नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ८५ अथेह बान्धवास्तस्य गतस्य परमां गतिम् । वैष्णवास्त्वभिनन्देयुः पुण्यामवभृथक्रियाम् ॥८७॥ इधर यहां भूलोक में उस प्रपन्नभक्त के बन्धुबांधव जन परमगति प्राप्त करने वाले उस वैष्णव का अभिनन्दन कर पुण्यभूत संस्कारान्त में होने वाले अवभूत स्नान को सम्पन्न करते हैं॥८७॥ क्रियते चास्य पुत्राद्यैर्यत् किमप्यौर्ध्वदैहिकम् । तत् सर्वं प्रियभक्तस्य विष्णोः प्रीतिकरं परम् ॥८८॥ और तब इसके पुत्रादि के द्वारा संस्काररूप में किये गये और्ध्वदेहिक विधान आदि क्रियाएँ भी भक्तिप्रिय श्रीविष्णु की परमप्रीति करनेवाली हो जाती हैं॥८८॥ गुरूणामन्तिमतिथौ जन्मर्क्षे श्रवणेऽपि वा । हरिमभ्यर्चयेद् भक्त्या तद्भक्तांश्च विशेषतः ॥८९॥ ऐसे परम वैष्णव गुरु की अन्तिम या पुण्यतिथि के अवसर पर जन्म नक्षत्र के या सुनी गयी उनकी तिथि के दिन भक्तिपूर्वक श्रीहरि की अर्चना करे तथा उनके शिष्य और भक्तजन इस कार्य पर ध्यान विशेषरूप से रखे॥८९॥ ज्ञानकर्मक्रियामन्त्रध्यानयोगगतिक्रमाः । विस्तरेण मया पूर्वमुक्तास्तत्रापि ते समाः ॥९०॥ श्रीहरि के प्रति प्रपत्तिभाव रखने के बाद जिन कार्यों को मैंने यहां पूर्वमें विस्तारसे कहा था उन सभी ज्ञान, कर्म, क्रिया, मन्त्र, ध्यानयोग, गति तथा क्रमों का अनुसरण करना चाहिए। यहां भी इसी प्रकार इनका अनुगमन समान भाव से किया जाए॥९०॥ उपासनाविधौ धर्मा ये चान्यैः परिकीर्तिताः । न्यस्तात्मानस्तु तान् सर्वान् फलान्येव निबोधत ॥९१॥ और न्यस्त या प्रपत्तिभाव करनेवालों के विषय में अन्य पूज्य मुनिजन के द्वारा उपासना के विधानों में जिन उपायादि का कथन किया गया है उन सभी उपायों को भी जानना उचित है॥९१॥ अभ्यर्थितो जगद्धात्र्या श्रिया नारायणः स्वयम् । उपादिशदिमं योगमिति मे नारदाच्छ्रुतम् ॥९२॥ इस योग का साम्प्रदायिक क्रम पूर्व में स्वयं संसार की विधात्री श्री लक्ष्मी के श्रीमहाविष्णु से प्रार्थना करने पर इस न्यासयोग का उपदेश दिया था जिसे मैंने श्री नारद ऋषि से सुनकर ग्रहण किया है॥९२॥