नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता जो वैष्णव श्रीविष्णु के प्रति प्रपत्ति अर्पित करने के पश्चात् चक्रादि से अंकित न तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण न करता हो तो उसकी श्रीहरि के प्रति एकान्तिक निष्ठा रहेगी (अतः उसे ऊर्ध्वपुण्ड्रादि अवश्य धारण करना चाहिए) ॥४९॥ राजसाँस्तामसाँश्चैव व्यपदेशान् विवर्जयेत् । ध्रुवं व्यपेति भक्तोऽपि व्यपदेशैरसात्विकैः ॥५०॥ अतएव प्रपन्न वैष्णवों को राजस तथा तामस पदार्थों से तिलकादि के धारण कार्यों को नहीं करना चाहिए क्योंकि भक्त होने पर भी सात्विक पदार्थों से र होनेवाला वैष्णव विशेषरूप में पतित हो जाता है॥५०॥ सात्त्विकं नाम शुद्धानामशुद्धानान्तु राजसम् । बाह्यादितन्त्रसिद्धानां देवादीनान्तु तामसम् ॥५१॥ जो अनन्यभाव से इष्ट की अर्चना करते हो, ऐसे शुद्धजन का सात्विक अशुद्ध अन्यभावादि से इष्ट की अर्चनादि करनेवाले राजस तथा अवैदिक विधियों तान्त्रिक तथा उनके द्वारा इष्ट की अर्चना करनेवालों का 'तामस' नाम कहा है॥५१॥ दास्यं हि नामकरणमपि तद्वाचकैर्विना । गुणकर्मादिभिः स्वैश्च रूढं श्लाघ्यैः सनातनम् ॥५२॥ इसी प्रकार श्रीभगवद्दास के बोधक शब्दों के बिना अशुद्धार्थ बोधक तथा अवै नाम भी न रखें जावें। यहां शुद्ध तथा वैदिक नाम के अतिरिक्त भी अपने शू दास्य कर्म जो गुण तथा कर्मों के बोधक हों तो ऐसे रूढ़ तथा संकेतितार्थ वाले रखे जाने उचित हैं॥५२॥ युग्मैर्विवर्त्तितं रौद्रमयुग्मैर्ब्राह्ममुच्यते । उभयैस्तैर्व्यतिस्यूतमयुग्मैर्वैष्णवं गुणैः ॥५३॥ उपवीतं सदा ब्राह्मं वैष्णवं कटिबन्धनम् । उभयं धारयेद् रौद्रं साधयन् कर्म तामसम् ॥५४॥ जो युग्म भाव (दो तन्तुओं) से पूर्ण हो उसे 'रौद्र' तथा अयुग्म या तीन से पूर्ण तथा इन दोनों को मिलाकर गुणोंसे बँटा हुआ हो वह वैष्णव 'उपवीतक' कहलात इनमें सदा ब्राह्म तथा वैष्णव उपवीत को कटिबन्ध प्रदेश तक धारण करे इन उपवीतों को धारण करना चाहिए तथा तामस कर्मों की साधना करते समय उपवीत धारण करना चाहिए॥५३-५४॥ तामसं नग्नमेकन्तु राजसं वसनद्वयम् । कौपीनसहितं तत्तु सात्विकं मुनिभिः स्मृतम् ॥५५॥