नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ८३ असतां गुणकर्माणि नानुमोदेत किञ्चन । स्मरणादपि यत्तेषां महदाप्नोति किल्बिषम् ॥७६॥ अतएव ऐसे अवैष्णवजन के औदार्यादि गुणों तथा अरि-निरसनादि कर्मों की अशास्त्रविहित स्थिति का अनुमोदन नहीं करना चाहिए, क्योंकि उन उन अशास्त्रीय गुण कर्मों के स्मरणमात्र से महान् किल्विष उत्पन्न होता है। (अतः उनके स्मरणादि तथा अनुमोदन करने की उपेक्षा नहीं रखे।।७६।। विशिष्टः परमैकान्ती ज्ञानवैराग्यभक्तिभिः । तादृशैरेव कुर्वीत सह सङ्कथनादिकम् ॥७७॥ उक्तान्येतानि सर्वाणि योऽवमन्येत मूढधीः ॥ स एष तमसोऽभ्येति पारमैकान्त्यवर्जितः ॥७८॥ अपने ज्ञान, वैराग्य तथा भक्तिभाव के कारण एकान्ती वैष्णव अन्य सभी दूसरों की अपेक्षा विशिष्ट है, अतः ऐसे विशिष्टजन के साथ ही संकथन कुशल प्रश्नादि कार्य रखना चाहिए और जो बुद्धिहीन पुरुष इन कहे गये सभी उपदेशों की अवहेलेना करता है वहीं एकान्तवर्जित होकर तमस् के पार (अतिशय तमस् के घने समुद्र में) चला जाता है।।७७-७८।। अथ वृत्तिमिमां सम्यक् कुर्वाणो विगतव्यथः । विसृज्य देहं प्राप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥७९॥ तथा पूर्व में कथित विहिताचारकी वृत्ति में स्थित रहने वाला एकान्ती अपनी समस्त व्यथाओं से मुक्त होकर तथा अपने देह के छूटने पर श्रीहरि के परमपद की प्राप्ति कर लेता है।।७९।। इति सत्सेवाविरुद्धाधिकार अशक्तमपि च स्मर्तुमन्ते पूर्वकृतं स्मरन् । स्वयमेव परं धाम स्वयं नयति माधवः ॥८०॥ जब शरीर की अवसन्न दशा में परमेश्वर के स्मरण की शक्ति नहीं रहने से (अन्त समय में) ईशस्मरण न होने के कारण वैष्णवजन के भी ईश स्मरण करने में अशक्त हो जाने पर भी श्रीनारायण स्वयं ही आकर उसे अपने वैकुण्ठधाम में ले आते हैं॥८०॥ १ यहाँ इस कथन के समर्थन में निम्नलिखित दो पद्य दिये जा रहे हैं-'ततस्तु म्रियमाणं तं काष्ठपाषाणसन्निभम् । अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम् ।।' तथा 'यदि वातादिदोषेण मद्भक्तो माञ्च विस्मरेत् । तर्हि स्मराम्यहं भक्तं नयामि परमां गतिम् ।" इति ।