षादि तत्व को दूसरी ही पद्धति से लेकर समझने की बात करते हैं। क्योंकि वे सभी पदार्थादि से परे रहने वाले परमात्मा श्रीहरि से अपनी निष्ठा तथा आचरणों के कारण दूर बने हुए हैं॥७॥ यथा पृथग्विधा वर्णा यथा तत्रैव चाश्रमाः । विविक्तमत्तयस्तत्र तथा भागवता अपि ॥८॥ जैसे ब्राह्मणादि वर्ण परस्पर भिन्नरूपादि वाले हैं तथा इसी प्रकार जैसे ब्रह्मचर्यादि आश्रम भी परस्पर भिन्नरूपादि वाले हैं तथा विभिन्नबुद्धि सम्पन्न होते हैं। इसी प्रकार विविध मतों से युक्त बुद्धिवाले सत्वसम्पन्न अनन्यबुद्धि भागवत भी अनेक प्रकार के हैं जो वर्ण तथा आश्रमों में स्थित हैं। (ये भी भक्त, प्रपन्न तथा शुद्ध, मिश्र आदि भेदों के कारण अनेक भेदों से युक्त हैं)॥८॥ ईशभक्तिफलोपाया ईशैकफलसाधनाः । द्विधा ह्येकान्तिनस्ते च शुद्धा मिश्रा इति द्विधा ॥९॥ परमेश श्रीविष्णु, उनकी भक्ति को क्रमशः जो फल तथा उपायरूप में माननेवाले भक्ति के उपाय निष्ठ रहने वाले प्रथम प्रकार के तथा भगवान् श्रीविष्णु को परमेश मानकर उन्हें ही एकमात्र फल तथा उसकी प्राप्ति का साधन भी मानते हैं ये दूसरे प्रकार के हैं। ये दोनों ही एकान्ती हैं तथा इनके प्रत्येक के शुद्ध तथा मिश्ररूप में दो प्रकार होते हैं॥९॥

९० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विशुद्धज्ञानकर्माणः श्रौतदिव्यार्षवर्त्मभिः । भक्तिनिष्ठाः परं ब्रह्म नारायणमुपासते ॥१०॥ इनमें प्रथम “ईशभक्तिफलोपाय स्वरूप वाले (वैष्णव) फल की आकांक्षा या आग्रह से हीन, ज्ञान तथा कर्मयोग के प्रति निष्ठावान् होते हैं जो भक्ति को साधनरूप मान लेते हैं। ये भक्तिनिष्ठ होकर मोक्षोपाय में विहित श्रौत, दिव्य-आगम तथा आर्ष- धर्मशास्त्रादि के द्वारा कथित पद्धति में स्थित रहकर उनका अनुसरण करते हुए नारायणरूप परब्रह्म की उपासना करते हैं॥१०॥ नारायणैकशरणाः फलं नारायणः स्वयम् । तैस्तैः स्वादुत्तमैः कल्पैर्यजन्तोऽनुभवन्ति वै ॥११॥ ऐसे जन एकमात्र नारायण को ही एकनिष्ठ भाव से उपाय मानते हैं तथा स्वयं नारायण ही उनका फलभूत प्राप्तव्य होता है। वे श्रौत, दिव्य तथा आर्ष कल्पों में कथित उत्तम विधियों के द्वारा अपने इष्ट की आराधना कर उनका दर्शनादि अनुग्रह का अनुभव करते हैं॥११॥ ये तु वाकनिषन्निष्ठास्तत्तत्संस्कारसंस्कृताः । ते वै भागवताः शुद्धा वासुदेवैकयाजिनः ।१२॥ इसी प्रकार जो ईश्वरोक्त मूलवाणी वेद तथा उपनिषद् आदि परमविद्या के द्वारा विहित संस्कारों से संस्कृत होकर पवित्रभाव से वासुदेव मात्र की यज्ञादि से आराधना करनेवाले अनन्य (एकनिष्ट) भक्त हैं उन्हें शुद्ध तथा भागवत समझना चाहिए॥१२॥ त्रय्या विहितसंस्कारास्त्रय्यन्ते परिनिष्ठिताः । यजन्त्येकान्तिनो मिश्रा विष्णुं विश्वतनुं हरिम् ॥१३॥ जिनके संस्कार वेदत्रयी से सम्पन्न हैं तथा इसी त्रयी के अन्त या शीर्षभूत उपनिषद्रूप वेदान्त शास्त्र में जो परिनिष्ठित ज्ञानवाले हैं वे एकान्तभाव से विश्व के शरीररूप सर्वव्यापी अन्तर्यामी श्री नारायण की स्वविहित यज्ञादि में श्रोतादि विधानों से आराधना करते हैं। ये भागवत भक्त मिश्र कोटि के समझना चाहिए॥१३॥ श्रूयते यत्र यष्टव्या यादृशी या हि देवता । तादृशी सा भवेत्तत्र यजन्त्येकान्तिनो हरिम् ॥१४॥ तथा वेद श्रुति के द्वारा जिस कर्म में जिस देवता के गुण विग्रह आदि दिखलाकर उसका यजन उपदिष्ट हो तो ऐसी जो भी देवता कर्म में विहित है उसी (प्रकार की) देवता में अन्तर्यामी हरि स्थित हैं ऐसा मान कर एकान्तभाव से उपासना करते हैं (तो उसी में श्रीहरि स्थित होकर (सर्वान्तव्यापी होने के कारण) उसके कर्मों का

हिन्दीटीकासहित ९१ फल देकर उसकी सिद्धि प्रदान कर देते हैं॥१४॥ तथा हि वाक् शची दुर्गा धाता शक्रस्त्रियम्बकः । इति नानाभिधारूपो लक्ष्मीशः स्वयमिज्यते ॥१५॥ जैसे विविध धर्मादि अनुष्ठानों में वाणी (सरस्वती), इन्द्राणी, दुर्गा, ब्रह्मा, इन्द्र तथा रुद्र आदि के रूप में जहाँ उपासना की जाती है वहां भी अनन्य भाव से यही मानना चाहिए कि स्वयं लक्ष्मीश श्रीनारायण ही अपने इन विराट्रूपों में यहाँ यज्ञादि से उपासित (हो रहे) हैं।१॥१५॥ तथैवात्मपृथिव्याद्या यतो लक्ष्मीपतेर्वपुः । अतस्तैरौपनिषदैरिज्यतेऽखिलविग्रहः ॥१६॥ और जैसे श्रीहरि के सभी जीव तथा पृथ्‍वी आदि सभी अंश स्वरूप माने गये हैं । अतः उपनिषद् के विद्वानों (वेदान्तशास्त्रवेत्ताजन) के द्वारा ब्रह्म को सभी के उपादानभूत शरीर के रूप में माने जाने के कारण अन्तर्यामी तथा विराट्रूप में लक्ष्मीपति के शरीर का अर्चन किया जाता है। (इस प्रकार परमैकान्तिक रूप में श्रीहरि एकमात्र शरण्य तथा उपास्य बन जाने के कारण अन्तर्यामी रूप हैं, अतः एकनिष्ठता सुरक्षित रहती है)॥१६॥ ततः शुद्धं परं ब्रह्म विशुद्धपरिवारकम् । इज्यते विविधैर्भोगैर्नित्यञ्च प्रतिमादिषु ॥१७॥ इसलिए शुद्धरूप वाला परब्रह्म ही दिव्य विग्रह में स्थित तथा विशुद्ध देवीभूषण दिव्यायुधगण आदि परिवार से युक्त प्रतिमादि में विविध समर्पणीय भोगों से नित्य ही अर्चित होता है (जो मिश्र रूप में अन्तर्यामी तो है पर प्रतिमादि में नित्य एवं शुद्ध यजनीय भी है)॥१७॥ अशुद्धा ब्रह्मरुद्राद्या जीवा विष्णोर्विभूतयः । तान् वै कुदृष्टयः साम्यात् परत्वाद्वाप्युपासते ॥१८॥ जो ब्रह्मा तथा रुद्ररूप अशुद्ध कर्मभाव से रहने से जीवभूत होकर देवभाव से अर्चित भी हो तो भी वे श्रीविष्णु की विभूति के रूप में मान्य हैं। उनको समता का स्थान देकर या परमदेवता के रूप की भावना तथा बुद्धि से जो उपासना करते हैं वे १ आशय यही है कि अनेक नाम तथा रूप से विशिष्ट श्रीलक्ष्मीपति ही सर्वत्र उपासित हैं क्योंकि ये ही प्रत्येक देव में भी अन्तर्यामी रूप से अवस्थित हैं। यहाँ लक्ष्मीश पद सार्थक एवं साभिप्राय रूप से रखा गया है। कहा भी है कि- देवतिर्यङ्मनुष्येषु पुन्नामा भगवान् हरिः । स्त्रीनाम्नी लक्ष्मीर्मैत्रेय नानयोर्विद्यते परम्।।' अतएव देवीभूत शक्ति का आराधन श्रीलक्ष्मीजी का तथा ब्रह्मादि देवाराधन श्रीहरि का आराधन है।

९२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता तात्त्विकज्ञान से अनभिज्ञ हैं॥१८॥ अपरत्वेन चाप्येता ये यजन्ति हि देवताः । तेषां भवति नैकान्त्यमतो नैवाप्नुयुः परम् ॥१९॥ और जो दूसरे पक्ष के विद्वान् हैं तथा जो इन्हें अपररूप या स्थिति में अर्चित करते या उपास्य मानते हैं तथा देवतारूप में उनकी यज्ञादि धर्म कार्यों से उपासना करते हैं उनका एकान्त्यभाव नहीं बनता। अतः वे परं निःश्रेयस् भाव को (मोक्ष को) प्राप्त नहीं कर सकते॥१९॥ अङ्गभावेन शुद्धानामर्चा प्रियतमा हरेः । या स्वतन्त्रधिया तत्र सा निहन्ति विविक्तताम् ॥२०॥ परन्तु शुद्धभाववाले नित्यमुक्त अनन्तादि की अङ्गभाव में (अमुख्यरूप से भी) अर्चना करना श्रीहरि को अत्यन्त प्रिय होती है परन्तु यदि यज्ञादि क्रियाएं किसी (अन्य देवता) की स्वतन्त्र निष्ठा से की जाए तो उससे भगवन्निष्ठा तथा एकान्त्यभाव को क्षति पहुँचने के कारण यह कार्य निषिद्ध माना जाता है॥२०॥ भावनानान्तु कालुष्यादशुद्धिः कर्मणां भवेत् । तस्मात्तेषां विशुद्धयर्थं विष्णुमेव सदा भजेत् ॥२१॥ तथा ऐसे कर्म में भावना के कलुषित हो जाने के कारण कर्म भी शुद्धरूप में नहीं होते हैं। अतएव समस्त कर्मों की विशुद्धि के लिये सदा श्रीहरि की ही उपासना करनी चाहिए॥२१॥ बाह्यः सदसतां नास्ति भेदः प्रायेण कर्मसु । सङ्कल्पादेव भिन्नानि स हेतुर्बन्धमोक्षयोः ॥२२॥ जो भक्त एकान्ती हैं उनके कर्म में प्रायः बाह्य-भेद नहीं माना जाता है (किन्तु संकल्प के कारण ही भिन्नता वाले सन्तों के कर्म भगवत्-प्राप्ति पर्यन्त फलाग्रह से रहित होते हैं) यह भेद प्रायः कर्मों में तथा संकल्प से भिन्नता रखता है तथा यही बन्धन एवं मोक्ष का कारण बनता है (असत् संकल्प बन्ध का तथा सत्संकल्प मोक्ष का हेतु बनता है)॥२२॥ यजेच्छुद्धानशुद्धान् वा साम्यात् पारम्यतोऽपि वा । लभते विविधान् कामान् विभोस्तस्यैव शासनात् ॥२३॥ शुद्ध तथा अशुद्ध के साम्य या परमता के आधार पर यजन (अर्चना) को किया जाता है जो ऐसी विविध कामनाओं को दिलवाता (प्राप्त करवाता) है जो कि परमेश श्रीविष्णु के अनुमत या शासन से होती है (किन्तु इनसे मोक्ष नहीं प्राप्त होता है)॥२३॥