नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 83, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ८१ जो अपनी विरुद्ध बुद्धि तथा दृष्टि रखने के कारण बाह्य हैं तथा जिनकी अन्यथा दृष्टि हों ऐसे अज्ञानयुक्त संशयात्मा पुरुषों को अपने वैष्णवशास्त्र का दर्शन भी बतलाना इष्ट नहीं। अतः ऐसे पुरुषों के साथ लोक व्यवहार का आदान प्रदान न रखा जावे तथा शास्त्रीय यज्ञ दानादि का व्यवहार तो बिल्कुल ही नहीं रखना चाहिए॥६५॥ प्रपन्नैश्चान्यभजनाद् युक्तापायसमन्वितैः । वैष्णवो वर्जयेत् सङ्गं प्रच्युतास्ते ह्यवैष्णवाः ॥६६॥ और जो शास्त्रोक्त भजनादि उपाय के साथ दूसरे इष्टदेव की प्रपत्ति में स्थित हों तो ऐसे अवैष्णव पुरुषों के साथ भी वैष्णव सङ्गति न रखे। क्योंकि जो अवैष्णव हैं वे सभी दूसरे देवगणों के भजनादि प्रपत्ति कार्यों के करने से स्खलिताचारवाले हो गये हैं॥६६॥ दैवेषु पित्र्येषु तथा धर्मार्थेष्वितरेषु च । अवैष्णवं न गृह्णीयात् पात्रं दानेषु कर्हिचित् ॥६७॥ देवता के उद्देश्य से तथा पितरों के श्राद्धादि प्रयोजन से एवं धर्मादि के अन्य किसी कार्यवश या लौकिक कार्यवश भी अनैकान्ती अवैष्णवजन को दानादि के पात्ररूप में न तो आमन्त्रित करे और न ही देवादि कार्यों में उन्हें सम्मिलित करे॥६७॥ न कञ्चित् प्रतिगृह्णीयाद् विष्णुभक्तिविवर्जितात् । पानीयं पक्वमन्नञ्च विशेषेण विवर्जयेत् ॥६८॥ इसी प्रकार किसी विष्णुभक्ति से रहित पुरुष के द्वारा अर्पित जल, पक्वान्न तथा फलादि को विशेषरूप से ग्रहण नहीं करना चाहिए॥६८॥ विद्यार्थसम्प्रयोगोऽपि प्राकृतैर्न कथञ्चन । विवादोऽपि न कर्तव्यः क्रीडासङ्कथनानि च ॥६९॥ इसी प्रकार ऐसे अवैष्णवजनों के साथ विद्या के आदान-प्रदान या अध्ययनादि या अध्यापनादि का कार्य भी नहीं रखे, क्योंकि ये प्राकृतजन या अलग माने जाने वाले पुरुष होते हैं अतः इनके साथ शास्त्रादि विवाद तथा इष्टआलाप भी न रखा जावे॥६९॥ न चैकस्मिन् भजेत् साम्यं कर्मण्येकान्तवर्जितैः । न चैषां कर्म कुर्वीत न स्वकर्म च कारयेत् ॥७०॥ किसी एक लौकिक अथवा वैदिक-कर्म में इन प्राकृत तथा एकान्त वर्जित जन की समानता नहीं हो सकती है। अतएव इन अवैष्णवजन से अपने लौकिक अथवा वैदिक