नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता न खल्वपि दशादेशकालहेतुविपर्ययैः । प्रपत्तस्त्यक्तदेहस्य परा यात्रा विहन्यते ॥८१॥ प्रपत्ति को लेने वाले वैष्णव भक्त की दशा, पुण्य-क्षेत्रादि देश, उत्तरायण आदि काल तथा इनके कारण के विपरीत रहने पर भी उसकी जब देह छूट जाए तो भी उसकी परमयात्रा में अर्चिरादिमार्ग में जाने में कोई विघ्न नहीं आता तथा वह मुक्ति को प्राप्त करता ही है॥८१॥ अर्चिरादिकया गत्या तत्र तत्रार्चितः सुरैः । अतीत्य लोकानभ्येति वैकुण्ठं वीतकल्मषः ॥८२॥ और वह उस अर्चिरादि मार्ग में गतिशील रहकर बीच में आनेवाले प्रत्येक विश्राम- स्थल पर देवगण से पूजित अभिनन्दित होता हुआ मध्यवर्ती लोकों को पार कर निष्पापभाव से विशुद्धरूप में वैकुण्ठ पहुँच जाता है॥८२॥ अथैनममरास्तत्र सह दिव्याप्सरोगणैः । सोपहाराः प्रहर्षेण प्रत्युद्गच्छन्त्युपायताम् ॥८३॥ वहाँ पहुँचने पर देवगण दिव्य अप्सराओं के समुदाय के साथ प्रसन्न होकर उसे अपने हाथ में लिये हुए उपहारों को समर्पित कर उसकी अगवानी करते हैं॥८३॥ ततः प्राप्य जगन्नाथं प्रणिपत्य श्रियं पतिम् । आसीनमासने दिव्ये भक्तैर्भागवतैर्वृतम् ॥८४॥ आप्लुतः सस्मितालापमधुरालोकनामृतैः । पादमूलं भजत्यस्य दास्यैकानन्दनिर्भरः ॥८५॥ तब फिर वह जगदीश श्रीपति नारायण को प्राप्त करता है जो कि दिव्य देवगण तथा भागवतों से युक्त सिंहासन पर आसीन है। तब स्मित पूर्वक भाषण करते हुए तथा अपने मधुर विलोकनरूपी अमृत दृष्टियों से भर कर इष्ट के दास्यभाव के आनन्द में भरते हुए वह श्रीपति नारायण के दोनों चरणों के मूल का स्वयं सेवन करता है। (अपना मस्तक उनके चरणों पर टिका देता है)॥८४-८५॥ स च सर्वेषु लोकेषु तमेवाभ्यनुसञ्चरन् । सम्मोदते समगुणः कामान्नी कामरूपधृक् ॥८६॥ वह मुक्त वैष्णव भक्त आगे उन्हीं इष्टदेव के अभिमुखी भाव में रहकर वहां संचार करते हुए भगवद्गुण के समान होकर कामरूप धारी भोगवाला तथा इच्छानुकूल शरीरादि स्वरूपधारी होकर प्रसन्नता पूर्वक स्थित होता है। (उनके साथ समानरूप से भोगादि का अनुभव कर प्रसन्न होता रहता है)॥८६॥