भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित ७९ शरीर पर एक वस्त्र का धारण करना 'तामस' दो वस्त्रों का धारण करना 'राजस' तथा कौपीन सहित दो वस्त्रों का धारण करना 'सात्विक' होने से सात्विक विधान से वस्त्रधारण करना अधिक उचित है॥५५॥ दर्भाक्षसूत्रवस्त्राङ्कनामपुण्ड्रविभूषणम् । अन्यत्तु तामसं सर्वं विशेषेण विवर्जयेत् ॥५६॥ इसी तरह जो तामस क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले दर्भ, रुद्राक्ष, अन्य चिन्हादि से अंकित वस्त्रादि अथवा सूत्रादि या अयुग्म गुण (सूत्रों) से निर्मित कटिबन्धादि तथा त्रिशूलादि से या देवनामादि से अङ्कित अशुद्ध पुण्ड्रादि भूषण या त्रिशूलादि आकार के भूषण तथा इनके अतिरिक्त भी ऐसे तामस उपकरणों को ध्यान देते हुए छोड़ना उचित है॥५६॥ अन्यतन्त्रैकसिद्धानि काम्यानि विविधानि च । द्रव्यनामादिरूपाणि लक्षणानि विवर्जयेत् ॥५७॥ अन्य आगमों के द्वारा विहित काम्य विविध कर्मों को एवं तन्त्रमात्र में व्यवहृत पारिभाषिक द्रव्यादि तन्त्रसिद्धरूप वाले द्रव्य तथा उनके विशेष आकारों (के बोधक चिन्हादि ) का भी व्यवहार न करे॥५७॥ इति लक्ष्म विरुद्धाधिकारः गुरोरपह्नवात् त्यागात् साम्याद्विस्मरणादपि । लोभमोहादिभिश्चान्यैरपचारैर्विनश्यति ॥५८॥ सत्सेवाविरुद्ध अपने गुरु के नामादि को न बतलाते हुए, उनका परित्याग करने उनकी बराबरी या तुलना करने या उन्हें विस्मृत कर देने के कारण लोभ, मोह आदि गुरु के वैभव का ज्ञान न रखकर उनके प्रति उपचार या उपेक्षाभूत तिरस्कार के भाव रखने पर शिष्य का पतन होता है॥५८॥ विशेषाद् विष्णुभक्तेषु दम्भं लोभं नृशंसताम् । क्रोधमीर्ष्यां मदं मानं साम्यञ्च परिवर्जयेत् ॥५९॥ विशेषरूप में जो विष्णुभक्त हैं उन्हें ही बिना धर्म का आचरण किये हुए उनको बतलानेकी मिथ्या घोषणा के दम्भों, लोभ करना, किसी दीन के प्रति करुणा न रखना, क्रोध करना तथा दूसरों से समानता को देखने का भाव भी नहीं रखना चाहिए॥५९॥