भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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८२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता कर्मों को सम्पादन नहीं करवाना चाहिए तथा न ही स्वयं इनके लौकिक अर्थ वैदिक कर्मों का सम्पादन ही करना चाहिए॥७०॥ पङ्क्तौ समाजे ग्रामादौ न त्वभागवतोत्तरे । वसेदेकत्र भवने नैकेनाप्यसता सह ॥७१॥ अवैष्णवजन की अधिक संख्या में स्थिति वाले ग्रामों में, भोजनादि पंक्ति में, समा (समूह) में तथा ऐसे भवनों में जहाँ ऐसे एक अवैष्णव व्यक्ति की भी स्थिति रह पर वहां इनके साथ निवास न करे॥७१॥ प्रीत्यप्रीतिसमायोगं स्पर्शं भुक्तिं सहोषिताम् । स्वैरप्येकान्त्यविमुखैरघवजं विवर्जयेत् ॥७२॥ अपने आत्मीय या पारिवारिक जन के साथ प्रीति या हर्ष के कल्याणादि अवसरों प तथा अप्रीति के शोकादि अवसरों के व्यवहारार्थ उन सभी के साथ मिलने, सा भोजन करने, एक आसन पर एक साथ बैठने आदि समागम के अवसर पर एकान्त्यभाव से रहित अपने जन के होने पर अघ या आशौचादि की स्थिति क छोड़कर उनके साथ अपना व्यवहारादि सम्बन्ध न रखे॥७२॥ अवैष्णवं न वन्देत नार्चयेद् विधिपूर्वकम् । सम्प्रश्नासनदानादि कुर्याद् वाप्यानृशंसतः ॥७३॥ अवैष्णवजन को न तो नमस्कार करे और न ही गुणशाली होने पर भी उनक विधिपूर्वक अर्चना ही करे। उनसे कुशल मंगल के प्रश्न उन्हें आसनादि का दे आदि भी निस्संकोच भाव से न करे॥७३॥ अभक्तमच्युतस्यापि नावमन्येत कञ्चन । हितं वा बोधयेत् साधोर्दद्याद्वा किञ्चिदीप्सितम् ॥७४॥ परन्तु अच्युतविषयक भक्ति से रहित भी किसी भक्त की कभी भी अवहेलना तिरस्कार नहीं करना चाहिए। यदि ऐसे साधु अवैष्णवजन सामने मिल जावें उनसे कुशल मंगलादि हित-संभाषण अवश्य करना चाहिए तथा उन्हें शक्ति अनुसार इष्ट वस्तु को भी देना चाहिए॥७४॥ न च मैत्रीं प्रकुर्वीत वैष्णवः प्राकृतैः सह । क्वायमच्युतसत्तात्मा क्व ते विषयचञ्चलाः ॥७५॥ वैष्णव भक्त अवैष्णव प्राकृतजन के साथ मैत्री न रखे क्योंकि कहाँ तो अच्युत भक्ति में आत्मन्यास करनेवाला वैष्णव तथा कहां वे विषय से भिन्न प्रकृति अस्थिर भाव वाले अवैष्णव जन। (इन दोनों की समानता शक्य ही नहीं है) अ मैत्री कैसे हो सकेगी॥७५॥