नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता वैष्णव के दो प्रभेद— स एकान्त्यन्यविमुखो हरिं सर्वेश्वरं प्रभुम् । यः समाश्रयते किञ्चित्फलमभ्यर्थयन्नरः ॥६०॥ जो भक्त मनुष्य दूसरे देवताओं से हटकर श्रीविष्णु के पाद सेवन भक्ति या उन ज्ञान के प्राप्त करने की अभिलाषा रखते हुए सर्व जगत के अधिपति श्रीहरि प्रपत्ति या आश्रय को ग्रहण करता हो तो वह 'एकान्ती' वैष्णव कहला है॥६०॥ न्यस्ताशेषभरः श्रीशे यस्तु दास्यैकजीवितः । स एष परमैकान्ती द्वावेतौ वैष्णवौ स्मृतौ ॥६१॥ तथा जो भक्त नर अपने आत्मा के समस्त भर को श्रीहरि के प्रति अर्पित कर न्यस्त करता हो और उनके दासभाव के अतिरिक्त अन्य सत्तामय स्थिति की काम नहीं रखता हो तो ऐसा पुरुष 'परमैकान्ती' वैष्णव कहलाता है॥६१॥ अन्ये त्ववैष्णवाः सर्वे मनुष्या जिह्मदृष्टयः । असतस्तन् विदुर्दैवास्तैः सतां नास्ति सङ्गमः ॥६२॥ इन दो प्रकार के वैष्णवो को छोड़कर शेष सभी कुटिल बुद्धि के कारण अवैष्णव म गये हैं, जिन्हें देवगण असन्त भूत मानकर उनके साथ सन्तों के समागम को स्वीक नहीं करते हैं॥६२॥ अवैष्णवात् स्वधर्मस्थाद् वैष्णवः स्खलितोऽपि सन् । श्रेयानेव हि मन्तव्यो मूलात् स न परिच्युतः ॥६३॥ जो अपने वर्ण तथा आश्रम धर्मों मे अवस्थित होने वाले किन्तु अवैष्णव हों उन अपेक्षा अपने धर्म तथा कर्त्तव्यों से किञ्चित् स्खलित हो जानेवाला भी यदि वैष्णव तो भी वह श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि वह अपनी मूलस्थिति से पतित न है॥६३॥ स्वेशसम्बन्धविज्ञानं मूलमन्याः क्रियाः पुनः । तस्य शाखाः प्रशाखाश्च काश्च ता मूलवर्जिताः ॥६४॥ इसका कारण अपने इष्ट देव आराध्य श्रीविष्णु तथा उनके साथ अपने दास्यभ का उसे ज्ञान है जो मूल माना जाता है तथा अन्य कार्य इसी मूल की शाखा, प्रशा तथा उपशाखाएं होती हैं ये अपने मूल से रहित होने से अर्थ नहीं (होत रखती है॥६४॥ बाह्यानां जिह्मदृष्टीनामज्ञानां संशयात्मनाम् । नालोकमपि कुर्वीत न च तैः किञ्चिदाचरेत् ॥६५॥