नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता इति हस्तपदे साङ्ख्यं शास्त्रं गुह्यतमं परम् । शिरश्चैतन्मयोक्तायाः संहिताया भविष्यति ॥९३॥ इस प्रकार इस देवगण से भी अज्ञात गुह्यतम सांख्य शास्त्र का मैंने शीर्षभूत सिद्धान्त यह न्यासयोग बतलाया जो मेरे द्वारा कही गयी संहिता का रूप लेकर भविष्य में प्रवृत्त होगा॥९३॥ संहितोपनिषदस्मिञ्च्छास्त्रे ज्ञेयान्यनुक्रमात् । आदौ न्यासः फलञ्चास्य तदुपायश्च सङ्ग्रहः ॥९४॥ इस प्रकार इस भारद्वाज संहिता के रूपवाले गुह्यतम उपनिषद्भूत इस शास्त्र में क्रमशः मैंने न्यासयोग, न्यास का फल तथा उसके उपायों को संग्रह कर चार अध्यायों में प्रतिपादित शास्त्र में बतलाया है॥९४॥ ततो न्यासस्य चाङ्गानां निर्णयः सविरोधिनाम् । ततश्च फलरूपाया वृत्तेरङ्गानि विस्तरात् ॥९५॥ और इसमें न्यास तथा उसके अंगों का उनके विपरीत भावों के साथ निर्णय दिखलाया है तथा फलभूत वृत्तियों तथा उनके अंगों का भी विस्तार से निरूपण किया गया है॥९५॥ वृत्त्यङ्गसेवञ्च ततो निन्यहानं गतिस्तथा । एवं चतुर्भिरध्यायैः कथितानि विशेषतः ॥९६॥ इसी क्रम में वृत्ति तथा उसके अंगों का विचार, इसके बाद प्रतिषिद्ध विवर्जन का विवेचन किया गया। इन सभी को विशेषरूप से चार अध्यायों के द्वारा बतलाया गया॥९६॥ इत्थं प्रसादाद् देवर्षेर्नारदस्यामितौजसः । कृतोऽत्र वेद-वेदान्त-पञ्चरात्रार्थनिर्णयः ॥९७॥ इस प्रकार यहां अमितौजाः महर्षि नारद मुनि के प्रसाद से मैंने वेद तथा वेदान्त के अनुगत पञ्चरात्रआगम के अर्थों का (तात्पर्यों का) शास्त्रीय निश्चय दिखलाया है॥९७॥ इत्येतत् परमं गुह्यं श्रुत्वा भागवतोत्तमाः । मुनयः पूजयाञ्चक्रुर्भारद्वाजं तपोनिधिम् ॥९८॥ इस प्रकार वेद ग्रहण के तुल्य परम रहस्यों से पूर्ण पञ्चरात्र के अर्थों को सुनकर परमभागवत मुनिगण ने तपोनिधि भारद्वाज की प्रसन्नता से अर्चना की॥९८॥